आख़िर मैं कैसे कहूं ‘मेरा भारत महान’- एक भारतीय का सभी के नाम ख़त

हम सभी कहते हैं मेरा भारत महान.

‘मेरा भारत’ सुनकर ही अपनापन सा लगता है. मैं अपने देश का नागरिक होने पर अत्यंत उत्साह से भर जाता हूं. मैं अपने देश पर बहुत गर्व करता हूं, यह गर्व होने का एहसास मुझे इस देश की धर्म निष्पक्षता देती है. इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था ही कुछ ऐसी है मानो यह इंसान को ज़िम्मेदार नागरिक होने का एहसास दिलाती है. यह देश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जहां हर तरह के धार्मिक रीति-रिवाज़ यहां की हवा में मिले हुए हैं जिसे अलग करना लगभग नामुमकिन है.

हमारा भारत ‘विविधता में एकता’ का सबसे बड़ा उदाहरण है जहां के प्रत्येक नागरिक को अपने हक के साथ जीने का अधिकार है. इस देश में भांति-भांति के रीति-रिवाज़, त्योहार, पहनावा, इत्यादि इसे और भी मज़बूत बनाते हैं. विविधता का मतलब एक तरह से खुशी का है जिसमें हम सब एक दूसरे की आस्था और विश्वास को अलग अलग मोतियों की तरह गले में पहनते हैं. हां, थोड़ा बहुत वैचारिक मतभेद हो सकता है पर फिर भी हमारी एकता को कोई खंडित नहीं कर सकता क्योंकि यही तो हमारी विविधता में एकता का जीता जागता उदाहरण है. हमारा देश एकता और अखंडता पर ही टिका हुआ है और यह सिर्फ तभी मुमकिन है जब हम अपने संविधान को सबसे ऊपर रखें. हमारा संविधान ही है जो हमें सांप्रदायिक सौहार्द में जीने का हक देता है.

ये बातें अमल में लाने के बजाय अब कहने के लिए ही बच गईं है. जहां बराबरी, लोकतंत्र, आपसी भाईचारा की बात होती थी अब वहां सिर्फ और सिर्फ नफ़रत भरी राजनीति हो रही है. माफ़ कीजिएगा मैंने इसमें राजनीति को शामिल कर लिया पर मेरे पास इसे शामिल करने की एक वजह है- हमारे धर्म और आस्था का राजनीतिकरण होना. देश की आवाम को कुछ लोग धर्म का चश्मा पहना कर सामाजिक और आर्थिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं. हमारा यह इशारा सिर्फ़ और सिर्फ़ मौजूदा हुकूमत की ओर जा रहा है जो कि सत्ता में बहुत से वादे लेकर आई थी पर हम सब कहीं ना कहीं मूर्खता के शिकार हुए हैं.

यह मूर्खता देश में अमन पसंद करने वाले लोगों को बिल्कुल स्वीकार नहीं है. आज इस गंदी राजनीति की वजह से ही हमारा देश टूट रहा है. इससे छुटकारा पाना मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं. इनकी राजनीति करने का तरीका कुछ ऐसा है मानो कि यह एक खास विचारधारा के सहारे इस देश को चलाना चाहते हैं. यह एक खास समुदाय को बलि का बकरा बना कर मारना नहीं चाहते बल्कि उसे गुलाम बनाकर अपना राजपाठ चलाना चाहते हैं. यह उसी समय के काल में देश को धकेलना चाहते हैं जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ लोग कुछ मुट्ठी भर लोगों के यहां गुलामी की जली हुई रोटी को खाने पर मजबूर हो जाएं. इनमें और अंग्रेज़ों में कुछ खास अंतर नहीं है, अंग्रेज हमें अपना गुलाम बना कर अपना राजपाठ चलाया करते थे. उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई थी.

आज ठीक उन्हीं के रास्ते पर मौजूदा हुकूमत है जो इसी नीति की आंच पर अपनी रोटी सेक रही है. अंग्रेज़ों के पास तो फिर भी हमें तोड़ने के लिए कुछ भी नहीं था पर इन चोरों के पास हमें तोड़ने के लिए हज़ारों मुद्दे हैं. इनके राज में हमारी अर्थव्यवस्था डगमगाई है और हो भी क्यों ना, नोटबंदी करने का इनका जो ऐतिहासिक फैसला था वह मुख्य कारण बना और दूसरा कारण जीएसटी (गब्बर सिंह टैक्स) रहा. यह हमारी अर्थव्यवस्था के गाल पर ऐसा तमाचा था जो कि हमारे जीडीपी अनुमान को भी नीचे ले गया. नोटबंदी करके उन्होंने बोला था काला धन वापस आ जाएगा, भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, पर हुआ क्या? बल्कि इसके विपरीत बैंकों में नोट अदला-बदली में करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ.

