उफ़्फ़, इतनी घृणा और नफ़रत के बीच कैसे कहूं ‘मेरा भारत महान’

बड़ा विचित्र दौर है यह, भयानक, ख़तरनाक, काला.
सीधे-सपाट लहज़े में शब्दों की भव्य माला रचे बिना यदि बात करें तो समझिए यह कि हम और आप एक ऐसे दौर में शिथिल पड़े हैं, जहां शत्रुता एक संक्रामक बीमारी है, और हवा में मिलाकर सबको निःशुल्क बांटी जा रही है. जो वास्तविक शत्रु हैं, वो इसका कारोबार कर प्रतिदिन मुनाफ़े का सौदा कर रहे हैं. एक समय था जब हम लाचार भारतीय, इतने जागरूक थे कि हम अपने शत्रु पहचान लेते थे और दुश्मनों में भी इतनी इंसानियत थी कि वे भी ईमानदारी से स्वयं को शत्रु प्रदर्शित करते थे. कम से कम वो हमें सतर्क तो करते थे कि हम तुम्हारे शत्रु हैं.


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शायद इसीलिए उस दौर में देशप्रेम भावनाओं में था, ज़ुबान पर नहीं. कितना सुंदर दौर था वो. जब कवियों और लेखकों की क़लम भी क्रांति लिखती और बोलती थी. सिर्फ क्रांतिकारी ही नहीं वरन कवि व लेखक भी जेल जाते थे और जाते थे तो जनता, हुक़ूमत के ख़िलाफ़त में खड़ी हो जाती थी और उनके संघर्ष को गौरव प्राप्त होता था. जयशंकर प्रसाद जब बम बनाकर चंद्रशेखर को सौंपते होंगें, क्रांति कितनी आतुर होती होगी हमारे देश पधारने को. सबसे ज़्यादा खुशी होती है कि उस दौर में व्यापार वस्तुओं का होता था, भावनाओं और भगवान का नहीं.

आज के वर्तमान भारत की बात करें तो आप इतना ही जानिए कि आज का भारत, भारतीयों के साथ अत्यंत आक्रामक और विस्तारवादी प्रवृति को अपने रक्त में समाए हैं. पहले की तरह अब भारत के भीतर कुछ भी स्पष्ट नहीं है और जो स्पष्ट है, वो विनाशकारी है, विभाजनकारी है और दिग्भ्रमित है. जैसा की पूर्व में होता रहा है कि यदि शत्रु विदेशी है तो जनता पर उसका दमन है और जनता इस दमन के खिलाफ है, विद्रोही है. या फिर यदि सरकार निरंकुशता बरत रही है तो भी जनता बोलती थी, विरोध दर्ज कराती थी और देशी सरकारें भी विपरीत विचारधारा या प्रगतिशील आवाज़ों या विरोध की आवाज़ों को एक हद तक सुनती भी थी और दबाने का प्रयत्न भी करती थी. लेकिन राष्ट्रद्रोह जैसे बड़े तमगे देने से बचती थी.

(कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद जब प्रतिरोध की आवाज़ बनें तब भी सरकार ने ऊपर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया.)

राष्ट्रद्रोह जैसे तमगे, प्रश्न पूछने वालों या विरोध करने वालों के लिए नही था. इस शब्द की भी अपनी गरिमा थी जो अब नहीं रही, रहती तो देविंदर सिंह पर लगती. खैर छोड़िए, आज के भारत में जनता मंत्रमुग्ध (hypnotized) है, हिंदी के चंद शब्दों पर. ज़बरन बलाघात के साथ इन शब्दों का प्रयोग है. समझिए कि आज के समय में ये शब्द ही भारत का अतीत, वर्तमान व भविष्य सुनिश्चित कर रहे हैं. शब्द कुछ ऐसे हैं– राष्ट्रभक्त, गौ-माता, राम,नेहरू, पाकिस्तान, आतंकवाद आदि. सरकारी फ़ाइलों से तो जैसे– शिक्षा, स्वास्थ ,विकास,सुरक्षा,महिला,अल्पसंख्यक आदि शब्द विस्थापित हो गए हैं.


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मेरा सवाल है कि क्या किसी राष्ट्र का विकास रथ, वैमनस्य की भावना अथवा बदले की भावना के साथ पाने को फैली इस विस्तृत धरती और आकाश को पा सकेगा? क्या वह अपने नागरिकों, युवाओं का बेहतर उपयोग कर पाएगा?

