बिहार बाढ़ और कोरोना से परेशान है और नीतीश कुमार चुनाव को बेताब हैं

जहां पूरा देश आज कोरोना की मार झेल रहा है, वहीं बिहार में बाढ़ ने हाहाकार मचा रखा है, पर वहीं बिहार की राजनीति में अलग ही हलचल हो रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चुनाव के प्रचार प्रसार के लिए तैयारियों में जुटे हुए हैं। बिहार में जहां कोरोना के मामले एक लाख से ऊपर जा चुके हैं वहीं ऐसे माहौल चुनाव का आयोजन करवाना खतरे से खाली नहीं रहेगा। चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी है समय पर चुनाव करवाना लेकिन इसके लिए किसी को खतरे में डालना ये कहीं का न्याय या नियम नहीं है। जब पूरा देश इतनी बड़ी महामारी से लड़ रहा है, तो चुनाव आयोग का ये कर्तव्य बनता है कि वो कोई ऐसा हाल निकले जो जन कल्याण में हो नए की उनके जीवन पर संकट बन जाये।

                            (श्री लंका के चुनाव की तस्वीर)

 

ये कैसा दिशानिर्देश :-

यह मामला आज कल बहुत चर्चा में है क्यों की चुनाव आयोग ने हाल ही में एक दिशानिर्देश जारी कि है जिसको देख कर यह साफ तौर पर स्पष्ट हो जाता है कि चुनाव आयोग ने कोरोना का बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया है। दिशानिर्देश के अनुसार चुनाव सेंटर पर आने वाले हर मतदाता की मतदान करने से पहले दस्ताने और मास्क देने की बात कही गई है, साथ ही साथ चुनाव में कार्यरत अधिकारियों को पीपीई किट मास्क और फेस शील्ड दिए जाने की भी बात हुई है।


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लेकिन इतने रुपए खर्च करने का फ़ायदा कुछ नहीं होगा, इससे देश भर कि जनता पर 125 करोड़ तक का बोझ बाढ़ जायेगा, मगर जैसा कि हम जानते हैं बिहार में कुल मतदाताओं की गिनती 7 करोड़ 20लाख है तो ऐसे में सबके लिए दस्ताने और मास्क का खर्च और उसके बाद पूरे राज्य में 6 लाख चुनावी अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों के लिए भी ज़रूरी सामान का खर्च।

एक तरफ चुनाव आयोग ने पर्यावरण को मद्दे नजर रखते हुए चुनाव प्रचार में प्लास्टिक का उपयोग होते देख उसपर रोक लगाई थी लेकिन अब वही चुनाव आयोग खुद प्लास्टिक के उपयोग करके पर्यावरण को घातक नुकसान पहुंचाने जा रही है।

कितना हो सकता है नुकसान:-

चुनाव आयोग ने पोलिंग बूथ के अंदर प्रवेश करने वाले हर मतदाता का तापमान नापने के निर्देश भी जारी किए हैं, और जिसका तापमान सामान्य से ज़्यादा होगा उसे सबसे आखिर में मत देने दिया जायेगा। पर चुनाव आयोग इस बात पर ध्यान देना भूल गया कि 40% से अधिक कोरोना के मरीजों में इस महामारी के कोई लक्षण ही नहीं पाए जाते, और बहुत से लोगो में अन्य लक्षण होते हैं बुखार नहीं, इससे कैसे जांचा जायेगा।

चुनाव एक व्यक्ति से सफल नहीं होता इसमें करोड़ो की संख्या में मतदाता आयेंगे लाखों चुनाव अधिकारी और सुरक्षाकर्मी शामिल होंगे, हज़ारों उम्मीदवार सामने आयेंगे और अपना चुनाव प्रचार प्रसार करेंगे, यदि किसी को भी कोरोना संक्रमण रहा और लक्षण ना मिलने के कारण अनजाने में ही सही उस व्यक्ति से और भी लोग संक्रमण का शिकार हो गए तो यह एक बहुत गंभीर समस्या बन जायेगी। लाखों लोगों का जीवन खतरे में पड़ जायेगा।

इन सभी बातों को मद्देनज़र रखते हुए, ये तो कहा जा सकता है कि जिस प्रक्रिया से चुनाव आयोग बिहार में चुनाव करवाना चाह रही है उससे यह संक्रमण और तेज़ी से बढ़ेगा और इसका भुगतान कहीं ना कहीं देश की जनता को ही करना पड़ेगा क्योंकि राजनेता और चुनाव आयोग चुनाव करवा के निकाल जायेंगे लेकिन जो मतदाता संक्रमित होगा उसको अपने इलाज का खर्च दवाइयों का खर्चा खुद ही उठाना पड़ेगा । उस वक्त सरकार को इन लोगो का ध्यान नहीं आयेगा। ऐसे में चुनाव के लिए कुछ और नई नीतियों कि आवश्यकता है कुछ और दिशानिर्देशों की आवश्यकता पड़ेगी।

चुनाव या जीवन:-

चुनाव आयोग जहां एक ओर बार-बार चुनाव करवाने पर ज़ोर डाल रहा है वहीं दूसरी ओर कई नागरिक इसके ख़िलाफ़ हैं। ख़ुद सत्ता में मौजूद लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने कई मौकों पर चुनाव ना करवाने की गुज़ारिश की थी। सरकार और चुनाव आयोग को इससे कोई भी फ़र्क नहीं पड़ता। अब देखना ये होगा कि क्या सच में चुनाव आयोग को लोगों की जान की कोई चिंता है या उसे बस चुनाव की करवाना है।

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