जेल नियमावली में आज भी जाति व्यवस्था कायम, संविधान नहीं मनुस्मृति का कानून लागू

जेल नियमावली पुस्तिकाओं में पुरानी प्रथाएं हैं कायम

भारत में कैदियों के नियमावली को सभी अधिकार संगठनों और अकादमिया ने जाति के मसले को नज़रअंदाज़ किया है। वे इसे उठाते भी हैं तो परिशिष्ट के तौर पर,न कि किसी मुद्दे के अभिन्न हिस्से के तौर पर। जाति आधारित भेदभाव जैसे जेल में शौचालाय साफ करना करना, वॉर्ड के बरामदे में झाड़ू लगाना, पानी भरना और बाग़वानी जैसे अप्रतिष्ठित काम को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों द्वारा करवाना कैदियों के अधिकारों के विमर्श से संपूर्ण अनैतिक है।

जेल नियमावली 

साफ-सफाई का कार्य जाति पिरामिड में सबसे निचले पायदान के लोगों का,रसोई का कार्य पिरामिड में ऊपर खड़े लोगों का 

अब वर्ष 2016 में जेल में महज 18 साल के अजय की घटना को ही देख लीजिए। जहां जेल में एक हफ़्ते के बाद ही उसे पता चल गया कि यहां शौचालाय साफ करने का काम कुछ चुने हुए लोगों को ही करना पड़ता है। कामों का बँटवारा वहां बिल्कुल स्पष्ट था। यानी साफ-सफाई का कार्य जाति पिरामिड में सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों को करना होता था और पिरामिड में ऊपर खड़े लोगों को रसोई अथवा विधिक दस्तावेजीकरण विभाग (लीगल डॉक्यूमेंटेशन डिपार्टमेंट) में कार्य करना होता था। 

अजय कहते हैं कि जेल में बिताए हुए दिनों ने उनकी जिंदगी को कई मायनों में बदल दिया है क्योंकि रातों रात उन पर अपराधी का ठप्पा जो लगा दिया गया था और जेल में उनकी पहचान को बस एक छोटी जात वाले के तौर पर सीमित कर दिया था।अजय कहते हैं की उनकी ट्रेनिंग एक इलेक्ट्रिशियन के तौर पर हुई थी,मगर जेल के भीतर यह कोई मायने नहीं रखता था।वे कहते हैं कि उस बंद जगह में उन्हें जेल के गार्ड ने एक जाम हो गए सेप्टिक टैंक को साफ करने के लिए भी बुलाया था।

वो आगे कहते हैं कि जेल में किसी व्यक्ति की जीवन-शैली के आधार पर वे उसकी जाति बता सकते थे और अजय जैसे कैदियों को फ्रि में कार्य करवाने के लिए बुलाया जाता था। सच कहा जाए तो जाति आधारित श्रम कई राज्यों की जेल नियमावलियों (मैनुअल्स) में स्वीकृत है और 19वीं सदी के उत्तरार्ध के उपनिवेशी नियमों में शायद ही कोई संशोधन हुआ है एवं इन नियमवालियों में जाति आधारित श्रम वाले भाग को छुआ भी नहीं गया है।


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ब्राह्मण या अपने वर्ग से पर्याप्त उच्च जाति का कोई भी हिंदू कैदी रसोइए के तौर पर बहाली- जेल नियमावली

जानकारी के मुताबिक़ जेल में खाना बनाने और चिकित्सा सेवा की देखरेख का काम उच्च जाति का काम माना जाता है और वहीं झाड़ू लगाने एवं साफ-सफाई को सीधे निचली जाति को सौंप दिया जाता है। ग़ौरतलब है कि खाना बनाने के विभाग के बारे में जेल नियमावली कहती है कि कोई भी ब्राह्मण या अपने वर्ग से पर्याप्त उच्च जाति का कोई भी हिंदू कैदी रसोईए के तौर पर बहाली के लिए योग्य है।

