इतिहास में दफन मानगढ़ नरसंहार की कहानी,जानें क्या थी पूरी घटना

मानगढ़ नरसंहार की कहानी

17 नवम्बर 1913 आज मानगढ हत्याकांड के बलिदान को 107 वर्ष हो गए है। भारत के इतिहास के पन्नों में  स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड की  चर्चा होती है लेकिन आज भी बहुत काम लोग ही  मानगढ़ नरसंहार  के बारे में जानते है। मानगढ़ जनसंहार भारत के इतिहास में दफन सबसे बड़ी कुर्बानियों में से एक है।राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ की पहाड़ी पर अंग्रेजों ने 17 नवंबर, 1913 को 1,500 से ज्यादा भीलों को मौत के घाट उतार दिया था लेकिन आज इस बलिदान को शायद इसलिए भुला दिया गया,क्योंकि इसमें बलिदान देने वाले वाले लोग निर्धन वनवासी थे।

बता दें मानगढ़ राजस्थान में बांसवाड़ा जिले की एक पहाड़ी है। यह सारा क्षेत्र वनवासी बहुल है। यहां की मुख्य आबादी भील जनजाति की हैं। जब हमारा देश अंग्रेजो का गुलाम था तब स्थानीय सामंत, रजवाड़े तथा अंग्रेज इनकी अशिक्षा, सरलता तथा गरीबी का लाभ उठाकर इनका शोषण करते थे।

कुरीतियों तथा अंध परम्पराओं को मिटाने के लिए गोविन्द गुरु के नेतृत्व में सामाजिक एवं आध्यात्मिक आन्दोलन

साल  1858 में गोविंद गुरु जिनका जन्म डूंगरपुर जिले के बांसिया (बेड़िया) गांव में गोवारिया जाति के एक बंजारा परिवार में हुआ था। बचपन से उनकी रुचि शिक्षा के साथ अध्यात्म में भी थी। महर्षि दयानन्द की प्रेरणा से उन्होंने अपना जीवन देश, धर्म और समाज की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी गतिविधियों का केन्द्र वागड़ क्षेत्र को बनाया। गोविन्द गुरु ने 1903 में ‘सम्प सभा’ की स्थापना की।

इसके द्वारा उन्होंने शराब, मांस, चोरी, व्यभिचार आदि से दूर रहने, परिश्रम कर सादा जीवन जीने, प्रतिदिन स्नान, यज्ञ एवं कीर्तन करने, विद्यालय स्थापित कर बच्चों को पढ़ाने, अपने झगड़े पंचायत में सुलझाने, अन्याय न सहने, अंग्रेजों के जागीरदारों को लगान न देने, बेगार न करने तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी का प्रयोग करने जैसे सूत्रों का गांव-गांव में प्रचार किया गया था।

Mangadh Massacre Is More Worse Than Jallianwala Bagh Histrory In Hindi | जलियांवाला बाग से भी अध‍िक बर्बर था मानगढ़ का जनसंहार - Life Hacks | नवभारत टाइम्स

कुछ ही समय में लाखों लोग उनके भक्त बन गये। प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को सभा का वार्षिक मेला होता था। मेले में  लोग पूजा के साथ साथ राजनीतिक समस्याओं की चर्चा भी करते थे। और इस वजह से ही  यहां के वनवासी क्षेत्र  में धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार तथा स्थानीय सामन्तों के विरोध की आग में सुलगने लगा।


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 17 नवम्बर, 1913 को मानगढ़ की पहाड़ी पर वार्षिक मेला के दिन की घटना