उन्होंने कहा था नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूटेगी, पर इसके विपरीत देश में सबसे बड़ा आतंकवादी हमला होता है. इस सरकार की नीति कुछ समझ में नहीं आती. NSSO की एक रिपोर्ट आती है जिसमें कहा गया कि पिछले 45 सालों में बेरोज़गारी सबसे ज़्यादा है. कुछ लोग से जब यह बात करूं तो वह लोग कहते हैं कि कांग्रेस ने इतने सालों तक राजपाठ चलाया है और इन्हें तो अभी 5 साल ही हुआ है और आप हिसाब मांगते हैं. मुझे इन्हें सरकार के पक्षकार के रूप में देखकर हंसी भी आती है और अफसोस भी होता है. अरे भाई अगर शुरुआत अच्छी होती है तो यकीनन परिणाम भी फल स्वरुप अच्छा आएगा पर शुरुआत तो करें? उन्होंने तो हमें सिर्फ हिंदू और मुसलमान में क्या फर्क है, यही बताया है.

हमें समझ नहीं आता कि यह धार्मिक आधार पर मुसलमानों को निश्चिंत करते हैं और जाति के आधार पर एक गरीब दलित को चिंतित करते हैं. यह कैसी विडंबना है कि आप एक दलित चेहरे को राष्ट्रपति बनाकर और दलित लोगों को पीट-पीटकर मार रहे हैं. इतने मुस्लिम मंत्री आपके कैबिनेट में होने के बाद भी आप मुस्लिमों से इस देश के नागरिक होने का सबूत मांगते हैं, एनआरसी,एनपीआर जैसे कानून संसद में पारित कराकर. हमें यह सब समझ में आता है साहब. यहां की आवाम अब जागरूक हो उठी है. आपके पोस्ट में यह दोनों चेहरे हैं, तब भी हालात नहीं सुधरते, आखिर क्यों? इसका मतलब कहीं ना कहीं इसके पीछे उनका अपना स्वार्थ छुपा हुआ है कि वह भी इस विचारधारा से काफ़ी हद तक प्रभावित हो चुके हैं.

यह सरकार हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ मुद्दों से भटकाने की पुरजोर कोशिश कर रही है. उपर्युक्त कथन को मैं कुछ तथ्यों के आधार पर बताना चाहता हूं. आप स्वयं ही विश्लेषण करें.

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक रिपोर्ट आई और ये कहती है कि भारत का जीडीपी 6.1%-4.8% तक गिर चुकी है 2019-2020 के आर्थिक सत्र में. भारत की मंदी की वजह से पूरी दुनिया को मंदी की मार झेलनी पड़ रही है और हो भी क्यों ना, कहीं ना कहीं सरकारी कंपनियों का निजीकरण यह साबित करता है कि सरकार के खजाने में अब कुछ बचा नहीं है और सरकार इनको चलाने में बिल्कुल ही नाकाम साबित हो रही है.

ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री  का भी हालात बहुत नाजुक है, कंपनियों में टारगेट के अनुसार उत्पादन नहीं हो रहा है जिससे कि कर्मचारियों की छंटनी हो रही है. बैंकों में पैसा नहीं है जिससे कि भारतीय रिजर्व बैंक को कम दरों पर बैंकों को ब्याज देना पड़ रहा है.

World Economic Forum ने Global Social Mobility report जारी की जो कि यह बताती है कि एक गरीब व्यक्ति को आर्थिक रूप से संपन्न होने में कितना समय लगेगा. आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत 86 देशों में 75वें स्थान पर है, जिसमें यह अनुमान लगाया गया है कि भारत जैसे देश में एक अत्यंत गरीब व्यक्ति को सात पीढ़ी तक समय लग जाएगा आर्थिक रूप से संपन्न होने में. और वही डेनमार्क जैसे देश में सिर्फ दो पीढ़ी में संभव है. हमारी Global Social Mobility Index तभी सही होगा जब हमारे देश में अवसरों की भरमार होगी और यह तभी संभव है जब सभी नागरिकों को सामान अवसर प्रदान किए जाएं. यह तभी संभव है जब यहां के नागरिक आर्थिक, सामाजिक और न्यायिक हिसाब से बराबरी में आ जाए. सिर्फ तब ही हमारा देश कामयाबी के शिखर को छू पायेगा. कैसे कहूं- मेरा भारत महान


