कवि डॉ यशवंत मनोहर ने सरस्वती की तस्वीर के कारण पुरस्कार लेने से मना किया

देश के जाने माने कवि डॉ यशवंत मनोहर 

भारत कवियों और अर्थशास्त्रियों का देश रहा है। प्राचीन काल से ही यहां कई जाने-माने कवियों ने जन्म लिया और देश का नाम गौरवान्वित किया। उन्हीं में से एक डॉ यशवंत मनोहर थे। जिन्होंने सरस्वती की तस्वीर लगे ‌होने के कारण पुरस्कार लेने से मना कर दिया। उन्होंने मंच पर मौजूद सरस्वती की तस्वीर का विरोध करते हुए पुरस्कार लेने से इनकार किया। दरअसल विदर्भ साहित्य संघ कि समिति ने डॉ यशवंत मनोहर को लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार देने का फैसला किया था। इस कार्यक्रम का निमंत्रण उन्हें 1 महीने पहले ही भेज दिया गया था।

यशवंत मनोहर: वो कवि जिन्होंने सरस्वती की तस्वीर के कारण पुरस्कार नहीं लिया - BBC News हिंदी

यशवंत मनोहर ने कहा मूल्यों के खिलाफ नहीं जा सकता

मंच पर लगे सरस्वती की तस्वीर का विरोध करते हुए उन्होंने अपना पुरस्कार लेने से मना किया और वह कहते हैं मैं अपने मूल्यों के खिलाफ जाकर इस पुरस्कार को स्वीकार नहीं कर सकता। विदर्भ साहित्य संघ के अध्यक्ष मनोहर म्हैसलकर ने साहित्यकार द्वारा विरोध जताने को लेकर कहा कि वह डॉक्टर मनोहर के सिद्धांतों की इज़्ज़त करते हैं लेकिन उन्हें भी अपनी परंपराओं का सम्मान करना चाहिए।

डॉ. यशवंत मनोहर यांची कविता I माय मराठी I MAY MARATHI I DR.YASHWANT MANOHAR - YouTube

मीडिया से बातचीत के दौरान डॉ यशवंत मनोहर ने कहा कि वह धर्मनिरपेक्षता का पालन करते हैं और लेखक के रूप में यह स्वीकार नहीं कर सकते। उन्होंने बताया कि मंच पर क्या उपलब्ध होगा इस संदर्भ में उन्हें जानकारी मिली थी कि मंच पर सरस्वती की तस्वीर लगाई जाएगी। इसी का विरोध जताते हुए उन्होंने विनम्रता पूर्वक पुरस्कार लेने से मना कर दिया। विरोध प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने प्रश्न पूछा कि सरस्वती की जगह क्या हम सावित्रीबाई फुले या भारत के संविधान की तस्वीर क्यों नहीं रख सकते? मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उनका विरोध साहित्य संघ या किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं हैं बल्कि मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि मैं भारत का निवासी हूं और यह मेरे सिद्धांतों के विपरीत है कि मैं वहां से पुरस्कार स्वीकार करूं जहां सरस्वती की तस्वीर लगी है।


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विदर्भ साहित्य संघ ने कहा सरस्वती की तस्वीर लगाना उनकी परंपरा 

डॉ यशवंत मनोहर 

विदर्भ साहित्य संघ के अध्यक्ष मनोहर म्हैसलकर ने कहा कि किसी भी विरोध के चलते वह अपनी परंपरा नहीं बदलेंगे। एक संगठन में कुछ रीति-रिवाज़ों का पालन करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हम मकर संक्रांति के त्यौहार को हम अपने स्थापना दिवस के रुप में मनाते हैं। मंच पर सरस्वती की तस्वीर रखना एक परंपरा है और इस परंपरा को आगे भी चलाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इससे पहले भी कई साहित्यकारों को पुरस्कार दिया गया है फिर चाहे वह दूसरे धर्म से भी क्यों ना हो लेकिन किसी ने भी सरस्वती की तस्वीर हटाने की शर्त नहीं रखी।

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