क्या है बिहार धान घोटाला का राज़, क्यों किसान एमएसपी से आधी कीमत पर धान बेचने को हैं मजबूर

बिहार :धान खरीद के मामले की रिपोर्ट में बिहार पीछे 

जैसा हम जानते हैं कि बिहार धान उत्पादन के मामले में कई राज्यों से भी आगे है पर एमएसपी पर खरीद के विषय में बहुत ही पीछे हैं। इसका कारण है एक घोटाला जिसने बिहार की सैकड़ों धान मिल को बंद करवा दी। दरसअल यह मामला करीबन 10 साल पहले हुए घोटाले से भी जुड़ा हुआ हैं जिसका खामियाजा अभी भी किसान भुगत रहे हैं।

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हम आपको बता दें कि बिहार में एक घोटाला हुआ था जो चारा घोटाले के जैसा ही था। जिस घोटाले के कारण प्रदेश की सैकड़ों राइस मिल्स बंद हो गईं एवं जिस वजह से लाखों किसान मजबूरी में सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य से करीबन आधी कीमत पर अपना धान बेचने को मजबूर होते हैं और आपमें से कई जानते होंगे कि खरीफ में धान की खेती सबसे अधिक होती है। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रतिदिन ही खरीफ विपणन वर्ष 2020-21 में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर जारी फसलों की खरीद का लेखा-जोखा दिया जाता है।

मगर धान खरीद के मामले में मंत्रालय की जारी रिपोर्ट में बिहार बहुत पीछे है। वहीं देखा जाए तो धान उत्पादन के मामले में बिहार तो देश के शीर्ष 10 राज्यों में से एक राज्य है। बता दें कि साल 2017-18 में बिहार शीर्ष 5 राज्यों में से एक राज्य था। पर अब यह सरकारी खरीद में बहुत ही पीछे है। इस मामले में राज्य के पीछे होने की सबसे बड़ी वजह है,राइस मिल्स का बंद होना और सरकारी खरीद के कम होने का सीधा अर्थ यह होता है कि किसानों को एमएसपी का लाभ नहीं मिल रहा है।

बिहार राइस मिल्स बंद होने से हुआ भारी नुकसान

rice mills are broking up while treating rice

अगर हम पिछले कुछ वर्षों के रिकॉर्ड्स को देखेंगे तो जानेंगे कि बिहार में सरकारी दर पर धान की खरीद लक्ष्य के अनुरूप नहीं हो पा रही है। बता दें कि प्रदेश में धान की बिक्री के लिए किसानों को सहकारिता विभाग के साथ ऑनलाइन पंजीकरण करना होता है। मगर आंकड़ों से यह ज्ञात होता है कि सरकारी खरीद एजेंसी प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटीज एवं मंडल के माध्यम से बिहार राज्य में बहुत कम खरीदी हुई है। इसी बीच हम बता दें कि बिहार में कुल 79.46 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि हैं।

जिनमें से लगभग 32 लाख हेक्टेयर  में धान की खेती की जाती है। नीतीश कुमार की सरकार ने साल 2006 में एपीएमसी यानी की कृषि उपज मंडी समिति एक्ट को शेष कर दिया था और कारण यह दिया गया था कि इससे किसानों को बिचौलियों से छुटकारा मिलेगा। उनकी स्थिति में सुधार आएगी और सीधे किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए बिहार सरकार द्वारा धान खरीद के लिए एक नई एजेंसी पैक्स (PACS)का गठन किया गया था।


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बिहार धान खरीद के लिए गठित एजेंसी पैक्स

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ये बिहार में प्राथमिक कृषि ऋण सोसायटी है जो आमतौर पर किसानों को ग्रामीण ऋण देती है। साथ ही उन्हें अपने उत्पाद को बेहतर कीमत पर बेचने में मदद करने के लिए विपणन सहायता भी करती है। बता दें कि PACS के अलावा भी 500 व्यापार मंडल हैं जो धान की खरीद भी करते हैं। पूरे बिहार राज्य में लगभग 6,598 पैक्स केंद्र हैं। मगर प्रश्न उठता है कि क्यों इसके बाद भी किसानों को कम कीमत पर फसल क्यों बेचनी पड़ती है?

शशिकांत झां जो बिहार राइस मिल एसोसिएशन के सचिव हैं वे कहते हैं कि किसानों को धान की सही कीमत न मिलने की सबसे बड़ी वजहों में से एक प्रदेश में राइस मिलों यानी धान कुटाई करने वाली मिलों का बंद होना है। उन्होंने बताया कि बिहार में एक समय लगभग 3,000 राइस मिल थी। मगर अब करीब 1,000 तक यह संख्या सिमट गई है। कारण अधिकतर  राइस मिलर्स सरकार द्वारा डिफॉल्टर घोषित किये गए हैं।

जानिए क्या है राइस मिल घोटाले का पूरा सच

Raiding the rice mill seized the grain

दरसअल बिहार राज्य में 2011 से 2014 के मध्य करीबन 1,500 करोड़ रुपए का राइस घोटाला हुआ था। इस घोटाले की नींव 2011 में मुजफ्फरपुर में हुई थी। वहां  अधिकारियों ने बिहार सरकार को यह सूचना दी थी कि लगातार हो रहे बारिश के कारण से धान पूरी तरह बर्बादी के कगार पर था। अतः यह सूचना दी गई थी कि इसे पश्चिम बंगाल में भेजा जाए और सरकार को यह प्रस्ताव बेहतर लगा एवं अनुमति दे दी गई।

जिसमें 10 जिलों से भीगे हुए कुल 17 लाख मीट्रिक टन धान से चावल निकालने के लिए बंगाल भेजना था। मगर यह कभी भेजे ही नहीं गए और धान ढुलाई के नाम पर करोडों रुपयों के घोटाले हुए। ग़ौरतलब है कि रोहतास जिला जो कभी धान का कटोरा था वो आज समाप्ती के कगार पर है। बिहार में मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि बिहार के धान किसानों की स्थिति बिल्कुल सही नहीं है।

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