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अभी आप खुद सोच सकते हैं कि सरकार की जो नीति है- CAA, NRC और NPR जैसे कानून ला कर क्या यह सब नागरिकता पर हमला है कि नहीं? भारत खुद ही 80% इसका जिम्मेदार है. यहां सरकार अपना ध्यान ना शिक्षा की ओर केंद्रित करती है और ना ही स्वास्थ्य पर जो हमारे देश का एक अहम बुनियादी मुद्दा है. सरकारी स्कूलों की तो बात ही दुर्लभ है, यहां गरीब बच्चों को खिचड़ी और ड्रेस का ही लालच दिया जाता है और इनकी अच्छी शिक्षा का कोई खयाल नहीं. कहीं मिड डे मील खाने से बच्चे बीमार हो रहे हैैं, यहां सरकार की लापरवाही सामने आती है. सरकारी अस्पतालों का तो ऐसा हाल है कि मानो अस्पताल नहीं शमशान ज्यादा लगता हो. जहां उपचार के अभाव के कारण कितने गरीब मजलूम अपनी जान सस्ते ढंग से गंवा बैठते हैं. डॉक्टरों की लापरवाही इस ढंग से है कि वह उपचार अस्पताल में कम और उनकी निजी क्लीनिक में ज्यादा काम करते हैं. क्या यही है अच्छे दिन? कैसे कहूं- मेरा भारत महान?

कहा जाता है, पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है, पर यहां यह स्तंभ ऐसा जड़ से हिल गया है मानो इसे किसी खास ने अपने सहारे खड़े किए हुआ हो. हमारी मीडिया आज इस तरह बिक चुकी है कि आज ऐसा कोई भी मीडिया जगत नहीं है जो कि सरकार की चापलूसी में ना लगा हो. पहले का मीडिया सरकार से उनकी विफलता पर आमने सामने बात करता था. आज वही मीडिया सरकार की गोद में जाकर बैठ गया है. सभी मीडिया चैनलों पर सिर्फ हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, गौ रक्षा और इन्हीं सब विषयों पर बात होती है क्योंकि इन्हीं सब विषयों से टीआरपी बढ़ता है और झूठ को बड़े fashionable ढंग से फैलाया जा रहा है. यह सब बुनियादी मुद्दे जैसे कि पढ़ाई और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर बात नहीं करते! यह लोग बेरोजगारी पर बात नहीं करते! यह लोग गिरती अर्थव्यवस्था पर बात नहीं करते जो कि हर 3 महीने पर गिरती ही चली जा रही है ! महिलाओं की सुरक्षा पर बात नहीं करते! और यह सब ना करने का भी एक कारण है क्योंकि इन सब मुद्दों पर अगर बात करेंगे तो सरकार की विफलता साफ दिखेगी. और यह गोदी मीडिया (Godi Media) सरकार के खिलाफ कैसे जा सकती है भला, ज़रा सोचें.

अब बात हम शिक्षा की करते हैं, नई प्रणाली के तहत सरकार शिक्षा पर अपने बजट का सिर्फ़ 3.4 % ही खर्च करती है, जो कि बहुत ही कम है. भारत शिक्षा के मामले में 82 देशों में 77 वें स्थान पर है. शिक्षण संस्थानों का निजीकरण एक-एक करके होता चला जा रहा है. फीस वृद्धि के जरिए हाल ही में केंद्र सरकार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की फीस वृद्धि कर दी जिसका विद्यार्थियों ने बहिष्कार किया तो उन पर लाठियां बरसाई गई. यह निजीकरण हमें उस गुलामी के दौर में ढकेल रहा है जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ एक विशेष तबका ही रह जाए शिक्षा प्राप्त करने के लिए, जिससे कि गरीब और दलित बिल्कुल ही इस सीमा के बाहर हो जाएं. ऐसे बहुत सारे शिक्षण संस्थान हैं जो कहीं ना कहीं निजीकरण के इस जाल में एक-एक करके फंसते चले जा रहे हैं. हमारे देश के उच्च शिक्षण संस्थान जैसे IIM, IIT, UGC, AICTE, IISER के बजट की कटौती भी एक कारण है, हमारी शिक्षा प्रणाली के कमजोर होने का. कैसे कहूं- मेरा भारत महान

