अगर आज नागार्जुन होतें तो क्या वो भी देशद्रोही हो जातें?

हिंदी और मैथिली लेखक कवि नागार्जुन

आज का वक़्त जब कवियों के कलम की स्याही सूख चुकी है और कटाक्ष के बदले लोगों को UAPA या फिर देशद्रोही होने के तमगे दिए जाने लगे हैं। ऐसे वक़्त में अगर नागार्जुन होतें और लिखतें- 

जिस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक

जिसमें कानी हो गयी शासन की बन्दूक

ऐसे में क्या फक्कड़-घुमक्कड़ कवि बाबा भी देशद्रोही हो जातें?

नागार्जुन की पुण्यतिथि पर आइए जानते हैं,उनके विषय में कुछ महत्वपूर्ण  बातें। नागार्जुन एक ऐसे कवि जिनकी काव्य में सर्वप्रमुख प्रगतिवाद चेतना थी और उनका मुख्य आधार किसान तथा मजदूर थे एवं जो सही मायने में जनता के कवि हैं। एक मार्क्सवादी कवि जिन्होंने अपनी कविताओं में माध्यम से  मार्क्सवादी सिद्धांतों का प्रचार भी किया।

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नागार्जुन ने अपनी रचनाओं से  सामाजिक यथार्थ का सूक्ष्म चित्रण किया और हिन्दी, मैथिली, बांग्ला, संस्कृत के अप्रतिम लेखक नागार्जुन उन चुनिंदा रचनाकारों में से थें जिनके द्वारा रचित रचनाओं का दायरा बड़ा ही विस्तृत रहा।

जिन्होंने अपनी रचनाओं में श्रमिक, शोशित और दलित समाज के दुखों और कष्टों का चित्रण किया है। नागार्जुन की अधिकांश कविताओं में सामाजिक, राजनीतिक और  आर्थिक विषमताओं को लेकर जनवादी चेतना का चित्रण हुआ है।उनकी कविताएं समाज के विभिन्न तत्थयों को उजागर करती है।उनके बारे में सबसे अहम बात है कि वे बहुभाषी थे।

जिस तरह से वे अपनी मातृभाषा में कविता, कहानी और गीत लिखते थे उसी तरह से वो दूसरी भाषाओं में भी लिख लेते थे, उनके अंदर यह अदभुत कला थी कि वो अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषाओं में भी किस तरह से बेहतर लिख लेते। नागार्जुन मूलतः मैथिली भाषी थे और यात्रा नाम से मैथिली में कविता भी लिखा करते थें।


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 नागार्जुन एक जनकवि

हिंदी और मैथिली भाषा के अप्रतिम लेखक और कवि नागार्जुन  का जन्म 30 जून 1911 को  वर्तमान मधुबनी जिले के सतलखा में हुआ था।उनका पैतृक गाँव वर्तमान दरभंगा जिले का तरौनी था। नागार्जुन के बचपन का नाम ‘ठक्कन मिसर’ था। मात्र 6 साल की आयु में ही उनकी माता का देहांत हो गया और इस प्रकार बचपन में ही इधर उधर घूमने की आदत पड़ गई और बड़े होकर यह घूमना उनके जीवन का स्वाभाविक अंग बन गया।

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नागार्जुन ऐसे जनकवि थे जिसने, रोज़ी-रोटी, सूअर, कटहल और जन-गण-मन तक सब पर लिखा।अपने समय की हर महत्वपूर्ण घटनाओं पर प्रहार करती कवितायें लिखने वाले  नागार्जुन एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं और भाषाओं में लेखन के साथ-साथ जनान्दोलनों में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और कुशासन के खिलाफ तनकर खड़े रहे।

शायद ही कोई साहित्यकार या कवि ऐसा हो जो  नागार्जुन जैसा हो, जो उनको छू पाए। सभ्य समाज और राजनीति के मुंह पर आज भी उनकी कविताएं करारा तमाचा हैं।नागार्जुन की एक और खासियत थी वो उन कुछ एक कवियों में से थे, जो अपनी कविताओं से एक पाठक के लिए चुनौती पेश करते थे।परंतु दुर्भाग्यपूर्ण 5 नवम्बर 1998 को वो हमें छोड़ कर चले गए।

व्यंग्य ही उनकी सबसे बड़ी ताकत

नागार्जुन हिंदी के ऐसे कवि हैं जो निर्विवाद रूप से जनकवि माने जाते हैं। आज भी वे लोकतंत्र की पहरेदारी और राजनीति पर कटाक्ष करने के मामले में  सभी कवियों में सबसे आगे खड़े मिलते हैं।वे जनता की तरफ प्रतिबद्धता से खड़े होकर सत्ता से बहुत कड़े सवाल पूछते हैं, चाहे वह तानाशाह होने की हद तक पहुंच चुकी आपातकाल लगाने वाली इंदिरा गांधी ही क्यों न हों। नागार्जुन ने अपनी कविताओं में जहां एक तरफ इंदिरा गांधी जैसे नेताओं की खबर ली तो दूसरी तरफ आम अवाम के जीवन को जुबान दी।

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नागार्जुन का व्यंग्य ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी ,कहा जाता है कि उनको इस दिशा में महारथ हासिल थी और व्यंग्य का इससे अच्छा स्वरुप क्या होगा कि जब कोई आपसे मिलने आए तो आप मेहमान का स्वागत व्यंग्य से करिए। स्वागत और व्यंग्य पर भी नागार्जुन से सम्बंधित एक प्रसंग जुड़ा है। कहते हैं कि जब आजादी के बाद ब्रिटेन की महारानी अपने भारत के दौरे पर आई तो उनके स्वागत में उन्होंने एक कविता लिखी थी जिसमें उन्होंने तब के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर निशाना साधा था।

नागार्जुन ने कहा था, ‘जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊं जनकवि हूं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं’

नागार्जुन एक ऐसे कवि थे जो अपने स्वरों को खेतों-खलिहानों, किसानों–मजदूरों तक ले गए और उनके  दर्द को जिया और उसे कागज पर उतारा। उन्होंने अपनी रचनाओं से बार बार हमारे मृत संवेदना को जगाने का प्रयास किया इसलिए अगर आज नागार्जुन होते तो वो बिल्कुल भी  देशद्रोही नहीं हो जाते। नागार्जुन ने कहा था कि, ‘जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊं जनकवि हूं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं’।

इसमें कोई संदेह नहीं कि नागार्जुन की कवितों का मूल स्वर जनतांत्रिक है, जिसे उन्होंने लोक संस्कार, मानवीय पीड़ा और करुणा से लगातार सींचा है।उनके काव्य की महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उनकी कविताएं पूरे हिन्दी प्रांत और देश की कविता है। ऐसे महान कवि के बारे में जितना लिखा जाय कम ही होगा।

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