बिहार की दो बेटियों ने की समलैंगिक शादी लेकिन समाज में समलैंगिक रिश्ते स्वीकार नहीं

बिहार दो लड़कियां पंजाब के जालंधर कोर्ट में समलैंगिक शादी करने के बाद दो लड़कियां बुधवार को नगर के कालीबाग थाना में पहुंच गईं और सुरक्षा की मांग की। थाना पहुंचने के बाद लड़कियों ने कहा कि वे आपस में पति-पत्नी हैं। इस पर पुलिस वालों को थोड़ा अचरज हुआ क्योंकि हमारे समाज में आज भी समलैंगिक रिश्तों को स्वीकार नहीं किया जाता है। इसके बाद उन्होंने बताया कि दोनों ने पंजाब के जालंधर न्यायालय में समलैंगिक शादी की है। दूल्हा-दुल्हन बनी दोनों लड़कियां पुलिस के समक्ष अपनी शादी से संबंधित कागज़ात भी प्रस्तुत कीं। दोनों पश्चिम चंपारण जिले की अलग-अलग शहरों की रहने वाली हैं।


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दूल्हा बनी नगमा रामनगर की निवासी हैं, जबकि दुल्हन इशरत बेतिया के मिस्कात टोले मोहल्ले की रहने वाली है। दोनों का परिवार जालंधर में रहता था। दोनों पड़ोस में रहती हैं और इसी दौरान प्यार हो गया। जब इसकी भनक इशरत के स्वजनों को लगी तो उसकी मोहब्बत पर पाबंदी लगाने की कोशिश की गयी। ऐसे भी हमारे समाज में मोहब्बत पर सभी पहरे लगा कर रखना चाहते हैं। भारत में मां-बाप बच्चों को कहते हैं कि शादी अपने मर्ज़ी से करो लेकिन एक ख़ास लिंग, समुदाय, धर्म, जाति और गोत्र के साथी को ढूंढ कर। जब नगमा और इशरत के मोहब्बत पर पाबंदी लगायी गयी तो दोनों घर से अलग हो गयी।

बीते 23 जुलाई को दोनों ने जालंधर कोर्ट में शादी कर ली। पर लगता है शादी के बाद भी उनकी रहे आसान नही रहेंगी  क्योंकि अब सवाल है कि रहा कहां जाए। ऐसे में दोनों ने अपने पैतृक घर आने का निश्चय किया। उनको ऐसा भरोसा था कि शायद यहां पर उन्हें शरण मिल जाएगी तो उनकी जिंदगी सरल हो हो जाएगी। मगर, ऐसा नहीं हो सका। दुल्हन बनी लड़की जब अपने घर पहुंचीं तो परिजनों ने रखने से साफ इंकार कर दिया। उसके परिजनों ने अपनी ही बेटी से सारे रिश्ते तोड़ दिए।

इसके बाद इनलोगों ने पुलिस की मदद लेने का निश्चय किया। इसके तहत मंगलवार की शाम नगमा और उसकी पत्नी बनी इशरत को रामनगर स्थित उसके घर पर पुलिस की सुरक्षा में भेज दिया गया। नगमा के स्वजनों ने उसे बहू के रूप में स्वीकार कर लिया है।

समलैंगिक रिश्तों की हकीकत

आपको बता दे कि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 6 सितंबर 2018 को एकमत से 158 साल पुरानी आईपीसी की धारा 377 (Section 377) के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसके तहत परस्पर सहमति से एक समलैंगिक यौन संबंध अपराध था। इस धारा में इस संबंध को ‘अप्राकृतिक यौन संबंध’ का दर्जा दिया गया था।

आपको बता दे कि हर साल अलग-अलग शहरों में एलजीबीटीक्यू समुदाय से जुड़े लोग नाचते-गाते, एक दूसरे को बधाई देते नज़र आते हैं।आख़िर उनकी ज़िंदगी में दशकों का अंधेरा छंटा है जिससे वो “प्राइड परेड” के नाम से हर साल मानते है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बाकी नागरिकों की तरह बराबरी दी है।

वैसे तो क़ानून ने तो इस समुदाय को वैधता दे दी है, लेकिन क्या समाज खुल कर इनके साथ खड़ा होगा। अदालत की ही तरह ये लोग भी मानते हैं कि इसके लिए सरकार को कोशिश करनी होगी पुलिस-प्रशासन को संवेदनशील बनाना होगा। साफ़ है, अब अगली चुनौती सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को सही तरीके से लागू करने की है।

ऐसे भी हमारे समाज में मोहब्बत के ख़िलाफ़ समाज के खड़ा होने का रिवाज़ काफ़ी पुराना है। हीर-रांझा, लैला-मजनू जैसी कहानियों में भी समाज मोहब्बत को स्वीकार नहीं कर पा रहा था जबकि समाज के अनुसार वो अप्राकृतिक भी नहीं था। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के गीत ‘मोहब्बत ज़िन्दाबाद’ को सुनने से ये तो लगता ही है कि जब-जब समाज मोहब्बत के खिलाफ़ खड़ा होगा बगावती लोग और ज़्यादा मोहब्बत करेंगे। 

मोहब्बत ज़िन्दाबाद!!

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