कर्मिक भूख हड़ताल

पलवल में कई दिनों से जारी क्रमिक भूख हड़ताल में अब बच्चे और महिलाएं भी शामिल

पलवल में पीछे कई दिनों से जारी कर्मिक भूख हड़ताल में बच्चे और महिलाएं भी शामिल

तीनों नए कृषि क़ानूनों के खिलाफ किसानों का जहां” दिल्ली मार्च” पिछले एक महीने से ज्यादा दिनों से जारी है। वहीं देशभर के विभिन्न जगहों पर भी कृषि क़ानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से किसान और किसान समर्थकों की क्रमिक भूख हड़ताल भी जारी है जिस में अब महिलाएं और छोटे बच्चे भी शामिल हो रहे हैं।

कर्मिक भूख हड़ताल

पलवल में किसानों का धरना-प्रदर्शन पिछले 26 दिन से जारी हैं और किसानों संगठनों के आह्वान पर पिछले आठ दिनों से क्रमिक भूख हड़ताल भी चल रही हैं। इस हड़ताल में अब छोटे बच्चो से लेकर महिलाएं भी हिस्सा लेकर सरकार के प्रति अपना विरोध जाहिर कर रही है।

कर्मिक भूख हड़ताल की मांग किसी भी हाल में यह काला क़ानून हो वापस

सरकार और किसानों के बीच कई दौर की वार्ता रद्द होने के बाद कल एक बार फिर नए सिरे से सरकार और किसानों के बीच बातचीत होने वाली है। इस बारे में क्रमिक हड़ताल में शामिल लोगों से बात की गई तो उन्होंने कहा कि हमें पहले के दौर की वार्ता में सरकार के बर्ताव से वैसे तो कोई उम्मीद नहीं है लेकिन फिर भी हम बताना चाहते है कि क़ानून वापस हुए बिना यह प्रदर्शन खत्म नहीं होगा।

कर्मिक भूख हड़ताल

क्रमिक हड़ताल में शामिल बच्चों और महिलाओं से बातचीत में पता चला कि वह देश के दूसरे जगहों जैसे भोपाल, मुरैना, अलीगढ़ से सफर करने के बाद यहां पलवल में धरना स्थल पर शामिल होकर किसानों के मांगो का समर्थन करने आए है। इनके बीच एक बच्चे ने बताया कि,” वह कई किलोमीटर पैदल सफर कर के मुरैना से यहां पहुंचा है और चाहता है कि किसानों की मांग जल्द से जल्द पूरी हो”। वहीं दूसरे बच्चे जिनकी उम्र बारह पंद्रह वर्ष के है ऐसे कड़ाके के ठंड में चौबीस घंटो की भूख हड़ताल पर बैठे हैं।


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कर्मिक भूख हड़ताल

ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा बिल संसद से पास हो चुके हैं उनमें से एक कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020 और दूसरा कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक 2020 है। जिसका विरोध किसान कर रहे हैं।

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कर्मिक भूख हड़ताल

किसानों का मानना है कि यह विधेयक धीरे-धीरे एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) यानी आम भाषा में कहें तो मंडियों को ख़त्म कर देगा और फिर निजी कंपनियों को बढ़ावा देगा जिससे किसानों को उनकी फ़सल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा। अब सारी उम्मीद कल की बातचीत पर है कल अगर फिर वार्ता विफल होती है तो किसान आंदोलन तेज करेंगे जिससे सरकार की मुश्किल और बढ़ सकती है।

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