कृषि कानूनों से अगर फ़ायदा है तो इससे बिहार के किसानों को एमएसपी क्यों नहीं मिलता?

बिहार में साल 2006 में एग्रीक्लचर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी ख़त्म  

तीनों कृषि कानूनों के विरोध में देश की राजधानी दिल्ली को घेरे बैठे किसानों का सबसे बड़ा जो डर उभरकर सामने आया है वो है कि इससे आने वाले दिनों में एमएसपी (कृषि उपज विपणन समिति) की व्यवस्था अप्रासंगिक हो जाएगी और उन्हें अपनी उपज लागत से भी कम क़ीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

एमएसपी व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार कृषि लागत के हिसाब से किसानों की उपज खरीदने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है।किसानों को डर है कि एपीएमसी मंडी के बाहर टैक्स मुक्त कारोबार के कारण सरकारी खरीद प्रभावित होगी और धीरे-धीरे यह व्यवस्था अप्रासंगिक हो जाएगी।

इसलिए किसानों की माँग है कि एमएसपी को सरकारी मंडी से लेकर प्राइवेट मंडी तक अनिवार्य बनाया जाए ताकि सभी तरह के ख़रीदार,वो चाहे सरकारी हों या निजी इस दर से नीचे अनाज ना खरीदें। न्यूनमत समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग को लेकर पंजाब-हरियाणा सहित कई राज्यों के किसान आंदोलन कर रहे हैं मगर बिहार के किसान सड़क पर नहीं उतरे हैं। 

2005 में नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के एक साल बाद ही बिहार में किया एपीएमसी को ख़त्म 

दरअसल नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जो किया है उसे नीतीश कुमार ने 14 साल पहले ही कर दिया था। जी हां साल 2005 नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के एक साल बाद ही बिहार में एपीएमसी यानी एग्रीक्लचर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी ख़त्म कर दिया था। साल 2006 में बिहार में एपीएमसी अधिनियम खत्म करके इसे एक बड़ा सुधारवादी कदम बताया गया था।

किसान आंदोलन: एपीएमसी एक्ट ख़त्म होने के बाद बिहार में क्या किसानों के हालात बदले? - BBC News हिंदी

जिसे लगभग 14 साल हो चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने साल बाद भी किसानों को अपनी उपज को बेचने के लिए अनुकूल बाजार नहीं मिल पाया है और किसान अपनी उपज औने-पौने दामों पर निजी व्यापारियों को बेच रहे हैं। मोदी सरकार कहते हैं कि तीन नए कृषि कानूनों से किसानों पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

इस पर अर्थशास्त्री डीएम दिवाकर कहते हैं कि बिहार के करीब 94 फीसदी किसान ऐसे हैं जो मंडियों में नहीं जाते एवं उन्हें कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नहीं मिला और उनकी आर्थिक स्थिति में पिछले 14 वर्षों में सुधार होने चाहिए थे मगर उनकी हालत सुधरने की बजाय ख़राब हुई है।

बिहार में सीमित जम़ीन के कारण किसान अनाज अपने परिवार के खाने से अधिक पैदा नहीं कर पाते

एमएसपी बिहार

भारत के उपभोक्ता मामले और खाद्य मंत्रालय के रिपोर्ट्स के अनुसार जून साल 2020 में सरकार की विभिन्न एजेंसियों ने 389.92 लाख मिट्रिक टन गेहूँ की ख़रीदारी की थी जिसमें बिहार का गेहूं मात्र पाँच हज़ार मिट्रिक टन था। जो कि पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की तुलना में बहुत कम है। जब नीतीश कुमार ने मंडी सिस्टम को ख़त्म करने का निर्णय लिया था तब बिहार में कोई विरोध-प्रदर्शन नहीं हुआ था।

