कोरोना काल में देश में 5 महीनों में बेरोज़गारी दर में इज़ाफ़ा, 2 करोड़ से ज़्यादा लोगों की गयी नौकरियां

कहां हैं अच्छे दिन और रोज़गार का वादा?

अच्छे दिन की उम्मीद करते करते लोगों को बुरे दिन देखने पड़ रहे हैं। कोरोना काल के चलते दुनिया में करोड़ों लोगों ने अपना रोजगार खोया है। भारत में 5 महीने के लॉकडाउन में कई लोगों को अपना आर्थिक साधन गंवाना पड़ा और आर्थिक तंगी से जूझना पड़ा। इन 5 महीनों में रोजगार खोने वालों में से सैलरी पाने वाले क़र्मचारियों की  संख्या बढ़ी है। अन्य तरह के रोजगार फिर भी शुरुआती झटकों से उबरने में सफल हुए हैं और कुछ श्रेणियों के रोजगार में इज़ाफ़ा भी हुआ है। लेकिन इन सबमें सबसे अधिक सैलरी पाने वालों को झेलना पड़ रहा है। मौजूदा आर्थिक विपदा में सबसे ज्यादा मार इन पर ही पड़ रही है।

सभी तरह के वेतनभोगी रोजगार की संख्या भारत के कुल रोजगार का 21-22 फीसदी है। वेतन पाने वालों से अधिक संख्या किसानों की है और उनसे भी कहीं अधिक दिहाड़ी मजदूर हैं। अगर किसानों एवं दिहाड़ी मजदूरों को एक साथ जोड़ दें तो वे भारत की कुल कामकाजी जनसंख्या का करीब दो-तिहाई हो जाते हैं।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से अगस्त के दौरान लगभग 2.1 करोड़ सैलरी पाने वाले कर्मचारियों ने अपनी नौकरी खो दी। इसमें से अगस्त में लगभग 33 लाख नौकरियां गईं और जुलाई में 48 लाख लोगों ने अपनी नौकरी खो दी।

सीएमआईई ने कहा है कि नौकरी का नुकसान केवल वेतनभोगी कर्मचारियों के बीच सहायक कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें औद्योगिक कर्मचारी और बड़े कर्मचारी भी शामिल हैं। साल 2019-20 के पूरे साल की तुलना में अगस्त में वेतनभोगी नौकरियां देश में 8.6 करोड़ से घटकर 6.5 करोड़ हो गईं।

सीएमआईई ने कहा, “सभी प्रकार के रोजगार में 2.1 करोड़ नौकरियों की कमी सबसे बड़ी है। जुलाई में लगभग 48 लाख वेतनभोगी नौकरियां गईं और फिर अगस्त में 33 लाख नौकरियां चली गईं|”

इस संदर्भ में सीएमआईई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) महेश व्यास ने कहा कि, “वेतनभोगियों की नौकरियां जल्दी नहीं जाती, लेकिन जब जाती है, तो दोबारा पाना बहुत मुश्किल होता है, इसलिए ये हमारे लिए चिंता का विषय है। वेतनभोगी नौकरियां 2019-20 के औसत से लगभग 1.90 करोड़ कम हैं।” एक अनुमानों के अनुसार, भारत में कुल रोजगार में वेतनभोगी रोजगार का हिस्सा सिर्फ 21 फीसदी है। अप्रैल में जितने लोग बेरोजगार हुए, उनमें इनकी संख्या केवल 15 फीसदी थी।

भारत की तीव्र वृद्धि के बाद भी वेतनभोगी रोजगार का अनुपात धीमी गति से बढ़ रहा है। वर्ष 2016-17 में 21.2% पर रहा अनुपात 2017-18 में 21.6% हो गया और 2018-19 में यह 21.9% दर्ज किया गया। इस अवधि में वास्तविक सकल मूल्य संवद्र्धन (जीवीए) सालाना 6-8 फीसदी की दर से बढ़ा। फिर 2019-20 में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 4 फीसदी पर आने के बीच वेतनभोगी कर्मियों का अनुपात गिरकर 21.3% रह गया।

सीएमआईई के मासिक आंकड़ों के अनुसार, देश की बेरोजग़ारी दर अगस्त में बढ़कर 8.35% हो गई, जो पिछले महीने में 7.40% थी।शहरी बेरोजग़ारी दर अगस्त में 9.37% से बढ़कर 9.83% हो गई, जबकि अगस्त में ग्रामीण बेरोजगारी दर अगस्त में बढ़कर 7.65% हो गई थी, जो उससे पिछले महीने की 6.51% थी।

सीएमआईई ने कहा है, “आर्थिक विकास के संकुचन के दौरान वेतनभोगी नौकरियां सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं। वेतनभोगी नौकरियां आर्थिक विकास या उद्यमशीलता में वृद्धि के साथ भी बढ़ती हुई दिखाई नहीं दे रही हैं।”

सरकार की संकल्पना और उनके रिपोर्ट

रिपोर्ट के मुताबिक दिहाड़ी मजदूरों पर भी काफी प्रभाव पड़ा था क्योंकि अप्रैल में 12.1 करोड़ में से 9.1 करोड़ नौकरियां चली गईं थी। हालांकि अगस्त तक इसमें सुधार हुआ और अब 2019-20 में कुल 12.8 करोड़ नौकरियों की तुलना में ये 1.1 करोड़ ही कम है।

उद्यमो में तीव्र वृद्धि होने के बावज़ूद भी वेतनभोगी नौकरियां उस अनुपात में नहीं बढ़ी हैं जिस हिसाब से बढ़नी चाहिए। वर्ष 2016-17 में उद्यम में मिलने वाला रोजगार कुल रोजगार का 13% था। वर्ष 2017-18 में यह अनुपात बढ़कर 15% हो गया और अगले दो वर्षों में यह क्रमश: 17% और 19% रहा है।  उद्यमियों की संख्या में वृद्धि के अनुपात में वेतनभोगी रोजगार नहीं बढ़ा है।

वर्ष 2016-17 में उद्यमियों की संख्या 5.4 करोड़ थी जो 2019-20 में बढ़कर 7.8 करोड़ हो गई। लेकिन इस दौरान सैलरी पाने वाले कर्मचारियों की संख्या 8.6 करोड़ पर ही स्थिर बनी रही। उद्यमियों की संख्या बढऩे के बावजूद भी वेतनभोगी नौकरियों की संख्या में वृद्धि नहीं हुई है। इसकी एक वजह यह भी है कि इनमें से अधिकतर उद्यमी स्वरोजगार में लगे हैं और वे किसी दूसरे को काम पर नहीं रख रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि वे बहुत छोटे स्तर के उद्यमी हैं।

सरकार ने यह संकल्पना रखी है कि लोगों को रोजगार मांगने के बजाय रोजगार देने वाला बनना चाहिए। उद्यमिता रोजगार सृजन का तरीका होने के बजाय अक्सर बेरोजगारी के चंगुल से बचने की एक कोशिश होती है। भारत 2016-17 के बाद से जिस तरह की उद्यमशीलता का उभार देख रहा है, वह वेतनभोगी रोजगार पैदा करने वाली नहीं दिख रही है। लेकिन यह मकसद पूरी तरह हासिल होता हुआ नहीं नजर आ रहा है।

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