इन्हीं सवालों के के बीच से एक प्रश्न चेतना को चीरता हुआ अनायास ही तीक्ष्ण चोट करता है और मस्तिष्क से कहता है- क्या तुम्हारे समय का राजा(सरकार) अपने ही लोगो के साथ छल तो नहीं कर रहा है? क्या वह किसी विनाशकारी बुद्धि का वंशज तो नहीं जो अप्रत्यक्ष रूप से अपनी पुरानी मंशा को स्थापित करने आया हो, जिसमें तुम्हारा भारत पुनः निचली मानसिकताओं का वाहक बनने वाला है. क्योंकि जब आपके तन पर वस्त्र नही होंगे तब आप शेरवानी का स्वप्न नहीं देखेंगे. लेकिन आज जब भारत का मानव-संसाधन मृत्यु के द्वार पर कतारबद्ध खड़ा है, तब तुम्हारा राजा ‘भगवान की दुकान चला रहा है’ उसे स्वास्थ्य की दुकानों की कोई चिंता नहीं है.

वो अपनी जनता को मूर्ख बनाता है, मौत और लाशों पर दिए जलवाता है, थाली पिटवाता है, पुष्प की वर्षा करवाता है लेकिन वो आवश्यक चिकित्सकीय उपकरणों की ज़िम्मेदारी से भाग खड़ा होता है. तुम्हारा राजा वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने में समर्थ नहीं है, वो प्रगतिशील नहीं है, उसे गरे मुर्दे उखाड़कर तुम्हें और तुम्हारे राष्ट्र को गर्त में ले जाने का जिम्मा दिया गया है.

तुम देखो, आज भारत में पुनः भ्रष्टाचार, षड्यंत्र और विश्वासघात का बोलबाला है. भोली जनता क्या करे उसने जिंदा रहने को ही विकास मान लिया है. मध्यम-वर्गीय जनता त्रस्त है, लाचार है और कुछ जनता इतनी मजबूत है कि मानो रावण का अहंकार हर लायी हो. लेकिन प्रश्न है कि जब हवा ज़हरीली हो जाएगी तब आप सांस लेने कहां जायेंगे? आप आज भी यदि वह समाज चाहते हैं, जहां वर्ण, जाति, धर्म व लिंग के आधार पर शोषण होता रहे; तब सच मानिये आप लाश हैं और एक रोज़ आपका भी दाह-संस्कार कर दिया जाएगा अथवा आपके मरे हुए शरीर पर थोड़ी मिट्टी डाल दी जाएगी.

ऊपर उठिये धर्म, जाति, लिंगवाद व मनुवाद से, ब्राह्मणवाद से. आज समस्या हमारे अस्तित्त्व की है, देखिये प्रकृति को. आप एक- दूसरे को बर्बाद करने व नीचा दिखाने में रह जाएंगे और प्रकृति सबको अस्तित्वहीन कर देगी. आज जलवायु परिवर्तन समस्या है, जीने के विकल्प तलाशने की ज़रूरत है. प्रकृति को बचाने की समस्या है, अपने विशाल प्राकृतिक सम्पदाओं के सुरक्षा की समस्या है. मेरी मानिये आप सब में, हम सब में, इतनी काबिलियत है कि हम प्रकृति से माफ़ी मांगकर उसके संरक्षण में आगे आएं. हम जब गूगल, यूट्यूब, व सोशल मीडिया का प्रयोग बचाने की भावना से करेंगे न की बिगाड़ने की, तब यक़ीन मानिये हम भारतीय स्वप्नों से बाहर यथार्थ में विश्वगुरु बनेंगे. क्योंकि ये धरती बुद्ध की है, अम्बेडकर की है, भगत सिंह, आजाद व विवेकानंद की धरती है, यह गांधी की धरती है.

अंत में यही कहूंगी कि कितने खाली हैं हम सभी. आइये! भरते हैं स्वयं को, करुणा से, मित्रता से, निर्माण से, आविष्कार से, साहित्य से और समाज से.

– प्रियंका प्रियदर्शिनी

(लेखिका पटना यूनिवर्सिटी की छात्रा हैं और साथ ही स्टूडेंट एक्टिविस्ट भी हैं.)

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