पटेल से पहले नेहरू प्रधानमन्त्री पद के लिए क्यों थे गांधी जी की पहली पसंद?

गांधी के साथ नेहरू और पटेल के रिश्ते

भारत के पहले गृह मंत्री और लौह पुरूष के नाम से विख्यात सरदार वल्लभ भाई पटेल के 145 वीं जयंती पर पर देश के लोग उनके द्वारा किए गए योगदान को याद कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहें हैं। लेकिन आज भी बहुत लोगो को उनके योगदान तो याद है लेकिन उनके बलिदान के बारे में नहीं पता है।

भारत आजादी के बाद बहुत ही  नाज़ुक़ दौर से गुजर रहा था, एक तरफ जिन्ना पाकिस्तान की जिद पर अड़े थे वहीं  ब्रिटिश हुकूमत कांग्रेस को अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर रही थी। कांग्रेस चाहती थी कि देश की कमान सरदार पटेल के हाथों में दी जाए क्योंकि वे वरिष्ठ नेता थे और  जिन्ना से बेहतर मोलभाव कर सकते थे, लेकिन गांधी ने प्रधानमंत्री के पद के लिए नेहरू को चुना।

गांधी

महात्मा गांधी के इस फैसले का विरोध  राजेन्द्र प्रसाद जैसे कुछ कांग्रेस नेताओं ने खुलकर क़िया था और  कहा  था कि ‘गांधीजी ने ग्लैमरस नेहरू के लिए अपने विश्वसनीय साथी का बलिदान कर दिया।’

आपके मन  भी यह सवाल जरूर उठ रहा  होगा कि आख़िर बापू ने देश की बागडोर सौंपने के लिए नेहरू को ही क्यों चुना? इसका कारण को तलाशने के लिए हमें ब्रिटिश राज के अंतिम वर्षों की राजनीति और गांधी के साथ नेहरू और पटेल के रिश्तों की बारीकियों समझना होगा।

शुरुआत में सरदार वल्लभ भाई पटेल को गांधी जी पसंद नहीं थे लेकिन बाद में चंपारण में किसान आंदोलन और  खेड़ा का आंदोलन से पटेल  गांधी के करीब आ गए और दोनों साथ मिलकर काम करने लगे और जब देश आजाद हुआ तब तय था कि जो कांग्रेस का अध्यक्ष चुना जायेगा वहीं देश का प्रधानमंत्री बनेगा।


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अध्यक्ष के चुनाव से पहले ही यह बात फैल चुकी थी कि गांधी जी नेहरू को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते है। इसलिए जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई तब बहुमत ना होने के बावजूद नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना गया और पटेल ने गांधी जी के इशारे पर अपना नाम वापस ले लिया। जे बी कृपलानी ने ‌अपनी किताब ‘गांधी हिज़ लाइफ एंड थाटॅ्स’ में बैठक में हुई पूरी घटना का विस्तार से ज़िक्र किया है।

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गांधी जी ने नेहरू के चुने जाने के सवाल पर  पत्रकार दुर्गादास के सामने यह माना था की तौर कांग्रेस अध्यक्ष पटेल एक बेहतर ‘नेगोशिएटर’ और ‘ऑर्गनाइज़र’ हो सकते हैं। लेकिन उन्हें लगता है कि नेहरू को सरकार का नेतृत्व करना चाहिए।

गांधी जी ब्रिटिश हुकूमत के उत्तराधिकारी के लिए नेहरू को मानते थे सही

उनका मानना था कि अंतराष्ट्रीय विषयों को पटेल के मुकाबले नेहरू अच्छे से समझते हैं। वो इसमें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। ये दोनों सरकारी बेलगाड़ी को खींचने के लिए दो बैल हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय कामों के लिए नेहरू और राष्ट्र के कामों के लिए पटेल होंगे,दोनों गाड़ी अच्छी खींचेंगे।

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गांधीजी की यह परिकल्पना सही भी साबित हुई अब भारत के दो टुकड़े हुए तो पटेल के वजह से ही कई रियासतों का भारत में विलय हो पाया, उस वक़्त नेहरू की गलती की वजह से काफी विवाद भी हुआ और हिंसा में कई लोगो की  जाने भी गई। लेकिन पटेल की सुजबुझ की वजह से ही बहुत कुछ ठीक हो पाया। जम्मू कश्मीर की पटेल की नीति से सब लोग वाकिफ़ ही है।

पटेल को जीवित रहते हुए उन्हें जितना सम्मान मिलना चाहिए था शायद नहीं मिल पाया। लेकिन वो कहते है कि समय सबका बदलता है आज पटेल के सम्मान में  आज गुजरात में लौह पुरुष पटेल की करीब 600 फीट ऊंची दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति है और पूरी दुनिया इसे एकता की मिसाल के रूप में जानती है।

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