मोदी सरकार ने मनरेगा योजना के शहरी संस्करण लॉन्च करने के विचार को छोड़ा

मनरेगा योजना

देश में मनरेगा यानी कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार मुहैया करवाई जाती है। सरकार द्वारा इसी के शहरी संस्करण को लॉन्च करने का विचार किया गया था। लेकिन धन की कमी के चलते फिलहाल इस पर विचार को छोड़ दिया गया है।

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मनरेगा को लेकर अधिकारियों के वक्तव्य

  • विभिन्न अधिकारियों से इसे लेकर सवाल किया गया। इस में शहरी गरीबों के लिए नीतियाँ बनाने के लिए अधिकृत आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि, “फिलहाल इस प्रस्ताव पर सक्रियता से विचार नही किया जा रहा है।

 

  • इसके अलावा मंत्रालय के अन्य दो वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि, “कोरोनावायरस महामारी के पहले चरण में शहरी ग़रीबों को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से विचार विमर्श किया गया था, जिसमें एक लाख की आबादी वाले छोटे शहरों में मनरेगा के तहत रोज़गार सृजन  कार्यक्रम शुरू करने को लेकर विचार किया गया था।

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  • एक अन्य अधिकारी ने बताया कि, “मनरेगा को लेकर सभी राज्यों के सचिवों के साथ बैठक की गई। साथ ही नीति आयोग और कैबिनेट सचिवालय में भी इस बात पर चर्चा की गई, लेकिन इस योजना को धन की कमी के कारण छोड़ दिया गया।

 

  • एक दूसरे अधिकारी बताते हैं कि, “धन की कमी की वजह से शहरी क्षेत्रों में इस योजना को लागू करने को लेकर नियमित निगरानी करने में कुछ व्यवहारिक दिक्कतें का सामना करना पड़ रहा है।

 

  • उन्होंने बताया कि भारत में 3000 से ज्यादा शहर मौजूद हैं। ऐसे में इस योजना को पूरी तरह से लागू करना एक बहुत बड़ा काम होगा।” इसके साथ ही अधिकारी ने यह भी बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी क्षेत्रों में बहुत ज्यादा अनुबंध आधारित काम नहीं होते हैं। वही शहरी क्षेत्रों में धरती से जुड़ा काम रोज़गार के तहत कवर होगा। हालांकि इसकी गुंजाईश सीमित ही है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में तो ज्यादातर जमीन से जुड़ा काम ही होता है, जैसे- नहर की खुदाई आदि। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में इस बात का पता नहीं है, कि कितने शहरी गरीब ऐसे हैं जो भूमि से जुड़े शारीरिक श्रम करने को तैयार होंगे।

 

  • आवास शहरी मामलों के मंत्रालय से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि, इस योजना को पूरी तरह से रद्द नहीं किया गया है। हालांकि इस पर तत्काल कुछ करने का प्रस्ताव नहीं है।

क्या है मनरेगा? कब हुई इसकी शुरुआत?

मनरेगा की शुरुआत यूपीए शासन के दौरान हुई थी। इसे 2006 में शुरू किया गया था तथा इसके तहत सरकार एक ग्रामीण परिवार को न्यूनतम 100 दिनों की मजदूरी की गारंटी देता है। इसमें वयस्क सदस्य खुद की इच्छा से सकुशल शारीरिक श्रम कर सकता है।


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उड़ीसा और झारखंड में मनरेगा लॉन्च

भले ही शहरी आवास मंत्रालय ने शहरी ग़रीबों को रोज़गार देने की योजना को छोड़ दिया है, लेकिन अभी भी दो राज्य ऐसे हैं, जहां इस योजना को लॉन्च किया जा चुका है। यह दो राज्य उड़ीसा और झारखंड है। झारखंड सरकार ने तो शहरी क्षेत्रों में 1 साल में 100 मानव दिवस कार्य देने की योजना मुख्यमंत्री श्रमिक (कामगार के लिए शहरी रोज़गार मंजूरी) योजना लॉन्च की थी।

वही उड़ीसा में अप्रैल माह में 6 महीने के लिए शहरी वेतन रोजगार पहल की शुरुआत की गई थी, जिसका लक्ष्य 4.5 लाख परिवारों को जोड़ना था।

मनरेगा शहरी संस्करण का विचार पुराना

मनरेगा के तहत शहरी संस्करण लॉन्च करने का यह विचार नया नहीं है। दरअसल, नरेंद्र मोदी के सत्ता में लौटने के बाद इसका प्रस्ताव आया था। जिसे आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने आगे बढ़ाया था। लेकिन इस प्रस्ताव को लंबी चर्चाओं के बाद भुला दिया गया था।

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