आम बजट शिक्षा के लिए लाभकारी या फिर से बस एक ‘जुमला’?

कोरोना काल में जिस तरीके से शिक्षा का मोड बदला है उससे ये इस बार ये उम्मीद थी कि आम बजट में शिक्षा को लेकर काफ़ी सुधारों की बात होगी. लेकिन जिस तरीके से शिक्षा को लेकर सरकार का हर साल असंवेदनशील रवैया रहा है वही इस बार भी देखने को मिला है. आम बजट से लोगों को उम्मीद थी कि ऑनलाइन पढ़ाई को लेकर सरकार की ओर से संरचनात्मक एलान किया जाएगा. सरकार ने डिजिटल फर्स्ट मनोदशा के सन्दर्भ के भीतर एक राष्ट्रीय डिजिटल शैक्षणिक संरचना स्थापित की जायेगी.


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सरकार ने बस एक ‘संरचना’ की स्थापना कह कर ही डिजिटल शिक्षा की बात को रफ़ा-दफ़ा करने का काम किया है. सरकार आम बजट में शिक्षा को लेकर कितना सजग रहती है उसको बस आप पिछले 6 साल के शिक्षा बजट को पलट कर देखिये.

साल 2014-15 में जब मोदी सरकार ने पहली बार बजट पेश किया था तो उसमें शिक्षा क्षेत्र को 83000 करोड़ रुपए का बजट दिया गया था. बाद में इसे उसी साल घटाकर 69000 करोड़ रुपए कर दिया गया. इसके बाद शिक्षा बजट उस दर से नहीं बढ़ा, जिस तरह उसे बढ़ना चाहिए था.

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान निर्मला सीतारमण ने जब जुलाई, 2019 में बजट पेश किया तो शिक्षा क्षेत्र को 94,854 करोड़ रुपए का बजट मिला, जो 2014 के बजट से महज 15.68 फीसदी अधिक है. जबकि इस दौरान कुल बजट 55 फीसदी से अधिक बढ़ा. 2014-15 में सम्पूर्ण बजट की राशि 17.95 लाख करोड़ रुपये थी जो 2019-20 में बढ़कर 27.86 लाख करोड़ हो गई.

इस साल शिक्षा में 99,300 करोड़ का बजट रखा गया है.

देश की शिक्षा व्यवस्था बजट की भारी कमी से जूझ रहा है। उच्च शिक्षा हो या स्कूली शिक्षा, हर जगह बजट की कमी है.  पिछले एक दशक के दौरान शिक्षा के क्षेत्र में खर्च देश के जीडीपी के 3 प्रतिशत से भी कम रहा है, जबकि प्रस्तावित वैश्विक मानक 6 प्रतिशत है.

शिक्षा नीति का निर्धारण करने के लिए 1964 में बने कोठारी आयोग का सबसे प्रमुख सुझाव था कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6 प्रतिशत शिक्षा के मद में खर्च किया जाए. प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) में इसे एक राष्ट्रीय लक्ष्य भी बनाया गया था. लेकिन इस राष्ट्रीय लक्ष्य को आज 40 साल बाद भी नहीं प्राप्त किया जा सका है.

अगर हम वैश्विक आंकड़ों की बात करें तो वैश्विक आंकड़ें भारत से कहीं बेहतर हैं. शिक्षा पर खर्च का वैश्विक औसत जीडीपी औसत 4.7 % है. अमेरिका अपनी जीडीपी का 5.6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है. जबकि नार्वे और क्यूबा जैसे छोटे देश अपनी जीडीपी का क्रमशः 7 और 13 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं. भारत के समान अर्थव्यवस्था वाले देश ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका दोनों शिक्षा पर लगभग अपनी जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करते हैं.

भारत में जहां एक तरफ शिक्षा के क्षेत्र में बजट काफी कम है, वहीं इसका वितरण भी काफी असमान सा है. 2019-20 की बजट के अनुसार शिक्षा के क्षेत्र में जो 94,854 करोड़ जारी किए गए, उसमें स्कूली शिक्षा का बजट 56,536.63 करोड़ रुपए और उच्च शिक्षा का बजट 38,317.36 करोड़ रुपए है. इस साल उच्च शिक्षा का बजट 39,466.52 रखा गया है.

उच्च शिक्षा के 39,466.52 करोड़ रुपए में से देश के लगभग 1000 विश्वविद्यालयों का हिस्सा 6843 करोड़ रुपए है. वहीं देश में 50 से भी कम संख्या में स्थित आईआईटी और आईआईएम का बजट विश्वविधालयों के बजट से कहीं अधिक है. देश भर के 23 आईआईटी कॉलेजों का बजट 6410 करोड़ रुपए जबकि देश के 20 आईआईएम कॉलेजों को 445 करोड़ रुपया मिलता है.

यही कारण है कि भारत की विश्वविद्यालयीय शिक्षा बेहद नाज़ुक स्थिति में है. बजट के असमान वितरण के अलावा एक और समस्या यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में जितना बजट प्रस्तावित किया जाता है, उतना ख़र्च नहीं हो पाता. सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 11 सालों में 8 बार ऐसा मौका आया जब शिक्षा पर प्रस्तावित बजट खर्च नहीं हो सका. इस रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2019 के दौरान लगभग 4 लाख करोड़ रुपये प्रस्तावित बजट शिक्षा के क्षेत्र में खर्च नहीं हो सका.

हालांकि इसके अलावा शिक्षा बजट में इस बार लेह में सेंट्रल यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा की है और 100 नए सैनिक स्कूल खोलने की बात भी कही गयी है.

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