वायु प्रदूषण को लेकर हम और सरकार कितनी सजग?

वायु प्रदूषण स्वास्थ्य का सबसे बड़ा दुश्मन

वायु प्रदूषण स्वास्थ्य का सबसे दुश्मन बनते जा रहा है। हमारे देश में पिछले साल वायु प्रदूषण के कारण 1 लाख 16 हजार नवजात शिशु की जान चली गई। यह कोरोना वायरस से भी खतरनाक बीमारी है।अधिकांश बीमारियों की वजह वायु प्रदूषण बनते जा रहा है और अधिकतर लोग इसकी चपेट में आ रहें है।

सांस लेने में समस्या, हार्ट अटैक, कैंसर, कब्ज, गैस, आंख में दर्द जैसी बिमारियों की वजह प्रदूषण है। यह सुनने में थोड़ा अटपटा सा लगेगा तथा खुद के जेहन में कई सारे सवाल आने लगे लेकिन यह सच है कि इन सारी बीमारियों की वजह वायु प्रदूषण है! यह वायु प्रदूषण जैसे शब्द सुनने में जितने समान्य है उसके पीछे उतना ही भयावह खतरा है। डॉक्टर बीमारी तो बता देते है परन्तु उसकी वजह को अंधकार में ही रहने देते है।

कोविड _19 के आने से हम इतने जागरूक हो गयें, प्रत्येक नियम का पालन करने लगे तथा सरकार भी इस वायरस को लेकर इतने गंभीर हो गई कि जो वैक्सीन को बनने में 10 साल या उससे ज्यादा लग जातें हैं, आज वही वैक्सीन मात्र 1 साल के अंदर ही बनकर तैयार हो गई। महज यह केवल तैयार ही नहीं हुई वरन अब तो सबको पड़ने भी लगे है। वैक्सीन इस कदर बन कर आ रही कि लगता है कुछ दिन बाद से इसकी सेल लगने वाली हो।

काश इसी तरह की जागरूकता सरकार वायु प्रदूषण को भी लेकर दिखाती तो कई बच्चे के मात्र कदम भर पडने से वह मौत के मुहं में नहीं जाते मानो लगता है सरकार इस समस्या पर चुप्पी ही साध रखी है। वह गुंगी, बहरी की श्रेणी में चली गई है। जहां तक सरकार की वादे की बात है 2024 तक वायु प्रदूषण में 20%_30% तक की कमी की बात हुई थी। पंरतु 2 साल हो गए लेकिन सरकार तो अपने लक्ष्य के आस – पास भी नहीं दिख रही है।

दिल्ली समेत 22 शहरों में बढते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए 2,217 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया

नई बजट में दिल्ली समेत 22 शहरों में बढते प्रदूषण से निपटने के लिए 2,217 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और पर्यावरण मंत्रालय के लिए 2,869 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। पिछले बजट की तुलना में इस बार पर्यावरण को सुधारने के लिए 42 गुना ज्यादा धन आवंटित किया गया है। 10 लाख से ज्यादा अबादी वाले शहरों को लक्ष्य किया गया है।

ग़ौरतलब है कि दिल्ली एनसीआर में दिवाली के बाद प्रदूषण इस तरह से बढा़ कि सांस लेने में, कब्ज, आंख में समस्या, आलस्य जैसी समस्या बनी हुई है। वहां की सरकार ने भी पराली जलाने तथा पटाखे छोड़ने से अनुरोध किया था परंतु जनता इसमें भी अपने दिमाग लगाने लगी। जनता को लगता है सरकार अपने लिए बोल रही है वह सरकार की बात ना मान वह अपनी मनमानी करने लगी। इस कारण वहां वायु प्रदूषण की समस्या और ज्यादा बढ़ गई है। 48 घंटे से भी ज्यादा वहां धूप निकले हुए हो जाते है जिसका कारण है ‘वायु प्रदूषण’।

लांसेट मेडिकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2019 में हुई मौतों में 18 फीसद वायु प्रदूषण की वजह से हुई थी। ग्लोबल बर्डन आंफ गडिजीज स्टडी 2019 में कहा गया है कि वायु प्रदूषण की वजह से भारत में 32.5 फीसद मौतें सांस की गंभीर बीमारियों की वजह से हुई है।


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तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पर्यावरण की समस्या को दूनिया में बढ़ती गरीबी के साथ जोड़ कर देखने की कवायद की थी। अभी भी हमारे देश में गरीबों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वह पतें इकट्ठे कर तथा लकड़ी आदि मिलाकर वह भोजन तैयार करने पाते है। भारत सरकार ने उज्जवला योजना बनाकर वायु प्रदूषण को कम करने तथा गरीबों की समस्या दूर की। सरकार ने रसोई गैस पर सब्सिडी देकर सहायता भी की थी। परंतु अब सरकार सब्सिडी देना भी बंद कर दिया है।

एक तरफ उज्ज्वला योजना चलाके धुएं और सांस की बीमारी से महिलाओं को बचाने के प्रयास किए थे लेकिन इसके दाम इतने अधिक बढ़ चुके हैं कि उज्ज्वला योजना के लभार्थी फिर से लकड़ी व कोयले के चुल्हे का प्रयोग करने लगे हैं। आजकल सोशल- मीडिया पर दिखावे के लिए पेड़ लगाते हुए लोग अपनी तस्वीर पोस्ट करते है और वही लोग एक पेड़ लगाने की जगह 10 पेड़ काटते है। अब तो चिपको आंदोलन जैसी भी झलक देखने को नहीं मिलतें है।

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