क्या आपके मोबाइल का सोशल मीडिया एप्लीकेशन आपको एडिक्ट बना रहा है?

सोशल मीडिया तक पहुंचाता आपका ‘स्मार्ट’ फ़ोन

हाथों में मोबाइल एक चलती फिरती इंटरटेनमेंट की दुकान ही है। इसमें एक से बढ़कर एक एप्स है। उनके फ्रंट कैमरा और रीयर कैमरा के पिक्सेल्स की गिनती करते-करते आपकी गणित कमजोर पड़ जाएगी। छोटी सी स्क्रीन साइज में ऐसे चिपकी दो आंखों, मानो लंबी जुदाई के बाद मिल रहे प्रेमी। लेकिन यहां तो प्रेमी युगल बिछड़ते ही नहीं, मतलब ये की छोटी सी स्क्रीन से इस कदर चिपकी हुई है आंखें, वो भी लगातार कि दोनों आंखों के बीच के नाक की दीवार को भी किसी बागी प्रेमी की तरह तोड़ डालें। आंखों के काले गोलों के बीच के सारे फासले खत्म हो जाएं । अब यही हाल बच्चे, बूढ़े और जवान सभी का है।


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सोशल मीडिया में ट्रेंडिंग

खैर, हमें बात करनी है वायरल ऑन सोशल मीडिया की। कैसे काम करता है सोशल मीडिया जहां पढ़ना देखना सुनना शेयर करना, रिपीट

पढ़ना देखना सुनना शेयर करना, रिपीट पढ़ना देखना सुनना शेयर करना ।

और इसके परिणामस्वरूप व्यूज, लाइक्स और शेयरिंग बढ़ते हैं । अभी हायर व्यूज, हायर लाइक्स, हायर शेयरिंग वगैरह इन सोशल मीडिया पर ओपिनियन को इंश्योर करता है। मेरा मतलब सोशल मीडिया पोस्ट के कंटेंट और उस कंटेंट से होने वाले इनफ्लुएंस से नहीं बल्कि हायर व्यूज, हायर लाइक्स और हायर शेयरिंग के नंबर की वजह से उस पोस्ट को देखने के प्रति ओपिनियन इंश्योर होने से है, जिससे एक विशेष पोस्ट या वीडियो को देखने सुनने पढ़ने की रूचि पैदा हो जाती है‌‌ या कहें कि कर दी जाती है।

अब अगर इस पोस्ट को किसी सेलिब्रिटी ने लाइक कर दिया, शेयर कर दिया या उस पर कोई कमेंट कर दिया तो फिर इस पोस्ट का वायरल होना और ट्रेंडिंग होना पक्का।

आप इसे ऐसे समझे की पोस्ट पर हायर व्यूज की संख्या हायर लाइक्स की संख्या और शेयरिंग की संख्या हमें उस पोस्ट की ओर आकर्षित करती है, वहीं किसी सेलिब्रिटी से एंडोर्समेंट मिलने के बाद इसका वायरल होना और टॉप ट्रेंडिंग में आना लगभग तय हो जाता है । इस सेलिब्रिटी को आप फिल्म स्टार, स्पोर्ट्समैन पॉलिटिशियन आदि के रूप में जानते है। अब इनके नए-नए नाम भी सामने हैं जैसे टिकटोक स्टार, यूट्यूबर, फेसबुक सेलिब्रिटी, इंस्टा स्टार, वगैरह-वगैरह। ये हैं आज के मीडिया इन्फ्लूएंसर।

विज्ञापन का लक्ष्य

अब इसका एक और पहलू है आप जिस तरह के वीडियोज या पोस्ट देखते हैं या उसमें रुचि लेते हैं या उनको लाइक करते हैं या वैसे पोस्ट जिस पर आपने कमेंट किया है। जैसा लेखक पढ़ते हैं जैसा गीत संगीत आप सुनते हैं, देखते हैं, पसंद करते हैं उसी से मिलते जुलते पोस्ट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपको ज्यादा नजर आते हैं। फिर आपके इस बिहेवियर पैटर्न के आधार पर लगातार आपको संबंधित पोस्ट प्राप्त होते रहते हैं ।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एडवरटाइजर कंपनीज बिहेवियर पैटर्न के आधार पर अपने उत्पाद संबंधी स्पॉन्सर्ड पोस्ट अर्थात प्रायोजित पोस्ट डालती है। इस प्रकार अपने टारगेट ऑडियंस तक सीधा पहुंचने में कामयाब होती है। इसे एक उदाहरण से समझें, आपने किसी ऑनलाइन शॉपिंग साइट पर एक उत्पाद को देखा। मूल्य, गुणवत्ता इत्यादि पर आपने विचार किया किंतु कोई फैसला नहीं किया। अब आपके सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस उत्पाद के ऑनलाइन शॉपिंग साइट के विज्ञापन नजर आने लगते हैं। जिस उत्पाद को आपने देखा है मसलन् फर्नीचर, कपड़े आदि उससे जुड़ी कंपनियों के विज्ञापन भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर आने लग जाएंगे।

