जो मज़दूर पैदल बिहार वापस आये थे अब वापस बिहार से बाहर जा रहे हैं

लॉकडाउन में मज़दूरों का क्या हाल हुआ ये बात तो किसी से भी छुपी नही है। लोग किसी भी तरह अपने कर्मभूमि से जन्मभूमि में आने के लिए सब कुछ कर रहे थे। कोई पैदल पूरा रास्ता नाप रहा था, तो कोई मुंह मांगी कीमत देने को तैयार था। और अब भी मज़दूरो का पलायन थमने का नाम नही ले रहा, हां फर्क इतना है कि अब मज़दूर वापस अपनी कर्मभूमि में जाने को विवश हो रहे हैं। रोज़ मज़दूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण करने वाले मज़दूरों के परिवार के समक्ष भूखमरी की स्थिति बनने लगी है।


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क्षेत्र में पहले कोरोना और फिर बाढ़ ने लोगों के सामने रोज़ी-रोटी की समस्या उत्पन्न कर दी है। जिससे लोगों को जीवन यापन में परेशानी होने लगी है। और विडंबना देखिये जहां इन मज़दूरो को घर वापसी ने खून के आंसू रुला दिए, वहीं अब ज़रूरत मंद कंपनी के द्वारा पैसों का प्रलोभन देकर लग्जरी बस भेजकर मज़दूरों को बुलाया जा रहा है पर साथ ही काम खत्म होने पर पुन: वापस चले जाने को कह दिया जाता है।

बीते गुरुवार की रात खगड़िया ज़िले के धमारा घाट सहित अलग-अलग क्षेत्र के विभिन्न पंचायतों के एक जत्था मजदूर महाराष्ट्र जाने के लिए सोनवर्षा पहुंच कर बस का इंतज़ार कर रहे थे। मज़दूरों का कहना था कि कोरोना की परवाह किए अब पेट की समस्या हो गई है। यहां मज़दूरी नहीं मिल रही है जिस कारण दूसरे परदेश जा रहे हैं।

दर्जनों कामगार मज़दूरों ने कहा कि यहां बिहार में मज़दूरी नहीं चलने के कारण क़र्ज़ लेकर 3 महीने से परिवार चला रहे थे अब महाजन भी कर देना बंद कर दिया है। पलायन ही एकमात्र विकल्प रह गया है। 10 किलो अनाज दे देने से परिवार नहीं चलता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में 86478 प्रवासी मज़दूर आए थे।

बसैटी गांव के जहांगीर अंसारी ने बताया वह बीबी-बच्चों के साथ दिल्ली में मज़दूरी करते थे। लॉकडाउन के दौरान किसी तरह परिवार के साथ घर पहुंचे। उन्हें 21 दिनों तक स्कूल में क्वारंटाइन भी रहना पड़ा था। सोचा था कि अब कभी बाहर नहीं जाएंगे। अब, यहां महीनों से बेकार बैठे हैं। बूढ़े मां-बाप, बीबी-बच्चों के निवाले पर आफत आ गई है। वहीं बौंसी, मोहनी, मझ़ुआ आदि गांव के दिनेश, सुधीर, अशफाक आदि ने बताया कि आखिर कब तक घर में बैठे रहेंगे। यहां कोई रोज़गार नहीं मिला।

जहां लॉकडाउन के डेढ़ महीने बाद प्रवासियों के लिए स्पेशल ट्रेने चलाई जा रही थी, और बिहार में मज़दूरों को लेकर खूब राजनीति हुई वही सरकार की योजनाएं अब विफ़ल होती दिख रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दावा कर रहे हैं कि राज्य लौटे मज़दूरों को काम दिया जाएगा लेकिन पलायन रुक नहीं रहा है।

कोरोना और बाढ़ के बीच बिहार विधानसभा चुनाव के लिए भी कमर कसी जा रही है, पर लगता है बिहार चुनाव में प्रवासी मज़दूर अन्य मुद्दों की तरह ही एक और नया मुद्दा बन गया है। क्योंकि उनके बारे में बातें तो बहुत हो रही है पर ज़मीनी काम नही है।

बता दे कि लॉकडाउन में जब मज़दूर बिहार लौट रहे थे तो राज्य में मज़दूरों के लिए रोज़गार संबंधी कई योजनाओं का ऐलान किया गया था। उन्हें लगा कि घर के आस-पास कहीं काम मिल जाएगा। मगर यहां भी भूखमरी और बेरोज़गारी इंतज़ार कर रही थी। इसलिए वो लौटने पर मजबूर हो रहे है। उन्हें लगा था राज्य सरकार उनकी मदद करेगी कुछ मज़दूरों को मनरेगा के तहत मौका मिला भी पर सरकार का इरादा जान की सेवा करने से ज़्यादा अपनी सेवा करने का है।

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