मनदीप की गिरफ़्तारी पत्रकारों को एक चेतावनी है- अगर बोलना है तो सरकारी भोंपू बनकर बोलो

मनदीप पुनिया को सिंघु बॉर्डर पर से गिरफ़्तार किया गया. पहले तो कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था कि मनदीप को पुलिस ने कहां रखा हुआ है लेकिन बाद में पता चला कि मजिस्ट्रेट के सामने उसकी पेशी हुई और उसे 14 दिन के न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था. आज मनदीप को ज़मानत मिल गयी है. उसे 25,000 के मुचलके के बाद उसकी ज़मानत हो गयी है.

लेकिन मनदीप पुनिया का मामला हमारे लिए समझना और उसके बारे में बात करना ज़रूरी क्यों हो गया है?


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मनदीप पुनिया सिंघु बॉर्डर पर लगातार रिपोर्टिंग कर रहे थे. उस समय जब सिंघु बॉर्डर पर ख़ुद को स्थानीय लोग बता कर हिन्दू सेना के लोग हंगामा कर रहे थे तब मनदीप वहीं मौजूद होकर रिपोर्टिंग कर रहे थे. उस रात मनदीप ने फेसबुक पर एक वीडियो भी पोस्ट किया था.

उस वीडियो में मनदीप ने किसानों पर किसने हमला किया और पुलिस की क्या भूमिका रही इस पर चर्चा कर रहे थे.

अब आप क्रोनोलॉजी समझिये.

  1. सबसे पहले किसान दिल्ली के अन्दर दाख़िल होते हैं और उन्हें रोकने की पर्याप्त कोशिश नहीं होती.
  2. किसान लाल किले में दाख़िल होते हैं और पुलिस मूक दर्शक बनी रहती है.
  3. जो पत्रकार वहां रिपोर्टिंग कर रहे थे, सिवाए सरकारी भोंपूओं के, उनके ऊपर सरकार करवाई करती है.
  4. यूपी में ‘देशद्रोह’ के मुकदमे दर्ज किये जाते हैं.
  5. उसके बाद कुछ ‘राष्ट्रवादी’ अपने आप को स्थानीय लोग बताकर सिंघु बॉर्डर पर हंगामा करते हैं और वहां तनाव की स्थिति बन जाती है. उस घटना में एक एस.एच.ओ गंभीर रूप से घायल होते हैं.
  6. मनदीप पुनिया और धर्मेन्द्र कुमार जो उस समय वहां मौजूद थे और घटना की रिपोर्ट दर्ज करते हैं, पुलिस की मौजूदगी पर सवाल उठाते हैं, उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाता है.

मनदीप पुनिया के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 186 (सरकारी कर्मचारी के काम में जानबूझकर बाधा उत्पन्न करना), 353 (ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारी को पीटना या उसके खिलाफ बल प्रयोग) और 332 (ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारी को जानबूझकर चोट पहुंचाना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी.


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अदालत ने पुनिया को उसकी पूर्व अनुमति के बिना देश से बाहर नहीं जाने का निर्देश दिया. उसने कहा, ‘आरोपी जमानत पर रिहाई के दौरान इस प्रकार का कोई अपराध या कोई अन्य अपराध नहीं करेगा. आरोपी किसी भी तरह सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेगा.’

दिल्ली पुलिस ने पुनिया की जमानत का विरोध करते हुए कहा था कि वह प्रदर्शनकारियों को उकसा सकता है और विभिन्न लोगों के समूह के साथ विरोध स्थल पर उपद्रव मचा सकता है और जांच में बाधा उत्पन्न कर सकता है.

उनके खिलाफ प्राथमिकी में कहा गया है कि वह एक कांस्टेबल के साथ शारीरिक संपर्क में आया था और पुलिस द्वारा स्थापित बैरिकेड्स को पार करने का प्रयास किया था.

अदालत ने कहा, ‘यहां यह उल्लेख करना उचित है कि वर्तमान मामले की कथित हाथापाई की घटना शाम लगभग 6.30 बजे की है. हालांकि, वर्तमान प्राथमिकी अगले दिन लगभग 1.21 बजे दर्ज की गई थी.’ पुनिया ने अपनी याचिका में प्राथमिकी दर्ज करने में हुई इस सात घंटे की देरी का भी उल्लेख किया था.

कुछ महत्वपूर्ण बातें जिसकी तरफ़ हमारा ध्यान आना चाहिए.

मनदीप पुनिया जो रिपोर्ट कर रहे थे उसमें वो पुलिस की बात से और रोल से सहमत नहीं थे. राजदीप सरदेसाई, सिद्धार्थ वरदराजन, मृणाल पाण्डेय, ज़फ़र आगा आप इन सभी की रिपोर्ट या ट्वीट पढ़िए जो 26 जनवरी के हिंसा से संबंध में लिखे गए हैं. इन सभी ट्वीट या रिपोर्ट में एक बात कॉमन है कि सभी पुलिस की बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते हैं.

मनदीप पुनिया की पत्नी लीलाश्री कहती हैं

मनदीप ईमानदार पत्रकारों की श्रेणी में आते हैं और आज के वक़्त में ऐसा ही काम करने की ज़रूरत भी है. लेकिन अब इस तरह के काम करने वाले लोगों के रास्ते में जब प्रशासन की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरकत देखने को मिलती है तब थोड़ी डिससटिस्फैक्शन (असंतुष्टि) होती है. क्योंकि सरकार और प्रशासन जनता की सुरक्षा के लिए है लेकिन यहां बिलकुल उल्टा है.

मनदीप पुनिया और बाकी के पत्रकार जिन पर पुलिस द्वारा करवाई हो रही है वो पुलिस के ‘हिसाब’ से रिपोर्टिंग नहीं कर रहे थे.

तो क्या ये मान लिया जाए कि मनदीप की गिरफ़्तारी बाकी पत्रकारों के लिए एक चेतवानी है?

क्या मनदीप की गिरफ़्तारी से पुलिस एक मिसाल कायम करना चाह रही है?

26 जनवरी के ट्रैक्टर परेड में नवरीत की मौत होती है. पुलिस के मुताबिक उसकी मौत ट्रैक्टर पलटने से होती है. लेकिन द वायर ने इसको लेकर एक रिपोर्ट की. रिपोर्ट में नवरीत के घर वालों का दावा था कि उसकी मौत गोली लगने से हुई है.

क्या घर वालों के दावों की रिपोर्टिंग करना भी अपराध है?

द वायर की रिपोर्ट में नवरीत के पिता विक्रमरीत सिंह कहते हैं कि

सभी ने मेरे बेटे की लाश देखी है और गोली के निशान भी देखें हैं.

क्या मीडिया में अब वही ख़बरें चलनी हैं और उसी एंगल से चलनी हैं जो पुलिस चाहती है?

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