आपके सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इन विज्ञापनों की यह वाढ़़ आपके व्यवहार को प्रभावित करता है। यही विज्ञापन का लक्ष्य भी होता है। लेकिन यहां महत्वपूर्ण यह है कि ऐसा करने के लिए आप से अनुमति नहीं ली गई है।आपके व्यवहार को ट्रैक किया गया और इस ट्रेकिंग के लिए इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को विज्ञापनदाताओं से भारी आर्थिक लाभ मिलता है।  इस प्रकार का विज्ञापनदाता किसी उत्पाद का विक्रेता हो सकता है कोई राजनीतिक समूह या दल हो सकता है किसी धर्म पंथ में विश्वास करने वाला भी हो सकता है।

कुकी पॉलिसी (cookies policy)

अब समझते हैं कुकी पॉलिसी (cookies policy) । इस पाॅलिसी के तहत  इंटरनेट के माध्यम से किसी वेबसाइट पर आपकी उपस्थिति अर्थात् यूजर को ट्रैक करना और यूजर डाटा की ट्रैकिंग के आधार पर अपने वेबसाइट को आपके उपयोग के अनुकूल बनाने का उद्देश्य बताया जाता है। व्यवसायिक वेबसाइटों द्वारा आपके इस डाटा की शेयरिंग की जा सकती है।

आपसे संबंधित जानकारी को सार्वजनिक करने अथवा ना करने तथा यूजर को अपनी ट्रैकिंग से ऑप्ट आउट का विकल्प देना अर्थात अपनी ट्रैकिंग को सीमित करना या उसे प्रतिबंधित करने का विकल्प देना, इस पॉलिसी का हिस्सा होती है। वेबसाइट के मालिकों की इस पॉलिसी के अनुपालन को सामान्य तौरकुकीज़ पॉलिसी पर प्राइवेसी पॉलिसी के रूप में समझा जा सकता है। क्योंकि यह यूजर्स के बिहेवियर पैटर्न को ट्रैक और शेयर करते हैं।

 

तीनों पैराग्राफ में कही गई बातों को एक साथ देखें

  1. किसी पोस्ट अथवा वीडियो को ज्यादा व्यूज, लाइक्स और शेयरिंग के माध्यम से कैसे ट्रेंडिंग और वायरल बनाया जाता है।
  2. सेलिब्रिटीज और उनके विशाल फॉलोअर्स की भूमिका कैसे इस वीडियो अथवा पोस्ट को ज्यादा व्यूज, ज्यादा शेयरिंग और ज्यादा महत्त्व दिलाता है।
  3.  आपके व्यूइंग हैबिट्स के आधार पर किस प्रकार आपको दिखने वाले पोस्ट, वीडियो सजेशंस की लिस्ट तैयार होती जाती है।

यही हमारा मुद्दा है आपकी प्राइवेसी इनवेड होती है। आपके विचारों को धीरे-धीरे एक दिशा देने की कोशिश की जाती है। इसमें फेक न्यूज़, मिस इंफॉर्मेशन, माल इंफॉर्मेशन, डिसइनफॉरमेशन,  हेट स्पीच आदि की बड़ी भूमिका होती है उनका सहारा लिया जाता है।

प्राइवेसी हनन

प्राइवेसी अर्थात आप अपनी निजी जीवन में क्या करते हैं, ये बाजार, कंपनियों, सरकारों की विषय क्षेत्र से परे है। इसे हल्के-फुल्के उदाहरण से समझते हैं।एक दिन आप ने इंटरनेट के माध्यम से बड़े फ्लावर प्रिंट वाले चड्डी के डिजाइन देखें। आपने उत्सुकतावश इसे किसी ऑनलाइन शॉपिंग साइट पर भी देखा। आपने उस उत्पाद की कीमत, गुणवत्ता, ब्रांड का फैलाव आदि आदि सभी चीजों पर एक सरसरी नजर डाली, फिर उसे भूल गए।  यदि आपके स्कूल, कॉलेज, दफ्तर के मित्र इस पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा करें तो यही सामान्य सी बात असामान्य हो जाएगी ।

