दिल्ली दंगे: झूठ, नफ़रत और पुलिसिया दमन के एक साल की कहानी

कैसे हुई दंगे की शुरुआत?

आज से 1 साल पहले दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में हुए दंगे से राजधानी के इतिहास में दाग लगा।  मंगलवार 23 फरवरी को दिल्ली दंगे का 1 साल पूरा हो जाएगा। दिल्ली दंगे 7 दिन तक यानी कि 23 फरवरी से 29 फरवरी तक चलें। पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक दंगे में करीब 53 लोगों की मौत हुई जिसमें से 40 लोग मुस्लिम समुदाय से थे जबकि 13 लोग हिंदू समुदाय से थे।

दिल्ली पुलिस द्वारा इस मामले में 751 एफ़आईआर दर्ज किए गए। हालांकि पुलिस ने इस मामले से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं किया। उनका कहना था कि यह जानकारियां काफी संवेदनशील है जिस वजह से इन्हें वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया जा सकता।

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साल 2019 के दिसंबर महीने में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) बनाया गया जिसके बाद से ही इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली में भी कई जगहों पर इसके खिलाफ प्रदर्शन किए गए। सीएए के खिलाफ शुरू हुए प्रदर्शनों का अंत दिल्ली दंगे के रूप में हुआ।

दिल्ली दंगे में कपिल मिश्रा की भूमिका

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23 फरवरी को बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने मौजपुर में भाषण दिया और इसके तुरंत बाद ही दंगे भड़क उठे। दरअसल इस भाषण में कपिल मिश्रा ने जाफराबाद में सीएए के विरोध प्रदर्शन में बैठे लोगों को जबरदस्ती वहां से हटाने की बात कही थी। कपिल मिश्रा ने अपने भाषण में कहा कि, “डीसीपी साहब हमारे सामने खड़े हैं। मैं आप सब की ओर से कह रहा हूं कि ट्रम्प के जाने तक हम शांत रहेंगे। लेकिन उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे। अगर रास्ता खाली नहीं हुआ तो ट्रम्प के जाने तक पुलिस जाफराबाद और चांद बाग खाली करवाए, ऐसी विनती है वरना उसके बाद हमें रोड पर आना पड़ेगा।”

जिसके बाद ही हथियारबंद भीड़ का एक समूह उत्तर पूर्वी दिल्ली के इलाकों में घुस गया तथा वहां दंगे भड़क उठे।

सबसे हैरत की बात यह थी कि कपिल मिश्रा के भड़काऊ भाषण के दौरान दिल्ली पुलिस के डीसीपी वेद प्रकाश सूर्या भी वहां पर मौजूद थे। लेकिन पुलिस द्वारा कपिल मिश्रा को रोकने के लिए कोई भी कार्यवाही नहीं की गई। पुलिस की 13 दिसंबर को शुरू हुई पूछताछ में कपिल मिश्रा के इस भाषण को दर्ज नहीं किया गया।

जब हाई कोर्ट से इस बारे में पुलिस से सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि, “हमें इस बारे में कोई सबूत नहीं मिले हैं जिससे यह पता चले कि इस भाषण से दिल्ली में दंगे हुए है।“ हालांकि एफ़आईआर 59 की चार्जशीट में कपिल मिश्रा के नाम का जिक्र किया गया। लेकिन 28 जुलाई 2020 को जब कपिल मिश्रा से पूछताछ की गई तो उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई स्पीच ही नहीं दी थी। इस पूछताछ के बाद इस मामले को लेकर क्या जांच हुई इस बारे में चार्जशीट में कुछ भी नहीं बताया गया।

दिल्ली दंगे में अंकित शर्मा की हत्या और ताहिर हुसैन की भूमिका

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दिल्ली दंगे में मारे गए अंकित शर्मा का मामला लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा। अंकित शर्मा के पिता रविंद्र कुमार ने जो एफ़आईआर दर्ज की थी उसके मुताबिक 25 फरवरी शाम 5:00 बजे अंकित शर्मा, घर से बाजार सामान लेने के लिए गए। लेकिन बहुत समय तक उनका कोई पता नहीं चला। इधर उधर पूछताछ करने पर अंकित शर्मा के पिता को पता चला कि वह उनके पड़ोसी कालू के साथ गए थे। जब कालू से इस बारे में पूछताछ की गई तो उसने बताया कि चांदबाग एक मस्जिद में किसी लड़के को मारकर नाले में फेंक दिया है। जिसके बाद अंकित शर्मा के पिता ने दयालपुर थाने में इसकी सूचना दी। गोताखोरों द्वारा लाश को बाहर निकाला गया और इसकी पहचान अंकित शर्मा के रूप में हुई।

पुलिस ने इस मामले में चश्मदीदों से पूछताछ की जिसमें पुलिस ने बताया कि, “ताहिर हुसैन के मकान से कुछ दूरी पर हिंदुओं की भीड़ खड़ी थी। भीड़ से अंकित बाहर आए तथा दोनों ओर के लोगों को शांत करने की कोशिश की। लेकिन भीड़ ने ताहिर के भड़काने के बाद अंकित को पकड़कर पुलिस के सामने पकड़ कर उसे नाला रोड ले गए जहां धारदार हथियार से उसकी हत्या कर उसे नाले में फेंक दिया गया।”

