हॉस्पिटल भूल जाइए, ये लीजिये राम मंदिर और राफ़ेल का झुनझुना

“हम लोग तो भैया सिर्फ़ मंदिर ही बनवा सकते हैं, तुम्हें अच्छा इलाज चाहिए तो जाओ विदेश।”

बहुत जल्दी हम लोग ये बात सुनेंगे। मुझे ताज्जुब है कि अभी तक किसी ने ये बात क्यों नहीं कही? दिलीप घोष जो बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष भी हैं उन्होंने यह कहा कि हमें मंदिर संस्कृति की ज़्यादा ज़रूरत है, अस्पताल संस्कृति की नहीं। इससे यह बात साफ़ तौर पर से पता चलती है कि सरकार की मंशा अस्पताल बनवाने की नहीं बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ मंदिर के नाम पर वोट लेने की है। 2014 के बाद जब से केंद्र शासित नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है तब से लेकर अभी तक सिर्फ़ हिंदुत्व के नाम पर ही वोट मांगे जा रहे हैं। अभी तक सरकार ने कोई ऐसा काम नहीं किया जो हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने का काम करें या हिंदुस्तान की रक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने का काम करें या फिर बेरोज़गारों को रोज़गार दिलाने का काम करें या फिर कोई भी ऐसा काम करें जिससे विश्व में हमारा नाम हो।

हम लोग बात करते हैं विश्व गुरु बनने की लेकिन हमारे विश्वविद्यालयों में गुरु तक नहीं है। बिना गुरु के हम लोग विश्व गुरु बनने की बात करते हैं तो यह काफ़ी कॉमेडी ही बात लगती है सरकार कभी योग को प्रमोट करती है, कभी औषधियों को प्रमोट कर रही है, लेकिन पढ़ाई को प्रमोट नहीं करते। आयुर्वेद विद्यालयों में भी जिस तरीके से एडमिशन फ़ीस में बढ़ोतरी की गई है उससे यह साफ तौर पर पता चलता है कि आयुर्वेद में भी सरकार सिर्फ एक कंपनी को ही आगे बढ़ने देना चाहती है। उसके अलावा वह नहीं चाहती कि और नए टैलेंट सामने उभरकर सामने आए। उस कंपनी का नाम हम नहीं ले सकते हैं क्योंकि कई बार नाम लेने से भी बैन लग जाता है। वह दावा करते हैं कि उन्होंने कोरोना की शत-प्रतिशत दवा बना ली है और टीवी न्यूज़ चैनल वाले लगातार कोरोना का रामबाण इलाज नाम से कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। उसके बाद कहा जाता है कि यह कोरोना ठीक नहीं करती बल्कि सिर्फ इम्युनिटी बढ़ाती है।

सरकार की गोद में बैठी हुई मीडिया और सरकार के गोद में बैठी हुई कंपनी शायद यह भूल गई है कि हम लोग अभी कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं। आज भी भारत में 64 हज़ार से ज़्यादा केस मिले हैं, बिहार में अब तक 75 हज़ार से ज़्यादा मामले हो चुके हैं और 350 से ज़्यादा मौत हो चुकी है। लेकिन फिर भी सरकार आंख बंद करके सोई हुई है। मीडिया बस यह चीज दिखाना चाह रही है कि सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या के मामले में अभी तक क्या-क्या और मसाले मिले हैं। मीडिया वहां भी रिपोर्टिंग नहीं कर के मसालों को खोज रही है और क्यों खोजे भी नहीं हम लोग बैठकर टीवी पर खबरें नहीं बल्कि मसालों को देखना ज्यादा पसंद करते हैं। नीतीश कुमार जो बिहार के मुख्यमंत्री हैं वह बाहर आकर एक बार भी कोरोना में क्या चल रहा है? क्या व्यवस्थाएं हैं? उनके ऊपर बातचीत या प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर रहे हैं। वह एक तरफा बात ही कर रहे हैं और हमारे प्रधानमंत्री उन्हें भूमि पूजन से फुर्सत ही नहीं कि देश में क्या चल रहा है इसके तरफ़ देख सकें।

जैसे जब बच्चा परेशान होता है रोता है, तो उसका ध्यान भटकाने के लिए उसे झुनझुना दे दिया जाता है हम जनता के लिए जो झुनझुना सरकार ने हमें थमाया है वह राम मंदिर और राफ़ेल विमान ही है। अगर राफ़ेल विमान आने से हम विश्व गुरु बनेंगे तो सोच लीजिए फ्रांस जो कि राफेल विमान बनाता है और हम लोग वहीं से लेकर आ रहे हैं, वह आज के वक्त में विश्व गुरु होता, लेकिन ऐसा नहीं है।


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हमारे पास खुद के इजाद किए हुए विमान नहीं है। हम अभी भी विदेशों पर ज़्यादा निर्भर रहते हैं, हमारी जो जनता है वह रोजगार के लिए भी निर्भर है उसके लिए तो सरकार ने बोल दिया कि आप आत्मनिर्भर बनें। भले आपको अपने कॉलेज के सामने पकौड़े की दुकान क्यों ना लगानी पड़े, लेकिन आप आत्मनिर्भर बनिए।

तो बात यह है कि सरकार आत्मनिर्भर कब बनेगी सरकारी कंपनी के विज्ञापन नहीं करके हमारे प्रधानमंत्री प्राइवेट सेक्टर के विज्ञापन करना ज़्यादा पसंद करते हैं। कभी वह मोबाइल के क्षेत्र में जिओ का प्रचार करते हैं कभी पेटीएम का प्रचार करते हैं, लेकिन वह कभी भी बीएसएनएल लेने के लिए देशवासियों को प्रेरित नहीं करते। रेलवे अपने निजीकरण की ओर बढ़ चुका है। नई शिक्षा नीति में आए बदलाव के बाद यह साफ़ हो चुका है कि इसमें भी निजीकरण जल्द ही किया जाएगा। ऐसे में सारी सुविधाएं अमीरों के लिए रह जाएंगे और गरीबों के नाम आएगा सिर्फ राम मंदिर का झुनझुना।

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