इसी दौरान 17 नवम्बर, 1913 को मानगढ़ की पहाड़ी पर वार्षिक मेला होने वाला था। इससे पूर्व गोविन्द गुरु ने शासन को पत्र द्वारा अकाल से पीड़ित वनवासियों से खेती पर लिया जा रहा,कर घटाने और धार्मिक परम्पराओं का पालन करने देने तथा बेगार के नाम पर उन्हें परेशान न करने का आग्रह किया था। लेकिन प्रशासन ने पहाड़ी को घेरकर मशीनगन और तोपें लगा दीं। उस समय तक वहां लाखों भक्त आ चुके थे। पुलिस ने कर्नल शटन के नेतृत्व में गोली चलवानी प्रारम्भ कर दी जिससे हजारों लोग मारे गये।  पुलिस ने गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर पहले फांसी और फिर आजीवन कारावास की सजा दी।

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1923 में जेल से मुक्त होकर वे भील सेवा सदन, झालोद के माध्यम से लोक सेवा के विभिन्न कार्य करते रहे। 30 अक्तूबर, 1931 को ग्राम कम्बोई (गुजरात) में उनका देहांत हो गया। आज भी लोग प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को वहां बनी उनकी समाधि पर आकर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। मानगढ़ के वंशज द्वारा उस घटना कि जानकारी सुन कर रूह कांप उठती है। और इस बात का दुख भी है कि आज की पीढ़ी इस बलिदान के बारे में नहीं जानती हैै।

राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित एक की पहाड़ी पर अंग्रेजों ने इस कुकर्म को अंजाम दिया था जहां उन्होंने 1500  से भी अधिक भीलो की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी थी। मारे गए भिलो के वंश रक्षक जो आज भी इस दुनिया में मौजूद है वह सरकार से उन्हें न्याय दिलाने की गुहार लगाते रहते हैं। इस नरसंहार को जालियांवाला बाग से भी अधिक घिनौना और दिल दहला देने वाला नरसंहार बताया जाता है। हालांकि आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते तो आइए जानते हैं मानगढ़ नरसंहार से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं को।

 

इस नरसंहार को एक बर्बर आदिवासी नरसंहार भी कहा जाता

राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित अरावली पर्वत पर इस नरसंहार को अंग्रेजों द्वारा 17 नवंबर 1913 को अंजाम दिया गया था। वहां मौजूद भीलों‌ के इतिहास के अनुसार अंग्रेजी फौज ने आदिवासी के नेता और सुधारक गोविंद गुरु के 1500 से भी अधिक समर्थकों को गोलियों से भून कर मौत के घाट उतार दिया था। उसी दौर में भीलों के सशक्तिकरण के लिए भगत आंदोलन भी चलाया गया था।

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आदिवासी नेता गुरु से प्रेरित होकर भी भीलो ने उस दौरान अंग्रेजों की नीतियों का जमकर विरोध किया था और कई जगह प्रदर्शन भी किए थे। उस नरसंहार में बहुत सारे लोग मारे गए जिन के वंशज आज भी मौजूद हैं और पुरानी बातों को अक्सर याद किया करते हैं।

माना जाता है कि इस गोलीबारी को रोकने का आर्डर अंग्रेजी अफसर ने तब दिया जब गोलीबारी में मारी गई एक महिला का बच्चा उससे लिपट कर स्तनपान कर रहा था। कई लोगों का कहना है कि तोप जैसी बंदूक उनके ऊपर लाद दी गई थी और उन्हें दौड़ने को कहा जाता था वह जैसे ही दौड़ने लगते थे उन्हें मार दिया जाता था और यह नीति अंग्रेजों ने इसीलिए अपना ही ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों की हत्या कर सके।

 

इस हत्याकांड के बाद खौफ इतना फैल गया था कि आजादी के कई दशक बाद तक भील मानगढ़ जाने से परहेज करते थे। उस दौरान अंग्रेजों ने आखरी बाजी खेलते हुए सलाना जुताई के लिए सवा रुपए की पेशकश की जिसे भीलों ने सिरे से नकार दिया। उस वक्त भी एक नारा दिया गया था जिसे हिंदी में कहा करते हैं “ओ अंग्रेजों, हम नहीं झुकेंगे तुम्हारे सामने”।

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