बेग़म अख़्तर: वह ग़ज़लकार जिनकी आवाज अब भी लोगों के दिलों में जिंदा है

बेग़म अख़्तर

“ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आ गया…..” बेग़म अख़्तर का नाम सुनते ही जेहन में यह ग़ज़ल दौड़ने लगता है। उन्हें ग़ज़ल की मलिका कहा जाता है। उनके नाम से गजल, ठुमरी और दादरा का ख्याल आता है जिसे सुनकर लोग झूम उठते हैं।

Begum Akhtar: जिन्‍होंने शास्त्रीय रागों पर आधारित गजल गायकी की – Legend News

ग़ज़ल ही बेग़म अख़्तर की पहचान है। आज भी उनके गजलों को सुनने के लिए लोग मुराद हैं। यदि आज भी कोई उनके गजलों को एक बार सुन ले तो वह हमेशा के लिए उन्हें सुनने का आदी हो जाता है।

बेग़म अख़्तर और उनका ग़ज़ल एक सिक्के के दो पहलू की तरह है, एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। एक समय था जब ग़ज़ल  सिर्फ बड़े बादशाह और नवाबों की दुनिया का हिस्सा था, लेकिन उनकी इस दुनिया से उन गजलों को आम लोगों तक पहुंचाने का काम बेगम अख्तर ने ही किया था।

उनका कहना था कि ग़ज़ल सिर्फ पढ़ा नहीं जा सकता, इसे गाने में ढालकर गाया भी जा सकता है। उनकी तरह उनके ग़ज़ल भी हमेशा के लिए अमर हो गए।


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बेग़म अख़्तर ने उस दौर में महिलाओं का किया प्रतिनिधित्व 

वह बेग़म अख़्तर ही थी जिन्होंने लोगों को बताया कि ग़ज़ल भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा का एक अहम हिस्सा है। एक समय था जब महिलाएं साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में बेहद कम नजर आती थी।

बेगम

उस दौर में बेग़म अख़्तर उन चुनिंदा गायिकाओं में शुमार थी जिन्होंने इस क्षेत्र में अपने कदम बढ़ाए। उस समय गायिकाओं में सिद्धेश्वरी देवी, गौहरजान कर्नाटक, गंगूबाई हंगल, अंजनीबाई मालपकर, मोगूबाई कुर्डिकर, रसूलन बाई थी जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर कई कॉन्सर्ट दिए। इन्हीं महिलाओं ने समाज को यह बताया कि महिलाएं किसी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे नहीं है।

1914 में जन्मी बेग़म अख़्तर

आज बेगम अख्तर का जन्मदिन है। दरअसल, आज ही के दिन 1914 में अवध की राजधानी फैजाबाद में उनका जन्म हुआ था। उनका जन्म एक तवायफ मुश्तरीबाई की कोख में हुआ। उन्हें 7 साल की उम्र से ही उनकी मां ने मौसिकी की तालीम देनी शुरू की थी।

उन्होंने उस्ताद इमदाद खां, उस्ताद अब्दुल वहीद खां (किराना), उस्ताद रमजान खां, उस्ताद बरकत अली खां (पटियाला), उस्ताद गुलाम मोहम्मद खां (गया) और अता मोहम्मद खां (पटियाला) के द्वारा संगीत और गायकी का कहरा सीखा।

बेग़म अख़्तर ने 13 वर्ष की आयु में दिया पहला परफॉर्मेंस

उन्होंने कोलकाता में बिहार रिलीफ फंड के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपनी पहली पब्लिक परफॉर्मेंस दी थी। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर सरोजनी नायडू थी जिन्होंने 13 साल की बेगम अख्तर के ग़ज़ल, दादरा, ठुमरी से प्रभावित होकर उन्हें एक साड़ी उपहार स्वरूप दी थी।

1938 में बेग़म अख़्तर लखनऊ आई 

1938 में बेग़म अख़्तर लखनऊ आई थी और तभी से उनके दिल में लखनऊ बस गया था। उन्होंने लंबे समय तक लखनऊ दूरदर्शन के लिए काम किया था।

इन जगहों पर बेग़म अख़्तर ने किया काम

1930 में वे एक पारसी थिएटर से जुड़ी थी। उन्होंने कॉरिन्थियन थिएटर कंपनी के कुछ  नाटकों जैसे- ‘नई दुल्हन’, ‘रंगमहल’, ‘लैला मजनू’, ‘हमारी भूल’ में अभिनय के साथ-साथ गायन भी किया।

बेगम

अपने सिने करियर की शुरुआत उन्होंने ‘एक दिन का बादशाह’ से की। इसके बाद उन्होंने ‘नल दमयंती’, ‘मुमताज बेगम’, ‘अमीना’, ‘जवानी का नशा’, ‘रूपकुमारी’, ‘नसीब का चक्कर’, ‘अनार बाला’, ‘रोटी’, ‘दाना पानी’ ‘एहसान’ जैसी फिल्मों में अदाकारी की। उनकी आखिरी फिल्म साल 1958 में आई ‘जलसाघर’ थी इसके फिल्मकार सत्यजीत रॉय थे।

पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित की गई

भारत सरकार द्वारा बेग़म अख़्तर को पद्मश्री और पद्मभूषण नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी हासिल हुए, इनमें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी शामिल है।

1974 में दुनिया को कहा अलविदा

30 अक्टूबर 1994 को बेग़म अख़्तर दुनिया को छोड़ गई। इस दिन वह अहमदाबाद के एक मंच पर गायन कर रही थी, जहां उनकी तबियत खराब हुई अस्पताल में पहुँचकर उन्होंने दम तोड़ दिया। लखनऊ के ठाकुरगंज इलाके में उनकी मां के बगल में उनका मजार है।

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