यौन हिंसा जैसे अपराधों में ट्रांसजेंडर समुदाय को समान अधिकार की याचिका में सुनवाई के बाद SC ने केंद्र को नोटिस जारी किया

ट्रांसजेंडर समुदाय को  समान अधिकार की याचिका में सुनवाई 

देश में समय समय पर ट्रांसजेंडर्स समुदाय के लोग अपने लिए समान अधिकारों की मांग उठाते रहे है। हाल ही में ट्रांसजेंडर यौन हिंसा  के अपराध से खुद को बचाने के लिए भी केंद्र सरकार से समान कानून कि मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। 

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इस जनहित याचिका की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई हुई। इस मामले  में सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमणियन की पीठ इस पूरे को काफी जरूरी बताते हुए  केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया हैं।

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इस  जनहित याचिका में याचिकाकर्ता अधिवक्ता रीपक कंसल की ओर  वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह   पेश हुए थे और उन्होंने पूर्व में ट्रांसजेंडर समुदाय से हुए यौन हिंसा  मामले में कानून के अभाव में स्थिती से निपटने के लिए कोर्ट के दिए गए आदेशों के  विवरण उपलब्ध कराए जाने की मांग की है।

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इस जनहित याचिका में कानून मंत्रालय, सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय को पक्षकार बनाया बनाया गया है। साथ ही  अपराधों के संबंध में भारतीय दंड संहिता, 1860 के प्रावधानों के साथ ही इसमें और अन्य क़ानूनों में हाल ही में हुये संशोधनों का उल्लेख करते हुए दर्शाया गया है कि इसमें कहीं भी ट्रांसजेंडर, किन्नर और हिजड़ों के बारे में कोई जिक्र भी नही किया गया हैं।

याचिका में भारतीय दंड संहिता की धारा 354ए (महिला का शीलभंग करना) के कतिपय उपबंधों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुये कहा गया है कि इसकी व्याख्या में यौन हिंसा के शिकार ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों को बाहर रखा गया है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन होता है। 

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सिंह ने सभी क़ानूनों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से मांग किया की वह केंद्र सरकार को  यौन अपराध से जुड़े आईपीसी के प्रावधानों में उचित बदलाव या व्याख्या कर और इसकी परिभाषाओं में ट्रांसजेंडर, ट्रांससेक्शुअल और किन्नरों को शामिल करने का आदेश दे।

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जिससे ट्रांसजेंडर् समुदाय को उनका अधिकार  मिल सके। इस सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश देते अगली सुनवाई तक सुनवाई स्तघित कर दिया।

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