महिला किसान दिवस पर जानिए क्या है देश में इनकी स्थिति ?

महिला किसान दिवस 

प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक  एम.एस स्वामीनाथन ने कृषि क्षेत्र में सुधारों की हमेशा वकालत करते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि इतिहासकार यह मानते है कि महिलाओं ने है सबसे पहले खेती करने की सोची और फसल उपजाने की कला और विज्ञान की परख कि लेकिन इन महिला किसानों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया, चुप कर दिया गया, भेदभाव किया गया और अदृश्य रहने के लिए मजबूर किया गया। अगर हम आंकड़े देखते है तो  उनका यह कथन 21 वीं सदी में भी उनका यह कथन सत प्रतिशत सत्य साबित होती है।

महिला किसान

73.2% ग्रामीण महिलाएँ खेतों में कार्यरत , लेकिन सिर्फ 13% जमीनों पर उनका स्वामित्व

महिला किसानों के अधिकारों की लगातार अनदेखी की गई है। अगर हम उनके योगदान पर एक नजर डाले तो पता चलता है कि देश के कृषि क्षेत्र में आर्थिक रूप से सक्रिय 80% महिलाएं काम करती हैं और खेतों में काम करने वाले लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी 33% है। इनमे सेल्फ इंप्लॉयड किसानों में उनकी हिस्सेदारी 48% है।  इसके अलावा खेतों से फसलों का परिवहन करने वाले 82% श्रमिक, बीज बोने वालों में 76%, 100% श्रमिक जो प्रक्रिया करते हैं वह सभी महिलाएं ही होती है।अन्य क्षेत्रों की तरह खेती में भी महिलाएं लिंगवाद, पितृसत्ता और हिंसा के शिकार हैं। अगर हम अलजज़ीरा, न्यूज़सीक  के आंकड़ों पर नजर डाले तो   1995 और 2018 के बीच, 50,188 महिला किसानों ने आत्महत्या की है।  जो कि काफी गंभीर मसला है कभी इसके गंभीरता से नहीं लिया गया।


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आत्महत्या करने वाले किसानों कि पत्नियों के नाम जमीन नहीं रहने से उन्हें कोई सरकारी लाभ नहीं मिल पाता

महिला किसान

महिला किसान  भारतीय कृषि क्षेत्र की रीढ़ की हड्डी होने के बावजूद इन्हें किसान कि पहचान नहीं मिलती है। महिला किसानों के एक संगठन महिला किसान अधिकार मंच की एक रिपोर्ट कहती है कि 2012 से 2018 के दौरान महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ जिलों की 40% महिला किसानों, जिनके पतियों ने कर्जे के आत्महत्या की, को अब तक अपनी खेती की जमीन का स्वामित्व नहीं मिला। खेती की जमीन न होने के कारण उन्हें न तो सरकारी लाभ मिलते हैं और न ही सामाजिक सुरक्षा। अक्सर उन्हें बैंक से ऋण नहीं मिल पाते ना ही सबसिडी पर उर्वरक और फसल खराब होने पर सरकारी बीमा भी नहीं मिल पाता क्योंकि सरकारी कागजों में वे किसान नहीं होतीं।  संख्या को आंकना मुश्किल होता है। प्रमुख कृषि वैज्ञानिक और राज्यसभा  के सदस्य प्रो एम.एस. स्वामीनाथन ने  महिला किसान प्रवेश विधेयक, 2011 पेश किया था  जिनमें महिला किसानों के नाम सामान जमीन कि बात थी लेकिन वह कभी राज्यसभा में पास नहीं हो पाई और 2013 में यह बिल लैपस हो गया।

खेती में भी अक्सर महिलाओं को सहायक समझा जाता और पैसे भी कम मिलते 

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अगर हम हाल की तस्वीर को देखे तो कृषि क़ानून को लेकर आंदोलन लगातार जारी है। आंदोलन में हर तरफ किसानों के नाम पर अधिकतर पुरुष चेहरे नजर आ रहे हैं। इससे भी देश में उनकी स्थिति का अंदाजा होता है। भारत के किसानों में महिलाओं की संख्या बहुत बड़ी है पर किसान कहने पर हमारे दिमाग में सिर्फ आदमी की आकृति ही उभरती है।

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