क्यों शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का जाना साहित्य के लिए कभी ना छंटने वाला गहरा अंधेरा है?

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी,कभी ना छंटने वाला गहरा अंधेरा 

यह साल कोरोना महामारी के साथ-साथ दुखद समाचारों से भी भरा रहा है। देश ने राजनीती और कला के क्षेत्र के कई दिग्गज लोगो को खोया और अब साल बीतते बीतते भी हमने उर्दू कवि और आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी को खो दिया। 

famous urdu writer shamsur rahman faruqi has died at the age of 85

85 वर्षीय शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की मौत उनके इलाहबाद स्थित घर में हुई। उनकी मौत की खबर सुनकर साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। बीते 23 नवंबर को ही वो कोरोना को मात देकर वापस घर लौटे थे।

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी को उर्दू आलोचना का ‘टी.एस.एलियट’ माना जाता था

Full Speech of Shamsur Rahman Farooqi - YouTube

फारूखी के साहित्य जीवन और उर्दू साहित्य में उनके योगदान के बारे में माज बिन बिलाल, जो कि जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में साहित्य पढ़ाते है उन्होंने इस बारे में विस्तार से बताया। माज कहते है उनकी यह खुशनसिबी थी कि उन्हें इसी साल जनवरी माह ने उनसे मिलने का अवसर मिला। उनके मुताबिक फ़ारूक़ी का जाना गालिब के एक पंक्ति पर सटीक बैठता है – “ऐसा कहा से लाऊं की तुझसा कहे जिसे”

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दिन में नौकरी के बाद रात को साहित्य को देते थे समय

Shamsur Rahman Urdu Poet Prayagraj Latest News And Updates: Famous Dastango Shamsur Rahman Faruqi Passed Away In Prayagraj Uttar Pradesh | साहित्यकार शम्सुर्रहमान फारूकी का 85 साल की उम्र में निधन, एक

इन्होनें अंग्रेजी साहित्य में स्नातक क़िया था। फिर पढ़ाई खत्म करने के बाद फ़ारूक़ी ने अपने करियर की शुरुआत पोस्टल सर्विस में नौकरी करते हुए की थी। उन्होंने कुछ समय के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिल्वेनिया में बच्चों को पढ़ाया लेकिन बाद में उन्होंने उर्दू साहित्य पर ही अपना सारा ध्यान केंद्रित कर लिया। 16वीं सदी में विकसित हुई उर्दू  “दास्तानगोई” यानी उर्दू में कहानी सुनाने की कला को एक बार फिर से जीवित करने के लिए भी फारूकी को जाना जाता है।  उनकी साहित्य को लेकर जुनून को इस बात से समझा जा सकता है की उन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘शबखून’ को अपने दम पर चालीस सालों तक चलाया। फ़ारूक़ी को शुरुआत से ही लिखने में दिलचस्पी थी। ‘गालिब अफसाने के हिमायत में’, ‘उर्दू का इब्तिदाई’, ‘कई चांद थे सरे आसमां’ उनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की रचना ‘कई चांद थे सरे आसमां’ हिंदुस्तानी साहित्य की दुनिया में मील का पत्थर मानी जाती

बुक रिव्‍यू: कई चांद थे सरे-आसमां - kai chand the sare aasman by shamsuruhaman faruki book review by suresh kumar - AajTak

इन के किताब ‘कई चांद थे सरे आसमां’ का इंग्लिश संस्करण 2013 में ‘मिरर ऑफ ब्यूटी’ नाम से प्रकाशित हुआ। बता दें कि इनके द्वारा रचित समालोचना ‘तनकीदी अफकार’ के लिए 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू) से सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं में शेर, ग़ैर शेर और नस्र (1973), गंजे-सोख़्ता (कविता संग्रह), सवार और दूसरे अफ़साने (फ़िक्शन) और ‘जदीदियत कल और आज’ (2007) भी शामिल हैं। उन्होंने उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर मीर तक़ी ‘मीर’ के कलाम पर आलोचना लिखी, जो ‘शेर-शोर-अंगेज़’ के नाम से तीन भागों में प्रकाशित हुई।

उर्दू साहित्य के कई विलुप्त हुए जा रहे कई कला को पुर्नजीवित क़िया

अलविदा शम्सुर्रहमान फारूकी साहब | - News in Hindi - हिंदी न्यूज़, समाचार, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ इन हिंदी

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने अपने भतीजे महमूद फारूकी के साथ मिलकर बड़ी सफलता के साथ दास्तानगोई को पुनर्जीवित किया जिससे मूल कला के पुनर्जन्म का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह उनकी सबसे उल्लेखनीय और असाधारण उपलब्धि है। फ़ारूक़ी ने दास्तान-ए-अमीर हमज़ा पर ध्यान केंद्रित किया इसके सभी संस्करणों को इकट्ठा कर शोध भी किया। कुल मिलाकर हम यह कह सकते है कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का उर्दू में योगदान असाधारण है। उन्होंने उर्दू साहित्य को अंग्रेजी साहित्य के जानकारी के जरिए नए आयाम पर पहुंचाया है।

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