प्रेमचंद- कलम के सिपाही की एक विरासत जिसे हम संभाल नहीं पाए

बचपन की बात है, जब हमारे दौर के बच्चे मोबाइल फ़ोन-टैबलेट से दूर नानी की कहानियां सुना करते थे. वो कहानियां राजा-रानियों की हुआ करती थी. लेकिन वो कहानियां हमारे समाज से और वास्तविकता से कोसो दूर हुआ करती थी. हमारे गांव में दलित समुदाय और सवर्ण समुदाय के लोग लगभग एक जैसी आबादी में थे. एक दिन हमारे गांव के एक किसान ने सवा सेर गेहूं महाजन से उधार लिया और वो उधार उसने बंधुआ मज़दूरी करके चुकाया. हो सकता है कि आपके गांव में भी ये घटना हुआ हो या फिर एक दलित जो लकड़ी चीरते हुए एक ब्राह्मण के आंगन में कर जाता है लेकिन उसे उठाने तक कोई नहीं आता. 

(सवा सेर गेंहू का एक दृश्य)

ये सारी घटनाएं हमारे गांव में अकसर हुआ करती थी. यही जन्म होता था कलम के सिपाही प्रेमचंद की कहानियों का.

प्रेमचंद या धनपत राय या नवाब राय, जो भी कह ले वो आपके ऊपर है. लेकिन उन्हें लोग याद रखते हैं ‘कफ़न’, ‘ईदगाह’, ‘सवा सेर गेहूं’ जैसी कहानियों के लिए. प्रेमचंद की कहानियां हमारे समाज का एक काला चेहरा दिखाती थी. बूढ़ी काकी के अंतिम लाइनों में जब काकी कूड़े से खाना उठाकर खाने लगती है तब प्रेमचंद का कलम हमारे सीने में उतर जाता है. प्रेमचंद हमें मजबूर कर देते हैं अपने घर के बूढ़ों की ओर देखने के लिए जिन्हें शायद हम अच्छे से नहीं रखते हैं.

लेकिन प्रेमचंद को गुज़रे ज़माना बीता, उनपर गुलज़ार ने दूरदर्शन पर ‘तहरीर’ नाम से सीरीज़ भी शुरू की, उन्हें हम आज क्यों याद कर रहे हैं? क्योंकि आज के समय के लेखकों की कलम थोड़ी सी घिस चुकी है. वो सरकार, समाज और संस्कृति पर ना ही कुछ बोल पा रहे हैं और ना ही लिख पा रहे हैं. मतलब आज के लेखक दरबारी कवि बने हुए हैं जिन्हें कोई बुराई नज़र ही नहीं आती.

जब हमारे देश में ब्रितानी हुकूमत थी और लोगों के लिखने पर काफ़ी ज़्यादा सेंसर हुआ करता था, तब प्रेमचंद ने ‘सोज़-ए-वतन’ लिखी. ब्रितानी हुकूमत ने उनकी कलम से डरकर उसे ज़ब्त कर लिया था. प्रेमचंद ने सोज़-ए-वतन की पहली कहानी में कहा है- “इस दुनिया में अगर कोई चीज़ बेशकीमती है, वो है एक शहीद के जिस्म से टपका हुआ खून. क्योंकि उस खून में होती है वतनपरस्ती. वो खून की एक बूंद भी लड़ना चाहती है आज़ादी के लिए.” 

प्रेमचंद ने भारतीय पत्रकारिता में जो साहित्यिक पुट दिया उसने हिंदी पत्रकारिता को एक नयी दिशा दी. ‘हंस’ पत्रिका का संपादन और प्रकाशन प्रेमचंद ने ही किया जो आज भी मौजूद है. प्रेमचंद ने अपने लेख- ‘सांप्रदायिकता और संस्कृति’ में साफ़ तौर से कहा कि-

‘साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है. उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है, इसलिए वह संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है. हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है, मुसलमान अपनी संस्कृति को. दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गए हैं, कि अब न कहीं मुसलिम संस्कृति है, न कहीं हिन्दू संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति.अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थ‍िक.’

आज के वक़्त में खान-पान को लेकर काफ़ी सेंसर लगता है कि किसको क्या खाना चाहिए और किसको क्या नहीं. इस पर प्रेमचंद कहते हैं- ‘अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं. उंचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, उंचे दरजे के मुसलमान भी. नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, नीचे दरजे के मुसलमान भी. मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है.’

गौमांस के मुद्दे पर वो लिखते हैं, हां, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं और उनका माँस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियां मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं. यहां तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालाँकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है.’ संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है. तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?’

प्रेमचंद हिन्‍दुओं और मुसलमानों को सांस्‍कृतिक रूप से अलग साबित करने के सारे तर्कों को बारी-बारी से बड़ी सहजता और तार्किक तरीके धराशायी करते हैं. वे भाषा का सवाल उठाते हैं और पूछते हैं कि ‘तो क्या भाषा का अन्तर है?’ उनका जवाब है, ‘बिल्कुल नहीं. मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मदरासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मदरासी हिन्दू के लिए संस्कृत.

हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं, सर्व-साधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बांग्ला हो या मराठी. बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू. दोनों एक ही भाषा बोलते हैं.

प्रेमचंद के मुताबिक, ‘यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है. यह आर्थ‍िक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थ‍िक समस्याओं को हल कर सके जिससे यह अंधविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर गरीबों को दुहने की कृपा मिटाई जा सके.’

प्रेमचंद उस वक़्त भी उन विषयों को छेड़ते हुए दिखते हैं जिन्हें आज के कलमगार ख़ामोशी से देखते हैं.

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