जलवायु परिवर्तन से भारत की कृषि पर संकट बढ़ा, नए कृषि कानूनों से समस्या हो सकती है विकराल

लवायु परिवर्तन से भारत की कृषि पर संकट बढ़ा

भारत में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानूनों को लेकर किसान जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं। केंद्र सरकार का दावा है कि इन क़ानून से दीर्घकालीन कृषि संकट का समाधान निकलेगा। इन दावों का विभिन्न कोणों से विश्लेषण किया गया लेकिन हमेशा पर्यावरणीय कोण को अनदेखा किया गया। जिसमें जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की उर्वरक क्षमता में कमी जैसे कारक विद्यमान है।

जलवायु परिवर्तन

कृषि कानूनों में पर्यावरण पहलुओं को अनदेखा किया गया

केंद्र सरकार कार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानूनों में मुख्यतः कृषि उपज, विपरण, बिचौलियों की भूमिका आदि पर ध्यान केंद्रित किया गया है। लेकिन इसमें पर्यावरणीय पहलुओं जैसे की फसल के पैटर्न, सिंचाई की पद्धतियों के बारे में बात नहीं की गई है। जलवायु परिवर्तन की वजह से तापमान में उतार-चढ़ाव, बेमौसम बारिश, बाढ़, सूखा किट व बीमारियों की वजह से भारी मात्रा में फसलों का नुकसान होता है। ग़ौरतलब है कि हाल ही के वर्षों में जलवायु परिवर्तन की इन घटनाओं में वृद्धि हो गई है।

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इसके अलावा कृषि में जल समस्या का भी सामना करना पड़ता है। भारत में अधिकांश कृषि नहर, नलकूपों के बजाय वर्षा पर निर्भर है। इतना ही नहीं 1960 के दशक में उत्तर पश्चिमी और दक्षिण पूर्व में जो कि सबसे अधिक सिंचित क्षेत्र माने जाते हैं और हरित क्रांति में जहां पैदावार में काफी वृद्धि हुई थी अब वह जगह भी भूजल की कमी का सामना कर रही है। इसका ताजा उदाहरण है पंजाब के विशाल क्षेत्र जहां गेहूं और चावल की खेती की जाती थी अब वहां रेगिस्तान जैसी परिस्थिति विकसित हो रही है।

फसलों की पैदावार में गिरावट

फसलों में पैदावार की गिरावट के पीछे एक महत्वपूर्ण वजह है कृषि जैव विविधता  में गिरावट। दरअसल देश की मिट्टी दिन प्रतिदिन अपनी उर्वरक क्षमता को खोती जा रही है। जिस वजह से किसान पैदावार में सुधार के लिए लगातार रासायनिक उर्वरक कीटनाशक और ईंधनों का उपयोग तेज कर रहे हैं। जिस वजह से उर्वरकों की कीमतों में लगातार इजाफा होता जा रहा है।

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इन मुद्दों की वजह से किसानों पर कर्ज का संकट बढ़ता जा रहा है। कई किसान अपने खेतों को छोड़कर शहरों में चले आए हैं और यहां तक कि आत्महत्या करने को भी प्रेरित हुए। यह चीजें सिर्फ भूस्वामियों को ही नहीं बल्कि भूमिहीन मजदूरों को ज्यादा प्रभावित करते हैं।


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कारपोरेट खेती से किसानों का शोषण

नए कृषि कानूनों की वजह से खरीद प्रणालियों और भी नियमित बाजार के कमजोर होने की संभावना है। वहीं कृषि की लागत को कवर करने में न्यूनतम समर्थन मूल्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन इसकी अनुपस्थिति में किसानों के पास फसलों को स्थानांतरित करने के लिए कोई साधन नहीं बचता।

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कई किसान इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि नए कानूनों की वजह से उन्हें कॉर्पोरेट कृषि व्यवसाय के शोषण का शिकार होना पड़ेगा तथा अपनी जमीन खोनी पड़ेगी। इसका जवाब केवल समय ही बता सकता है कि यदि कृषि कानूनों को लागू किया जाता है तो यह चिताएँ कैसे खत्म होगी।

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