गोवा की खूबसूरती को लगी किसकी नजर,आइए जानते हैं क्यों

भारत का एक बेहद खूबसूरत राज्य 

गोवा भारत के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित एक छोटा सा राज्य है जो अपने आप में बेहद रोचक और खूबसूरत है। ये अरब सागर के समुद्र के किनारे बसा हुआ है‌ जिसे भारत का फन कैपिटल भी कहते हैं क्योंकि यह एक बेहद लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। गोवा में हर वर्ष 2 मिलियन से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटक घूमने आते हैं और प्रकृति के इस उपहार का मजा लेते हैं। लेकिन हाल के दिनों में गोवा को लगी है किसी की नजर आइए जानते हैं इस बारे में।

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3 हजार से ज्यादा लोग उतरे रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शन करने

कुछ दिनों पहले ही गोवा में करीब 3 हजार से ज्यादा लोग अचानक रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शन करने उतर गए। हाथों में मोमबत्ती और पोस्टर लेकर लोग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे। लोगों का कहना है कि गोवा में एक प्रोजेक्ट के अंतर्गत 35000 से 8000 तक पेड़ों को काटा जा रहा है जिससे जनजीवन समेत प्रकृति पर प्रभाव पड़ेगा और वह इसी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।

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गोवा राज्य में तीन विकास कार्य नीति के तहत प्रोजेक्ट होने वाले 

यहाँ 3 विकासशील प्रोजेक्ट होने वाले हैं जिसमें से एक है  गोवा से कर्नाटक के रेलवे रूट को डबल करने का प्रोजेक्ट। दूसरा है नेशनल हाईवे के सड़कों को चौड़ा बनाने का प्रोजेक्ट और तीसरा और आखिरी प्रोजेक्ट है 400 किलोवाट पावर ट्रांसमिशन लाइन। इन प्रोजेक्ट के तहत आज गोवा के कई पर्यटक स्थल खतरे में हैं।

लोगों का कहना है कि यह सारे प्रोजेक्ट का एक ही मकसद है कि गोवा एक कोयला का हब बन जाए। ट्रांसमिशन लाइन बनाने का जो प्रोजेक्ट है उसके तहत गोवा के बंदरगाह से कोयला का लेन-देन कर्नाटक से हो सके इसलिए किया जा रहा है। हालांकि सरकार ने इन तमाम दावों को सिरे से ख़ारिज किया है।


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गोवा और कोयला का है पुराना रिश्ता

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गोवा और कोयला का रिश्ता कुछ नया नहीं बल्कि पुराना है। निजी कंपनियां गोवा के पोर्ट से कोयला कालीन दिन करती हैं। एक सर्वे के मुताबिक निजी कंपनियां 25 मिलियन टन कोयला का आयात करती हैं। गोवा के कोयला आयात का पर्वत पहले से काफी बड़ा है और आने वाले सालों में या और भी विशाल रूप ले सकता है।

आपको बता दें कि जब कॉल का आयात होता है मालगाड़ी या जहाज के द्वारा तो उस पर एक नीले रंग की परत रखी जाती है हवा के संपर्क में आने के बाद यह नीले रंग का चादर हट जाता है और कोयला के छोटे कंकड़ धूल के वजह से पूरे इलाके में प्रदूषण बढ़ जाती है।

पूर्व सीएम मनोहर पर्रिकर ने 2013 में इस प्रोजेक्ट को किया था ख़ारिज 

गोवा के पूर्व सीएम स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर ने वर्ष 2013 में गोवा के इसी प्रोजेक्ट को खारिज किया था।तब मनोहर पर्रिकर ने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि पर्यावरण से कोई समझौता नहीं किया जा सकता इसलिए वह इस प्रोजेक्ट को अस्वीकार करते हैं।

ग़ौर करने वाली बात यह है कि आज पूरा विश्व जहां प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है और कोयला के आयात निर्यात पर प्रतिबंध लगा रहा है तो भारत इसमें पीछे क्यों है? भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पेरिस जलवायु समझौता में यह बात कही थी कि भारत ग्रीन हाउस प्रदूषण को कम करने में दुनिया के साथ खड़ा है।

दूधसागर वॉटरफॉल भी खतरे में

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पर्यावरण से समझौता करना भारत के ना सिर्फ वर्तमान बल्कि भविष्य के लिए भी खतरे से खाली नहीं है। गोवा में स्थित लोकप्रिय दूधसागर वॉटरफॉल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। इस वाटरफॉल के आसपास कई संख्या में हरे भरे पेड़ मौजूद हैं जो इसे और भी ज्यादा आकर्षक और खूबसूरत बनाते हैं।

गोवा के प्रोजेक्ट के तहत वहां हजारों की संख्या में पेड़ों को काटा जाएगा जिससे साफ तौर पर पशु पक्षियों समेत कई लोगों की जिंदगी पर असर पड़ेगा। गोवा के पंचायत कानून के तहत उस इलाके में सरकार की ओर से जो भी कंस्ट्रक्शन को लेकर काम होगा इसकी सहमति लोगों से लेनी जरूरी होगी लेकिन इस प्रोजेक्ट के तहत अभी तक लोगों से और ना ही पंचायत से कोई राय मशवरा लिया गया है।

गोवा के मुख्यमंत्री का कहना है कि 

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा कि प्रोजेक्ट का विरोध भारत के बाहर से हो रहा है भारत के लोगों को इससे कोई आपत्ति नहीं है दूसरी तरफ भारत के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि अगर गोवा के लोकल लोगों को इस प्रोजेक्ट से आपत्ति है तो वह इस प्रोजेक्ट के खिलाफ एक्शन लेने का सोच सकते हैं।

इसी के तहत अब पर्यावरण मंत्रालय के पास कई संख्या में पिटीशन दायर किया जा रहा है।लोगों का कहना है कि गोवा की खूबसूरती उसका पर्यावरण है और इस से समझौता नहीं किया जा सकता।

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