बिहार के गया में लौंगी भुइयां ने सरकार का इंतज़ार नहीं किया और 3 किमी लंबी नहर खोद दी

कहते हैं जो खुद की मदद करता है। भगवान भी उसकी मदद करता है। इसी की मिसाल के रूप में खड़े हुए दशरथ मांझी ‘द माउंटेन मैन’ के नाम से भी जाना जाता है, जिन्होंने अपने प्रेम के लिए पहाड़ तोड़ा। पहाड़ तोड़ा! यह क्या पागलपन है! इसका प्रेम से क्या लेना-देना है? हमारे आपके लिए शायद नहीं हो लेकिन या पागलपन ही दशरथ मांझी के लिए विशुद्ध प्रेम था –  पूरे 22 वर्षों तक।


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दरअसल दशरथ मांझी जिनकी पत्नी का नाम फाल्गुनी है। एक दिन गहलौर की पहाड़ी से फिसल कर चोटिल हो गई थी और उनकी तकलीफ दशरथ के दिल में घर कर गई। तभी से उन्होंने छेनी और हथौड़ा लेकर पहाड़ से युद्ध करने की ठान ली। सन 1960 से 1982 तक लगातार 22 साल उन्होंने नतमस्तक होकर रास्ता बनाया। 360 फ़ुट लंबा 25 फ़ुट 11 और 30 फ़ुट चौड़ा गांव से बाहर की दूरी को 40 किलोमीटर कम करता हुआ रास्ता प्रेम के लिए एक अकेले इंसान के संघर्ष और जीत की कहानी।

मांझी द माउंटेन मैन के ही नक्शे कदम पर चलते हुए बिहार के गया जिले के लौंगी भुइयां ने 30 साल तक कड़ी मेहनत करके 3 किलोमीटर लंबी नहर बना डाली।

लौंगी भुईंया ने भी 30 वर्षों में इमामगंज और बांकेबाजार प्रखंड की सीमा पर 3 किलोमीटर लंबी, चार फ़ीट चौड़ी और तीन फ़ीट गहरी नहर खोद डाली। लौंगी बताते हैं कि यहां के लोग शादी के बाद घर छोड़कर मज़दूरी करने बाहर चले जाते थे। सिंचाई का साधन होता तो लोग अच्छी खेती कर सकते थे। यह बात उनके दिमाग में घूम रही थी। वे जंगल में रोज पशुओं को चराने ले जाते थे। उन्होंने देखा कि एक जगह सारे पशु पानी पीने जाते हैं। वहां पर जलस्रोत था, पानी यूं ही बह रहा था। बस यहीं से नहर खोदने का विचार दिमाग में आ गया। वे दूसरे दिन से ही हाथों में कुदाल, खंती व टांगी लेकर निकल पड़े।

भुईयां ने कहा, “गांव के एक तालाब तक पानी ले जाने वाली इस नहर को खोदने में मुझे 30 साल लग गए।”

लौंगी भुइयां ने बताया, “पिछले 30 सालों से, मैं अपने मवेशियों को लेकर जंगल जाता और नहर खोदने का काम करता। कोई भी मेरे इस प्रयास में शामिल नहीं हुआ… गांव के लोगों को अजीविका कमाने के लिए शहर जाना पड़ रहा है, लेकिन मैंने यहीं रहने का फैसला किया।”

दरअसल, बारिश के मौसम में, पहाड़ों से गिरने वाला पानी नदी में बह जाता था। यह बात भुइयां को परेशान करती थी। उन्हें लगता था कि यह पानी अगर खेतों में आ सके तो इससे गांववालों की कितनी मदद होगी| इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने नहर खोदने का सोचा। कोठिलवा गांव गया के जिला मुख्यालय से लगभग 80 किमी दूर है और घने जंगल और पहाड़ों से घिरा हुआ है। यहां के लोगों के अजीविका का मुख्य साधन खेती-किसानी और पशुपालन ही है।

दरअसल, बारिश के मौसम में, पहाड़ों से गिरने वाला पानी नदी में बह जाता था। भुइयां को लगता था कि यह पानी अगर खेतों में आ सके तो इससे गांववालों की कितनी मदद होगी होगी। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने नहर खोदने का सोचा। एक ग्रामीण पट्टी मांझी ने कहा, “लौंगी भुईयां पिछले 30 सालों से अकेले नहर बनाने के काम में लगे हुए हैं। उनके इस प्रयास न सिर्फ बड़ी संख्या में जानवारों को पानी मिलेगा बल्कि खेतों की सिंचाई भी हो सकेगी। उन्होंने यह नहर सिर्फ अपने फायदे के लिए नहीं बनाई है बल्कि पूरे इलाके की मदद करने के लिए बनाई है।”

एक पति होने के नाते दशरथ मांझी ने और एक गांववासी होने के नाते लौंगी भुइयां ने तो अपना फर्ज निभाया पर सरकार अब भी सो रही है। रास्ता अब भी पथरीला है, पक्की सड़क अब भी नहीं बनी है। नहर अब भी क्या केवल मांझी और भुइयां जैसे ही व्यक्ति बनाते रहेंगे और सरकार केवल चुनाव के वक्त वादे करके चली जाएगी।

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