इस पर नवल किशोर चौधरी (पटना यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे) का मानना है कि किसानों में जागरूकता नहीं थी इसलिए लोग समझ नहीं पाए थे। वहीं बिहार में अनाज का सरप्लस उत्पादन नहीं होता है यहां 97 फ़ीसदी ऐसे किसान हैं जो अनाज अपने परिवार के खाने से अत्यधिक पैदा नहीं कर पाते हैं कारण सीमित जम़ीन है। ऐसे में नीतीश कुमार ने जब सरकारी मंडियों को ख़त्म किया तो किसानों पर इसका अत्यधिक असर नहीं पड़ा। बिहार में लोग अनाज बेचने से अधिक खाने के लिए उगाते हैं या कहें कि खाने से अधिक उगा ही नहीं पाते हैं।


और पढ़ें : चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे ने कहा महिलाओं का पूरा सम्मान करते हैं कभी कोई गलत बयान नहीं दिया


बिहार की खेती-किसानी की असली समस्या

प्रोफ़ेसर एनके चौधरी इस पर कहते हैं कि बिहार में खेती-किसानी की समस्या पंजाब से काफ़ी अलग है। वे बिहार की खेती-किसानी को अर्द्ध सामंती कहते हुए बताते हैं कि यहाँ भूमि पर मालिकाना हक़,श्रम को नियंत्रित करने की शक्ति एवम् आर्थिक क्षमता एक ही वर्ग के पास है।

वहीं पटना स्थित एनके सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं कि यदि प्रधानमंत्री की बात सही होती कि कृषि क़ानून से किसानों की हालत ठीक होगी तो बिहार में पिछले 14 वर्षों में किसानों की हालत ख़राब क्यों बनी हुई है।

वे आगे कहते हैं कि बिहार की खेती-किसानी की मूल समस्या ये नहीं है कि उनके लिए बाज़ार नहीं है बल्कि समस्या वहां है कि बिहार के किसानों के पास भू स्वामित्व नहीं है। बाढ़ और सूखे को लेकर सरकार की कोई योजना और सिंचाई की सठिक प्रबंध भी नहीं है।

दिवाकर कहते हैं कि बिहार में 20 से अधिक ऐसे ज़िले हैं जहां लोगों की प्रति व्यक्ति आय हर साल10 हज़ार रुपए से भी कम है। वहीं पटना में प्रति व्यक्ति आय 65 हज़ार रुपए हैं,नालंदा में अच्छी फसल हुई इसका अर्थ ये नहीं कि पूरे बिहार में अच्छी फसल हुई है। ग्रोथ का बेस इयर क्या है ये आवश्यक है और जहाँ ज़ीरो से शुरुआत होगी वहाँ प्रतिशत में डेटा बहुत बड़ा दिखता है।

भारतीय कृषि में सुधार की आवश्यकता है मगर छोटे किसानों की आजीविका की क़ीमत पर नहीं

एमएसपी बिहार

मनमोहन सिंह सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे कौशिक बासु ने कहा है कि भारतीय कृषि में सुधार की आवश्यकता है मगर छोटे किसानों की आजीविका की क़ीमत पर नहीं। बासु ने कहा कि हमें राजनीति किनारे रख देनी चाहिए और नए सिरे से क़ानून बनाने पर सोचना चाहिए जिसमें व्यापक पैमाने पर विमर्श हो।

बासु ने कहा कि ये सच है कि भारत के कृषि क़ानून पुराने पड़ गए हैं। एपीएमसी एक्ट में सुधार की आवश्यकता है। किसानों को विकल्प देने की ज़रूरत है मगर उससे पहले हमें ये सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि छोटे किसानों को शोषण से बचाया जा सके। मुक्त बाज़ार में छोटे किसानों की जो मुश्किलें हैं उनको गंभीरता से देखने की आवश्यकता है।

निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता ज़रूरी है

आपके लिए डेमोक्रेटिक चरखा आपके लिए ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स पब्लिश करता है जिससे आपको फ़र्क पड़ता है
हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.