जानें आखिर हर साल उत्तर बिहार में बाढ़ का प्रकोप क्यों रहता है?

हर साल बिहार में ख़ासकर उत्तर बिहार का इलाका बाढ़ में पूरी तरीके से डूब जाता है. हर साल की तरह इस साल भी बाढ़ पूरे उत्तर बिहार में तबाही मचाये हुए है. सरकार भी इस बात को काफ़ी बेहतर तरीके से जानती है कि हर साल उत्तर बिहार में बाढ़ की समस्या आएगी. लेकिन फिर भी सरकार सचेत होकर इसके बारे में कोई खास काम नहीं करती है. अभी बिहार में लगभग 16 ज़िलों में बाढ़ की समस्या है, आज जिससे 73 लाख से ज़्यादा लोग प्रभावित हैं. आज हम लोग समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्यों उत्तर बिहार हर साल बाढ़ के प्रकोप क्यों रहता है?

उत्तर बिहार में बाढ़ के 4 बड़े कारण हैं:-

  1. प्राकृतिक छेड़छाड़
  2. नेपाल से आने वाली नदियां 
  3. बांध और,
  4. सरकारी रवैया

उत्तर बिहार के इलाकों में मानसून अच्छा रहने पर बिहार में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है. दरअसल जो नदियां यहां बाढ़ से तबाही मचाती हैं, उनमें ज़्रयादातर के ओरिजिन पॉइंट हिमालय के इलाकों के हैं. सभी गंगा की सहायक नदियां हैं. गंगा की सहायक नदियों की भी अपनी एक सहायक नदियां हैं; जैसे नेपाल में दाखिल होने वाली बागमती बिहार के कई जिलों से गुजरकर बूढ़ी गंडक से मिलती है उसके बाद बूढ़ी गंडक गंगा में. कमला और करछा बिहार आकर कोसी में मिलती है और बिहार में ही कोसी गंगा में मिलती है.

गंगा तक पहुंचने वाली नदियां प्राकृतिक रूप से नेपाल में कई छोटी-बड़ी नदियों को अपने में समेटे हुए बिहार में दाखिल होती हैं. इनमें कुछ का ओरिजन प्वाइंट तिब्बत भी है. बिहार की बाढ़ पर जब भी बात होती है नेपाल से आने वाली नदियों को वजह मान लिया जाता है, लेकिन सिर्फ एक यही वजह नहीं है. किसी भी देश की सीमा को कभी भी बाढ़ जैसी आपदा के वजह से जस्टिफाई नहीं किया जा सकता है. नेपाल ने अपने आप को बाढ़ से बचाने के लिए बांध बनाए हैं. जब भी नेपाल अपने आप को बचाने के लिए पानी छोड़ता है तब बिहार में ज़्यादा बाढ़ का खतरा बना रहता है.

बिहार में बाढ़ आने की एक सबसे बड़ी वजह प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना भी है. ग्लोबल वॉर्मिंग होने की वजह से ग्लेशियर का बहुत ज़्यादा पिघलना, बहुत ज़्यादा बारिश, रास्ते में नदियों के बेसिन पर अतिक्रमण, नदियों पर बने बांध, पहाड़ों में बहुत ज़्यादा भूस्खलन और उत्खनन एक बड़ी वजह है कि बिहार का एक इलाका हर साल बाढ़ में डूबता रहता है. यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के साथ ओरिजन प्वाइंट से ही नदियों में पानी की मात्रा बढ़ रही है.


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बिहार में हर साल सीतामढ़ी, शिवहर, मुज़फ्फ़रपुर, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, अररिया, दरभंगा, सुपौल और किशनगंज में सबसे ज़्यादा बाढ़ का सामना करना पड़ता है. यह इलाके नेपाल के बॉर्डर से भी सटे हुए हैं. लेकिन हर साल बिहार को बाढ़ में डूबने के लिए नेपाल की ज़रूरत नहीं पड़ती, बल्कि बिहार को हर साल डुबाने में सबसे बड़ा हाथ बिहार के राज्य सरकार का ही है. बाढ़ से बचने के लिए छोटे-छोटे नदियों के रास्तों में छोटे-छोटे तटबंध बनाए जा सकते थे, लेकिन फिर भी सरकार ने इन सारी चीजों पर ध्यान नहीं दिया. हालांकि बिहार में बाढ़ से बचने के लिए राज्य सरकार को विश्व बैंक की तरफ से भी मदद मिली थी, लेकिन फिर भी इस पर कोई खास काम नहीं किया गया.

हर साल उत्तर बिहार बाढ़ में डूबता है और उसके बाद सरकार भी सिर्फ मुआवज़ा देकर लोगों को उनके हालत पर ही छोड़ देती है. सरकार इस चीज पर ध्यान नहीं देती है कि जो लोग हर साल बाढ़ में मरते हैं या आर्थिक नुकसान झेलते हैं, उनके लिए कोई स्थायी उपाय निकाला जा सके. किसी को भी मुआवजा देना त्वरित कार्रवाई है लेकिन सब मुआवजा देकर छोड़ देना यह सरकार की असंवेदनशीलता को दिखाता है.

इस साल उत्तर बिहार में आई बाढ़ ने फिर से साबित कर दिया है कि बिहार राज्य सरकार कितनी असंवेदनशील है. बिहार में बाढ़ से 1200 से अधिक पंचायत और 74 लाख से अधिक लोग प्रभावित हैं. इस बाढ़ में 24 लोगों की मौत हो चुकी है.

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