भारत में अब भी भूख सबसे बड़ी समस्या, लॉकडॉउन के बाद खराब हुई स्थिति

भारत में भूख सबसे बड़ी समस्या

पूरे साल में सरकार कोरोनावायरस की चिंता में मशगूल रही और कहीं ना कहीं इस दौरान भूख,कुपोषण जैसे दूसरे मामले जिससे कई दशकों से लड़ रहें है उसपर ध्यान नहीं दिया गया। पिछले सालों में इन मामलों में काफी पिछड़ गए है या कह सकते है खराब हालत में आ गए हैं और इस बात का सबूत हाल ही में राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर जारी तीन विश्वसनीय रिपोर्टों में मिलता है।

भूख

भूख और कुपोषण की स्थिति देश में  चिंतनीय स्तर पर 

इन तीनों रिपोर्टों में पहली रिपोर्ट  ‘नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे’ (एनएफएचएस)  की है जिसे खुद भारत सरकार ने जारी की है। भारत सरकार द्वारा 22 राज्यों में कराए गए इस सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि देश में कुपोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही महिलाओं में एनीमिया की शिकायत आम हो गई है और इस वजह से बच्चे कुपोषित पैदा हो रहे हैं। 

भूख

उम्र के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों की संख्या बिहार में 22.9 फीसदी 

भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की लंबाई 13 राज्यों में सामान्य से कम है और 12 राज्यों में इसी उम्र के बच्चों का वजन लंबाई के मुताबिक नहीं है। हालांकि इन में संतोषजनक परिणाम सिर्फ शिशु मृत्यु दर के मामले में मिले है। इसके मुताबिक टिकाकरण की वजह से इसके मामले देश के अधिकतर राज्यों में कम हुए हैं।


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वैश्विक सूचकांक में भारत का स्कोर 27.2

दूसरी रिपोर्ट ग्लोबल हंगरइंडेक्स -2020 की है । इसके मुताबिक 107 देशों में हुए इस सर्वेक्षण में भारत 94वें नंबर पर सूडान के साथ है। हंगर-इंडेक्स में चीन दुनिया में सबसे संपन्न 17 देशों के साथ पहले नंबर पर है। हैरानी की बात तो यह की अर्थव्यवस्था के आकार में पाकिस्तान , नेपाल, बांग्लादेश  और इंडोनेशिया जैसे देशों को हंगर- इंडेक्स में भारत से ऊपर जगह मिली है और इसका  ये मतलब है कि वहां हालात भारत से बेहतर हैं।

लॉकडॉउन और उसके बाद भोजन की गुणवत्ता में आई भारी गिरावट

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तीसरी रिपोर्ट  हंगर-वॉच की है ।  इसे भारत के  के 11 राज्यों में सर्वेक्षण के बाद राइड टू फूड कैंपेन ने यह रिपोर्ट जारी की है। इसमें साल 2015 के बाद से अब तक भूख से कथित तौर पर हुई कम से कम 100 मौतों का भी ज़िक्र किया गया है। इस सर्वे में दावा किया गया है कि लॉकडाउन के दौरान भारत के कई परिवारों को कई-कई रातें भूखे रह कर गुज़ारनी पड़ीं। हालांकि लॉकडाउन के दौरान पीडीएस से मुफ्त मिले अनाज, मिड डे मील योजना के तहत मिले सूखा राशन और आंगनबाड़ी केंद्रों से मिली खाद्य सामग्री से लोगों को कुछ राहत ज़रूर मिली हैं।

भोजन के लिए कर्ज के मामले में दलितों कि संख्या 23 फीसदी अधिक

रिपोर्ट के मुताबिक हर चार दलितों और मुसलमानों में से एक और क़रीब 12 प्रतिशत आदिवासियों को रोटी के लिए भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इन तीनों रिपोर्टों का सारांश में यही निकल कर आया है कि विश्व शक्ति बनने की चाह रखने वाले भारत में भूख आज भी सबसे बड़ी चिंता है और इसके लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो भारत भूखे लोगों, कुपोषित बच्चों और एनीमिया से पीड़ित महिलाओं का देश बन जाएगा।

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