देश की उच्च शिक्षा में आदिवासी और दलितों की स्थिति पर विचार की जरुरत

उच्च शिक्षा में आदिवासी और दलितों की जगह 

दलित और आदिवासी जिन्हें आज़ादी से पहले ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार दबे-कुचले वर्ग के नाम से बुलाती थी। आज भारत सरकारी आंकड़ों में इन्हे अनुसूचित जाति एवं जनजाति के नाम से जाना जाता है। लेकिन उनके शिक्षा स्थिति की बात करे तो आजादी के इतने वर्षों के बाद भी कोई खास बदलाव नहीं आया है।

CBSE exam fees for SC/ST students up 24 times, general category's doubled | Business Standard News

भारत के 10 सर्वश्रेष्ठ विश्वविधालयों में से 7 में सिर्फ 22 फीसदी  SC/ST 

देश में वर्षों से कई सरकारें आयी गई लेकिन किसी ने भी समाज के दबे हुए जाती के लिए कुछ खास काम ज़मीनी तौर पर नहीं किया। आज भी कागज़ों पर SC/ST छात्रों के लिए एक खास फीसदी के सीट कॉलेज, स्कूल एवं विश्वविद्यालयों में सुरक्षित रखा जाता है लेकिन हकीक़त यह है कि आर्थिक तंगी, सूचनाओं की कमी आदि कारणों की वजह से उन्हें दाख़िला अच्छे जगह नहीं मिल पाता और वह गरीबी से नहीं निकल पाते।


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केवल 11 प्रतिशत  दलित/आदिवासी छात्र अंडर ग्रैजुएट कोर्सेज में नामांकित

उच्च शिक्षा में SC/ST छात्र की स्थिति सुधारने के लिए आरक्षण की व्यवस्था भी की गई लेकिन इससे भी कुछ खास फर्क देखने को नहीं मिला। आरक्षण का मक़सद दलितों की भलाई और उनकी तरक़्क़ी था लेकिन इसने गिने-चुने लोगों को फ़ायदा पहुंचाया है। इसकी वजह से ज़ाति-व्यवस्था के समर्थक इस जातीय बँटवारे को बनाए रखने में कामयाब रहे हैं जो कि दलित हितों के लिए नुक़सानदेह है।

सरकारी स्कूलों की पढ़ाई की गुणवत्ता बेहद खराब

Govt. directs all state schools to stop discrimination against SC/ST, Muslim students | Civil News

स्कूल जो पढ़ाई की बुनियाद बनाती है उसकी हालत देखे तो बहुत बरी स्थिति हमे देखने को मिलती है। सरकारी  स्कूलों मे आज दलितों और आदिवासियों की संख्या दूसरी जातियों के मुक़ाबले ज़्यादा है लेकिन यहां सही तरीके से पढ़ाई नहीं हो पाती। जिसके बाद ऊंचे दर्जे की पढ़ाई का रुख़ करते-करते छात्रों की तादाद घटने लगती है। आज ऊंचे दर्जे की पढा़ई छोड़ने की दलितों की दर, गैर दलितों के मुक़ाबले दो गुनी है। आखिर में पढ़ाई का स्तर अच्छा नहीं होने की वजह से उन्हें रोज़गार भी अच्छा नहीं  मिलता है।

सरकारी नौकरी में स्थिति थोड़ी बेहतर पर बहुत कम अवसर 

Following sharp criticism over SC order on freebies, EC to meet parties on manifesto guidelines - India News

उदारीकरण के बाद सरकारी नौकरियाँ कम हुई हैं। निजी क्षेत्र की जो अपेक्षाएँ हैं उनके अनुरूप शिक्षा और तकनीकी निपुणता हासिल करना इन जातियों के लिए बेहद मुश्किल है। इसलिए प्राइवेट सेक्टर में बड़ी नौकरियों के दरवाज़े इनके लिए नहीं खुल रहे। सिर्फ नारों से दलित-आदिवासियों का उत्थान नहीं होगा। सरकार को वे तमाम प्रयास करने होंगे जिनसे वे उच्च शिक्षित और निपुण बन सकें।

कोरोना महामारी की दुगनी मार

कोरोना काल में स्कूल और कॉलेज बंद होने के कारण बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न हो इसके लिए ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की गईं। पर इसके लिए पूरी तैयारियाँ नहीं की गईं। जिसकी वजह से गरीब परिवार से आने वाले छात्र और परेशान है। 

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दलितों और आदवासियों  के मौजूदा हालात से एकदम साफ़ है कि संवैधानिक उपाय, दलितों की दशा सुधारने में उतने असरदार नहीं साबित हुए हैं जितनी उम्मीद थी और इसके लिए आरक्षण एकमात्र उपाय नहीं है सरकार और समाज को साथ मिलकर काम करने के जरूरत है  ताकि सही मायनों में सबका साथ, सबका विकास हो सके सिर्फ नारों तक ही यह सीमित ना रहे।

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