बस्तर में 90 प्रतिशत लोग का कहना माओवाद को बातचीत से ख़तम किया जायगा

माओवाद का केंद्र “बस्तर” की समस्या

मध्य भारत में बस्तर नक्सली समस्या दशकों से चली आ रही है। कई सामाजिक संगठन और स्थानीय सरकार ने इसका हल निकालने का प्रयास किया लेकिन परिस्थिति जस की तस रही हाल ही में एक संस्था सीजी नेट ने माओवाद की समस्या पर लोगों का राय  मतदान के जरिए प्रस्तुत किया।

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बस्तर क्षेत्र में एक निजी गैर सरकारी संस्था सीजी नेट ने करवाया सर्वेक्षण 

माओवाद का केंद्र कहे जाने वाले बस्तर क्षेत्र में कुछ दिनों पहले एक निजी गैर सरकारी संस्था सीजी नेट ने एक सर्वेक्षण करवाया। इस सर्वेक्षण में बस्तर समेत पूरे देश के कुल 3760 लोगों ने अपना मतदान दिया।

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जिसने से 76% लोगों ने हिंदी, 18% लोगों ने गोंडी एवं 6% लोगों ने हल्बी भाषा में मत देकर अपने विचार प्रस्तुत किए। आपको बता दें कि इस मतदान के बाद यह जाहिर हुआ है कि 90% लोग आज भी आगे आते हैं क्यूंकि वे जानते है इस समस्या का हल राजनीति से ही निकलेगा क्योंकि यह समस्या सियासत से जुड़ी है।

बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद की समस्या का हल

लोगों का यह भी मानना है कि नक्सलवाद की समस्या का हल बिना नक्सली से बातचीत किए नहीं निकलेगा। इसके लिए आम जनता और  पुलिसकर्मी को पहले पहल करने की जरूरत है।

इस मतदान में यह बात  खुलकर सामने आई है कि मध्यभारत में माओवाद एक राजनीतिक समस्या है जिसका हल बिना बातचीत के नहीं निकलेगा।

हालांकि इस सर्वे में 8% लोगों का यह भी कहना है कि यह एक कानूनी समस्या है पुलिस और मजिस्ट्रेट को साथ मिलकर इस पर बातचीत करने की आवश्यकता है।

सर्वेक्षण शांति की पहल को दर्शाता है

यह सर्वेक्षण स्थानीय समाजसेवियों द्वारा शांति की पहल को दर्शाता है। देशभर के लोगों ने भी इस सर्वेक्षण में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। आपको यह भी बता दें इसके मतदान की अवधि 15 अगस्त से 2 अक्टूबर के बीच रखी गई थी।

छत्तीसगढ़ का यह शहर बस्तर पिछले कई वर्षों से माओवादी ताकतों और नक्सलवादी समस्या से जूझ रहा है। वहां से हिंसा की तस्वीरें  आते रहती है।

माओवादी का एकमात्र लक्ष्य क्रांति द्वारा सत्ता हासिल करना

माओवादी, जिनका एकमात्र लक्ष्य क्रांति द्वारा सत्ता हासिल करना है वे आदिवासी समाज को भी अपने गुट में शामिल करने में लगे हैं। आदिवासियों के मन में सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने से लेकर उन्हें हथियार चलाने का भी प्रशिक्षण यह लोग देने में लगे हैं।

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लेकिन गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में माओवादी संगठन ने अपने चरित्र में बदलाव भी किए हैं उनका कहना है कि अगर उनकी मांगों को सरकार सुने और सुनिश्चित करें कि उन्हें पूरा भी किया जाएगा तो वह बातचीत के लिए तैयार हैं।

भारत में नक्सलवाद दशकों से चली आ रही एक जटिल समस्या है सरकार बदलते चली जाती है लेकिन इनकी सूरत और सीरत वैसी की वैसी ही रहती है।

माओवादी की समस्या का हल बिना उनसे बातचीत किए निकलना असंभव है। पिछले 3 वर्षों से कुछ सामाजिक संगठन इस क्षेत्र में शांति कायम करने की कवायद में लगे हुए हैं।

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