जेल नियमावली 

वहीं इस नियमावली का ‘एम्पलॉयमेंट, इंस्ट्रक्शन एंड कंट्रोल ऑफ कंविक्ट्स’ (सिद्धदोषों का नियोजन, निर्देशन और नियंत्रण) शीर्षक वाला हिस्सा 10 कहता है (यह प्रिजनर एक्ट कैदी अधिनियम के अनुच्छेद 59 (12) के तहत नियमों में भी उद्धृत है) कि सफाईकर्मियों का चयन उनके मध्य से किया जाएगा। जो अपने निवास के जिले की परंपरा के अनुसार या उनके द्वारा पेशे को अपनाने के कारण सफाई-कर्मी (स्वीपर) का काम करते हैं- जब वे खाली हों।कोई भी अन्य कैदी स्वैच्छिक तौर पर यह काम कर सकता है लेकिन किसी भी स्थिति में एक व्यक्ति जो कि पेशेवर सफाई कर्मी (स्वीपर) नहीं है। उसे यह काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।

साथ ही हम आपको बता दें कि सभी राज्यों में जेल नियमावली एवं नियम आवश्यक दैनिक श्रम को तय करते हैं। श्रम का वितरण ‘शुद्धता-अशुद्धता’ के पैमाने पर किया गया है, जहां ऊंची जातियां केवल ‘शुद्ध/पवित्र’ माना जाने वाला कार्य करती हैं और ‘अशुद्ध/अपवित्र’ कार्य जातिगत सीढ़ी में नीचे आने वाली जातियों के लिए छोड़ दिया जाता है।

जेल आपको आपकी सही औकाद (औकात) बताता है- पूर्व कैदी पिंटू

इस मामले पर जुब्बा साहनी भागलपुर सेंट्रल जेल में करीब एक दशक और मोतिहारी सेंट्रल जेल में कुछ महीने बिताने वाले पूर्व कैदी पिंटू ने कहा कि जेल आपको आपकी सही औकाद (औकात) बताता है। नाई समुदाय से आने वाले पिंटू ने जेल के अपने प्रवास के दौरान जेल में नाई का काम किया है। बिहार जेल नियमावली भी श्रम में जाति पदानुक्रम को औपचारिक रूप देती है।

हालांकि समय-समय पर जेल नियमावलियों में कुछ परिवर्तन होते रहे हैं। मगर कुछ मौकों पर सार्वजनिक विरोध या सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ऐसा किया गया है एवं वहीं कुछ मौकों पर खुद राज्यों ने इसकी आवश्यकता महसूस की है मगर अधिकतर राज्यों में जातिगत श्रम विभाजन के सवाल को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है।

जेल नियमावली ‘धार्मिक व्यवहार एवं जाति आधारित पूर्वाग्रहों में हस्तक्षेप न करना’ राज्यों की नीति

जेल नियमावली 

जैसे मध्य प्रदेश जेल नियमावली जिसमें कुछ वर्ष पहले ही संशोधन किया गया था। मल वहन कार्य- हाथ से मैला उठाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला आधिकारिक पद- के जाति आधारित आवंटन को जारी रखती है।‘मल वहन’ शीर्षक अध्याय कहता है कि शौचालयों में मानव मल की साफ-सफाई की ज़िम्मेदारी ‘मेहतर कैदी’ की होगी।

हरियाणा और पंजाब राज्य की जेल नियमावलियों और नियमों में भी इस तरह के व्यवहारों का जिक्र मिलता है।जहां सफाईकर्मियों, नाइयों, रसोइयों, अस्पताल कर्मचारी आदि का चुनाव कैदियों की जाति पहचान के आधार पर किया जाता है।

इतना ही नहीं अगर किसी जेल में किसी जरूरी काम को करने के लिए जाति विशेष के कैदियों की कमी है, तो नज़दीकी जेलों से कैदियों को लाया जा सकता है,मगर नियमावली में किसी अपवाद या नियमों में परिवर्तन का कोई उल्लेख नहीं है।

उत्तर प्रदेश के तरह ही पश्चिम बंगाल की जेल नियमावली ‘धार्मिक व्यवहार एवं जाति आधारित पूर्वाग्रहों में हस्तक्षेप न करने’ की नीति पर चलती है।चूंकि जेल ‘राज्य सूची’ का विषय है, इस कारण से मॉडल जेल नियमावली में बदलावों की सिफारिशों को लागू करना पूरी तरह से राज्यों पर है।

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