विश्व लोकतंत्र दिवस: क्या भारत में लोकतंत्र एक मिथ्या है?

लोकतंत्र नागरिकों की आकांक्षाओं को पूरा करने और मानवता के विकास का एक सशक्त माध्यम है। लोकतंत्र अपनी प्रक्रिया में एक लक्ष्य है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, राष्ट्र की शक्तियों, सामाजिक संगठन और व्यक्ति की भागीदारी और सहयोग से लोकतंत्र के आदर्शों को वास्तविकता में बदला जा सकता है।


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लोकतंत्र की इसी महत्व को समझते हुए साल 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया था। पहली बार 15 सितंबर 2008 को अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया गया था। अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस से पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव में कहा गया, “देशों के लोकतंत्र के लक्षण एक समान है लेकिन लोकतंत्र का कोई एक आदर्श रूप नहीं है और लोकतंत्र किसी खास देश अथवा क्षेत्र से जुड़ा नहीं है।”

पूरी दुनिया में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों के संगठन अंतर संसदीय संघ आईपीओ महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साल 8989 में अंतर संसदीय संघ विश्व भर के सांसदों में संवाद कायम करने के लिए एक केंद्र बिंदु के रूप में काम कर रहा है। आईपीओ की सक्रियता से शांति और सहयोग कायम करने जैसे कई प्रयासों को मजबूती मिली है।

अंतर्राष्ट्रीय गणतंत्र दिवस का मुख्य उद्देश्य लोगो को उनके मूल्य अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना है और गणतंत्र दिवस के महत्तव को समझाना है।

लोकतंत्र सूचकांक में भारत की रैंक

वैश्व‍िक लोकतंत्र को एक पैमाने पर परखने के लिए ब्रिटिश संस्थान ‘द इकोनॉमिस्ट ग्रुप’ की कंपनी इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (EIU) सूचकांक निकालती है। ये 167 देशों में लोकतंत्र की स्थिति को मापने के इरादे से निकाला जाता है। जिनमें से 166 संप्रभु और इनमें से 164 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश हैं| इस सूचकांक को ही डेमोक्रेसी इंडेक्स democracy index कहा जाता है।

इकोनॉमिक इंटेलीजेंस यूनिट (ईआईयू) की ओर से जारी 2019 के democracy index में भारत 51वें स्थान पर है। इस तरह से भारत बीते साल से 10 पायदान नीचे आ गया है| 2018 में भारत के अंक 7.23 थे, जो घटकर 6.90 रह गए हैं। इससे पहले भारत 41 वें स्थान पर था जैसा कि देखा जा सकता है,  डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत की रैंक गिरकर 51 पर पहुंच गई है। मतलब देश में गणतंत्र का और लोगों की आजादी का खंडन हो रहा है। अब सत्ता की ताकत के सामने सवाल कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं।

EIU चुनाव प्रक्रिया, बहुलतावाद, नागरिक स्वतंत्रता और सरकार के कामकाज पर किसी देश को आकता है और इन तमाम मुद्दों पर भारत में पारदर्शिता के सख्त कमी है। अगर बहुलतावाद की बात करें तो आप जानते ही होंगे देश को पूरी तरह हिंदू राष्ट्र बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इसका मुख्य उदाहरण CAA में देखा जा सकता है।

अगर बात करें चुनावी प्रक्रिया की तो चुनाव आयोग भी आंशिक तौर पर काम करता है क्योंकि अगर सत्ताधारी किसी तरह से चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं तो वह पूर्ण रुप से अपनी आंखें मूंद लेता है।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैफुद्दीन सोज़ का जिक्र करते हुए भाजपा पर गंभीर आरोप लगाया है। कश्मीर के सैफुद्दीन सोज़ ने लोकतंत्र की प्रक्रियाओं को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई है। उनके साथ कैदी जैसा व्यवहार करके भाजपा सरकार लोकतंत्र को कुचल रही है। जम्मू-कश्मीर में एक साल से तानाशाही कायम है। सैफुद्दीन सोज ने दावा किया था कि उन्हें घर में नजरबंद करके रखा है। उनके घर के गेट को अंदर से भी बंद कर दिया गया है। सोज़ ने कहा कि सरकार ने 30 जुलाई को उच्चतम न्यायालय को बताया था कि मुझे रिहा कर दिया गया है लेकिन मैं स्पष्ट रूप से कह चुका हूं कि सरकार ने न्यायालय और उसके बाहर गलत बयान दिये हैं। मैं उसी दिन और उसके बाद भी झूठे बयानों का खंडन कर चुका हूं लेकिन सरकार लगातार बेवजह झूठ फैला रही है। सोज़ ने कहा कि उनके घर पर तैनात पुलिसकर्मियों ने अब मुख्य द्वार को अंदर से बंद कर दिया है।

बता दें, सोज की पत्नी ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर पति को अवैध हिरासत से रिहा करने की अपील की थी। इस पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने हलफनामा दायर कर कहा था कि सोज को न तो कभी हिरासत में लिया गया और न ही घर में नजरबंद रखा गया। उनके आने-जाने पर भी कोई पाबंदी नहीं है।

 

वही दूसरी घटना की बात करें तो एल्गर परिषद-माओवादी लिंक मामले में गिरफ्तार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज ने शुक्रवार को बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि वह पूरे एक साल से जेल में थी और पुणे पुलिस उसके खिलाफ कोई विश्वसनीय सबूत पेश करने में विफल रही थी।

भारत में मीडिया को भी सरकार के खिलाफ बोलने का अधिकार नहीं है। मीडिया किसी सरकार की विपक्ष के तौर पर काम करती है और सरकार की आलोचना करके लोगों को सच्चाई से अवगत कराती है। लेकिन मीडिया भी किसी प्रकार से स्वतंत्र नहीं और अपनी अभिव्यक्ति नहीं कर सकती। वही बात करें,  हरियाणा कुरुक्षेत्र की जहां किसान शांतिपूर्ण रूप से कृषि अवमानना का विरोध कर रहे थे। उन पर भी पुलिस ने लाठीचार्ज करी|

प्रशांत भूषण एक जाने-माने वकील हैं। उनके एक ट्वीट पर जहां पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषी करार कर दिया और उनसे माफी की अपील करें। बाद में उन्होंने ₹1 का दंड लगाकर उन्हें माफ कर दिया।

भारत में अब लोगों के मुख्य अधिकारों को भी छीना जा रहा है। उन्हें बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी नहीं रह गई है। किसी चीज का विरोध करने की आजादी नहीं रह गई है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो भारत में गणतंत्र का पूर्ण खंडन हो जाएगा और धीरे-धीरे एआईयू में भी उसकी स्थान नीचे गिरता चला जाएगा। लोगों को अपने मूल अधिकारों और गणतंत्र के बारे में सीखना चाहिए, उसे पढ़ना चाहिए और अपने आसपास के लोगों को भी उससे अवगत कराना चाहिए। उसे हर एक चीज के बारे में आवाज उठानी चाहिए जो उसे गलत लगती है

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