पुलिस ने बताया कि ताहिर हुसैन के घर की छत से बोतले और पत्थर बरामद हुई है लेकिन इस मामले में ताहिर ने बताया कि जिस घर की छत पर यह सब चीजें बरामद हुई है असल में वह उस घर में रहते ही नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि दंगे रुकवाने के लिए उन्होंने पुलिस को बुलवाया लेकिन पुलिस वहां नहीं पहुंची। वे कहते हैं कि इस मामले में वे बेकसूर हैं तथा उन्हें फंसाया गया है।”


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दंगे के आरोप में गिरफ्तार छात्र नेता और कार्यकर्ता

दंगों

दिल्ली दंगों के आरोप में अलग-अलग एफ़आईआर और चार्जसीट के जरिए छात्र नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। इस संबंध में एफ़आईआर संख्या 59 में कई के नाम दर्ज हुए तथा इन पर यूएपीए की धाराएं लगाई गई। इसी में 13 सितंबर 2020 को उमर खालिद को गिरफ्तार किया गया अभी तक उमर इस मामले में न्यायिक हिरासत में  है। इसके अलावा खालिद सैफी, इशरत जहां, शादाब अहमद, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, आसिफ इकबाल तन्हा आदि के नाम एफ़आईआर में पहले से मौजूद थे।

इस संबंध में नताशा नरवाल और देवांगना कलिता की गिरफ्तारी चर्चा का विषय बनी हुई है। 30 मई को नताशा और देवांगना को गिरफ्तार किया गया उन पर यह आरोप लगा कि उन्होंने जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर हुई हिंसा से एक दिन पहले ही सीएए के खिलाफ प्रदर्शन का आयोजन किया था। लेकिन 24 मई को ही एक मेट्रोपॉलिटन न्यायालय द्वारा उन्हें यह कहते हुए जमानत दिया गया कि वह प्रदर्शन कर रही थी तथा इससे यह साबित नहीं होता कि वह हिंसा में शामिल थी। लेकिन इसके बाद ही उसी दिन उन्हें एफ़आईआर 50 के तहत गिरफ्तार किया गया जिसमें कहा गया कि इन दोनों ने दंगों की साजिश रची तथा इसका आधार व्हाट्सएप मैसेजेस को बनाया गया। वहीं दूसरी ओर देवांगना को गिरफ्तारी के बाद 2 जून को एक अदालत द्वारा यह कहकर जमानत दिया गया था कि ‘उनके खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने किसी सरकारी कर्मचारी पर हमला किया।’ लेकिन देवांगना को भी 5 जून को एफ़आईआर 59 के तहत गिरफ्तार किया गया तथा उन पर यूएपीए लगा दिया गया।

बता दे हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने नताशा नरवाल और देवांगना कलिता की अपील पर दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब तलब किया है। न्यायालय ने 10 मार्च तक जवाब देने के निर्देश दिए है।

दिल्ली दंगे में पुलिस की भूमिका पर बड़ा सवाल

मानवाधिकारों पर काम करने वाला अंतरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में इस साल फ़रवरी में हुए दंगों पर अपनी स्वतंत्र जांच रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस पर दिल्ली दंगों ना रोकने, उनमें शामिल होने, फ़ोन पर मदद मांगने पर मना करने, पीड़ित लोगों को अस्पताल तक पहुंचने से रोकने, ख़ास तौर पर मुसलमान समुदाय के साथ मारपीट करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। संस्था ने एक नया जांच ब्यौरा बनाते हुए कहा कि हिंसा में दिल्ली पुलिस के जवान न सिर्फ शामिल थे बल्कि उन्होंने इस हिंसा में सक्रिय रूप से हिस्सा भी लिया था, लेकिन इसके सबूत होते हुए भी कोई जांच शुरू नहीं की गई।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक अविनाश कुमार के मुताबिक, “सत्ता की तरफ़ से मिल रहे इस संरक्षण से तो यही संदेश जाता है कि क़ानून लागू करनेवाले अधिकारी बिना जवाबदेही के मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं। यानी वो ख़ुद ही अपना क़ानून चला सकते हैं।”

इससे पहले भी दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने दिल्ली दंगों पर एक फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग रिपोर्ट जुलाई में जारी की थी। साथ ही दिल्ली पुलिस पर दंगे को मुसलमान समुदाय को निशाना बनाने की साज़िश की जगह ग़लत तरीक़े से दो समुदाय के बीच का झगड़ा बनाकर पेश करने का आरोप लगाया गया था। इस रिपोर्ट के अनुसार कई पीड़ितों ने पुलिस के एफ़आईआर दर्ज ना करने, समझौता करने के लिए धमकाने और उन्हीं पर हिंसा का आरोप लगाकर दूसरे मामलों में अभियुक्त बनाने की शिकायत की थी।

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