बाजार,कंपनियों, सरकारें इसी प्रकार से आपके चाहे-अनचाहे आपके निजी को सार्वजनिक कर देती है। जब वह आपके सभी सोशल मीडिया साइट्स पर इस उत्पाद से मिलते- जुलते उत्पाद के विज्ञापन प्रसारित करने लग जाती है। ये प्रायोजित विज्ञापन सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दिखने लग जाते हैं। यदि आपने अपने मित्र के लिए इंटरनेट पर कुछ सर्च किया था अथवा आपके मित्र ने आपसे आपका मोबाइल, कंप्यूटर या लैपटॉप लेकर के सर्च किया तो भी आपके आईपी एड्रेस को पहचान कर संबंधित विज्ञापन आपको मुफ्त में प्राप्त होने लग जाएंगे। इसी समस्या का नाम है, आप की निजता का हनन ।

उसी विज्ञापन के संदर्भ में अगर आप समझे तो आपने जिस चड्डी को किसी ऑनलाइन शॉपिंग साइट पर देखा उसका विज्ञापन आपके किसी  मित्र, आप के कार्यालय के सहकर्मी, आपके परिवार के किसी सदस्य अथवा आपके किसी नए दफ्तर के नए मित्र आपके न्यूज़ फीड में छापे वाली चड्डी का विज्ञापन देखेंगे और यदि उन्हें यह पता है कि ऑनलाइन शॉपिंग साइट आपके आपको वही विज्ञापन दिखाता है जिस प्रकार के उत्पाद की आप की खोज करते हैं।

निजता का बाज़ार में बिकाऊ माल की तरह बिकना

ऐसे में वे यह अनुमान लगाएंगे और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया होगी कि वह यह अनुमान लगाएंगे कि आप ऐसी चड्डी या तो पहनते हैं अथवा पसंद करते हैं। अब आपकी निजता को तो बाजार में बिकाऊ माल की तरह खरीदा बेचा जाता है, लाभ कमाया जाता है। इसका तरह तरह से दुरुपयोग होता है। इस डाटा का एक अलग बाजार जहां डाटा मालिक को व्यापार के संदर्भ में पता तक नहीं चलता अथवा उसकी कोई भागीदारी नहीं होती। अर्थात् हम और आप जो अपने डाटा के मालिक हैं, उनके डाटा का व्यापार बाजार में होता है और हमारी उसके व्यापार में अनुमति भी नहीं होती और लाभ में भागीदारी भी नहीं होती। याद रहे हमारी सरकारें भी इसमें शामिल हैं जहां कई मौकों पर राष्ट्र अध्यक्षों ने डाटा को सबसे बड़ा कैपिटल (पूंजी) माना है।

प्राइवेसी इनवेजन ने अपनी सभी सीमाओं को तोड़ दिया है और यूजर ट्रैकिंग के माध्यम से तैयार डाटा और इस डाटा व्यापार के माध्यम से लगातार हमारी निजता पर हमला हो रहा है हमारे ओपिनियन को अर्थात हमारे सोचने समझने को भी एक खास दिशा में मोड़ा जा रहा है। इस काम में बड़ी संख्या में प्रोफेशनल कंपनीया लगाई जाती हैं और यह बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया जाता है।

हमारी निजता पर हमले का उद्देश्य याद रहे हमेशा शुद्ध व्यापारिक नहीं होता। इसके उद्देश्य धार्मिक, सांस्कृतिक और सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप से राजनैतिक भी हैं। आपने जिस उत्पाद “चड्डी” का विज्ञापन देखा और मिलते-जुलते विज्ञापनों की बोम्बाडिऀग के माध्यम से जिस प्रकार आपको उस उत्पाद की तरफ आकर्षित करने का “टारगेटेड” प्रयास किया गया, अब आप इस उत्पाद “चड्डी” के स्थान पर “सांप्रदायिक उन्माद”, “राजनैतिक विद्वेष”, “छद्म सेक्यूलरवाद”, “छद्म राष्ट्रवाद” “छद्म सांस्कृतिक गौरव”  आदि जैसे विषयों को रख कर देखें । अब आपको निजता पर हमले (प्राइवेसी इनवेजन) के माध्यम से हमारे विचारों को प्रभावित करने की इस सुनियोजित योजना समस्या और उसकी गंभीरता समझ में आयेगी। इसका विरोध होना आवश्यक है।

 

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