भारत की “लोकतांत्रिक सूची” (Democracy Index) भी फिसल कर नीचे आ गया है, जब से यह सरकार सत्ता में आई है. जब से इनकी सरकार आई है तब से नागरिक स्वतंत्रता का बड़े पैमाने पर कटाव हुआ है. बोलने की आजादी को छीना गया है. पढ़े लिखे लोग अगर सरकार की गलत नीति के खिलाफ़ आवाज़ उठाते हैं तो उन्हें “Urban-Naxals“, “टुकड़े-टुकड़े गैंग” जैसी संज्ञा दी जाती है. कश्मीर को ही देख लीजिए, वहां बहुसंख्यक आबादी मुस्लिमों की है, वहां उन्होंने संविधान की अवहेलना की, 370, 35-A को निरस्त करके, जिसका लक्ष्य सिर्फ एक खास समुदाय को निशाना बनाना हुआ. कुछ राजनैतिक चेहरों को इन्होंने नजर बंद कर दिया जिन्हें नागरिक की स्वतंत्रता की चिंता थी और विडंबना देखिए कि इन्होंने अपने तानाशाही खेमे का ऐसा उदाहरण दिया कि जिसके साथ इन्होंने अपनी सरकार बनाई थी, उसको भी नजरबंद किया. घाटी में सामाजिक और आर्थिक दोनों ढंग से नुकसान हुआ, इंटरनेट को बंद करा कर. हमारी लोकतांत्रिक सूची के गिरने का एक और मुख्य कारण है, हमारी सरकार के कुछ मंत्रियों, सांसदों का घृणा भरा भाषण खुले मंच पर देना. कैसे कहूं- मेरा भारत महान.

यह लोग हमारे भाइयों को आपस में सिर्फ़ लड़ाने की कोशिश करते हैं, सामाजिक ध्रुवीकरण करना इन लोगों का मानो पेशा सा बन गया है. यह लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ बहुसंख्यक आबादी को अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं. कहते हैं कि अल्पसंख्यक सिर्फ 14% हैं और हम लोग 80%, अगर हम लोग तुम्हारे खिलाफ़ हो गए तो सोच लो तुम्हारा क्या होगा? यह है इनकी राजनीति करने का तरीका और सलीका. यहां तक कि हमारे प्रधानमंत्री भी अब बोलने से चूके नहीं कि वह लोगों को उनके कपड़ों से पहचान लेंगे कि कौन दंगाई है. वाह मोदी जी वाह. ऐसे कई उदाहरण हैं, जो कि हमारे लोकतंत्र के लिए बिल्कुल उचित नहीं है. उनके राज्य में ‘भारत माता की जय’ बोलना मानो देशभक्ति को सिद्ध करने (Acid Test) जैसा साबित हो गया है. कैसे कहूं- मेरा भारत महान

हमारी सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) में आज भी सबसे बड़ी रुकावट है यहां की जाति व्यवस्था. आज भी हमारे समाज उसी मनुवादी या कहें तो मानसिक गुलामी का शिकार है. यह जो अल्पसंख्यक, गरीब, दलित लोग हैं, उन्हें आज भी नीच और हीन भावना से देखा जाता है. आज भी हर 5 दिनों में एक पिछड़े या गरीब आदमी की मौत गटर साफ करने में हो जाती है, इस पर सरकार का कोई ध्यान नहीं.

हमें सोचना चाहिए कि जो सरकार अपनी तानाशाही से सत्ता हथियाना चाहती हो या फिर उस में बने रहना चाहती हो वह शासन किन ताकतों से करेगी? स्वास्थ्य और शिक्षा हमारे सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. हमारे देश में युवाओं के लिए अवसरों की भरमार होनी चाहिए तभी जाकर हमारा देश एक विकासशील देश बनेगा और साथ ही साथ 5 trillion अर्थव्यवस्था में प्रवेश करेगा. हमारे प्रधानमंत्री को शिक्षा पर चर्चा करनी चाहिए और यह हैं कि परीक्षा पर चर्चा करते हैं. जब विदेश जाते हैं तो कहते हैं “भारत में सब चंगा सी”. क्या हमारे भारत में अच्छे दिन आए हैं जरा इस बार पर विचार करिए. तब तक कैसे कहूं- मेरा भारत महान?

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