कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के पूरे हुए 31 साल, क्या हैं वापसी के आसार?

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के पूरे हुए 31 साल

आज से 31 साल पहले यानी की 19 जनवरी का दिन कश्मीरी पंडितों के लिए एक काला दिन था। जब उन्हें अपने घर, अपनी जमीन को छोड़कर भागने को मजबूर होना पड़ा था। विस्थापन के समय लेखक राहुल पंडिता 14 साल के थे। वे कहते हैं कि, “बाहर का माहौल खराब था नारे लगाए जा रहे थे कि आजादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागों।”

कश्मीरी पंडितों

उस समय कश्मीरी पंडित डर और आतंक के माहौल में जी रहे थे। उन्होंने 3 महीने इंतज़ार यह सोच कर किया की आगे जाकर हालात ठीक हो जाएंगे। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने कश्मीर छोड़ने का फैसला लिया। उनका परिवार वादी छोड़कर अगले ही दिन जम्मू को चले गए। यह त्रासदी सिर्फ राहुल के परिवार को नहीं बल्कि समस्त कश्मीरी पंडितों को झेलनी पड़ी। लेकिन इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी कोई सरकार उनकी मदद को आगे नहीं आई।

कश्मीरी पंडितों को बहुसंख्यक हिंदू समाज से भी नहीं मिली मदद

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कश्मीर छोड़ने के बाद पंडितों को लगा कि अब उनकी मुसीबतें खत्म होने वाली है। लोग उनका दल समझेंगे तथा उनकी मदद करेंगे। लेकिन उन्हें पता चला कि उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था। इन पंडितों को कश्मीर में ही नहीं बल्कि जम्मू, दिल्ली, लखनऊ जैसे क्षेत्र में जहां बहुसंख्यक हिन्दू समाज रहते हैं। उनसे भी मदद नहीं मिली। इस विषय मे राहुल कहते हैं कि, “हमें यह उम्मीद थी कि जब हम कश्मीर से पलायन करके जम्मू, दिल्ली, लखनऊ आएंगे जहां बहुसंख्यक के समाज है। लेकिन निर्वासन के बाद पता चला कि मकान मालिक न तो हिन्दू होता है न मुस्लिम, उसका मज़हब केवल पैसा होता है।” विजय ऐमा का कहना है कि उनकी हालत के बारे में किसी ने शुद्ध नहीं ली। वे कहते हैं कि, ‘न देश की सिविल सोसाइटी, मीडिया , सरकार और हुकूमतों में से किसी ने भी उनका हाल नहीं पूछा।”


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पिछले 26 सालों में 3 लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ी

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एक अनुमान के मुताबिक पिछले 26 सालों में 3 लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ी हैं। जिनमें से 1990 में अधिकतर ने पलायन किया। अब सिर्फ घाटी में 27 लोग रहते हैं, जिनमें से एक संजय टीकू हैं। संजय टीकू का कहना है कि विस्थापन के समय वह अपने रिश्तेदारों के पास जम्मू गए थे। लेकिन उनके हालात को देखते हुए उन्होंने फैसला किया कि वह कश्मीर में ही रहेंगे। अब संजय टीकू का कहना है कि, “मैं कश्मीर में सर उठा कर जीता हूं, सर झुका कर नहीं।”

वहीं कश्मीर के पैंथर्स पार्टी के अध्यक्ष भीम सिंह का कहना है कि अब कश्मीर की हालत काफी बेहतर है। वे कहते हैं कि, “मैं राजपूत हूं, हिन्दू हूं, मैं खुली गाड़ी में श्रीनगर जाता हूं।“ हालांकि कश्मीर के बाहर रहने वाले कश्मीरी पंडितों का कहना है कि वहां रहने वाले कश्मीरी पंडित दबकर रहते हैं।

आज कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के 31 साल हो चुके हैं लेकिन अब भी किसी भी सरकार ने उनकी वापसी के लिए कोई नीतियां बनाई। संजय टीकू का कहना है कि यदि स्मार्ट सिटी योजना कश्मीरी पंडितों के लिए बनाई जाए तो इससे ज्यादातर पंडित वापस लौट आएंगे। लेकिन वह इसके साथ ही यह शर्त लगाते हुए कहते हैं कि स्मार्ट सिटी में भी साथ यदि 60% कश्मीरी पंडित और 40% मुसलमान रहे तभी उन्हें यह प्रस्ताव मंजूर होगा।

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