मोदी सरकार ने शिक्षा बजट पर किया कटौती, आखिर कैसे पढ़ेगा इंडिया और बढ़ेगा इंडिया

मोदी सरकार ने शिक्षा बजट में कटौती की गयी

सरकारी स्तर पर स्कूलों को हमेशा से ही बेहतर बनाने के बात हर दूसरी पार्टी करती है। चुनाव से पहले हर पार्टियों के घोषणा पत्र में शिक्षा को लेकर हजारों वादे किए होते हैं। चुनाव जीतने के बाद ही पार्टी को ना उनकी कही गई बातें याद रहती है ना उनके वादे याद रहते है। साल 2014 से 15 के बीच केंद्र सरकार के स्कूल शिक्षा बजट ने 45722 करोड़ रुपए खर्च किए लेकिन अगले दो वर्ष का वास्तविक खर्च क्रमशः 41800 करोड़ रुपये और 42989 करोड़ रुपये रहा। 2014 से 15 की तुलना करें तो बीते 2 वर्षों में लगातार शिक्षा पर खर्च कम हुआ है।

शिक्षा बजट

शिक्षा बजट पर जीडीपी का सिर्फ़ 2.7% का ख़र्च

इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया कि जहां एक तरफ 2013 से 14 में जीडीपी का 3.1 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च हुआ। 2017 से 18 की बात करें तो इस वर्ष जीडीपी का मात्र 2.7 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च हुआ। केंद्र सरकार के शिक्षा पर खर्च को केंद्र सरकार के बजट के प्रतिशत के रूप में देखा जाए तो 2014 से 15 तक के वास्तविक खर्च में यह हिस्सा 4.1 प्रतिशत का था वहीं दूसरी तरफ 2018 से 19 के बीच बजट आवंटन में यह केवल 3.6 प्रतिशत तक सिमट कर रह गया।


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अध्यापकों के प्रशिक्षण और वयस्क शिक्षा में खर्च की भी कमी आई 

हम अगर अध्यापकों के प्रशिक्षण और वयस्क शिक्षा पर नजर डालें तो यहां भी खर्च में कमी सामने आई है। वर्ष 2014 से 15 में इस पर 1158 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे लेकिन अगले ही वर्ष यह खर्च 917 करोड़ रुपए तक सिमट कर रह गया जबकि उसके अगले वर्ष यह खर्च और कम हो कर 817 करोड़ पर आ गया।

मिड डे मील के खर्च में भी की गई कटौती

ग़ौरतलब हो कि मिड डे मील के लिए 2014 से 15 के बीच 10523 करोड़ रुपए तक खर्च हुआ था। यह खर्च अगले साल 9145 करोड़ रुपए पर पहुंच गया और उसके अगले साल यानी 2016 से 17 के बीच इसका खर्च 9475 तक रहा। माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय स्कीम के तहत 2017 से 18 के बजट में 320 करोड़ का प्रावधान था जिसे 2018 से 19 में कम कर मात्र 256 करोड़ रुपए पर लाकर रख दिया गया। स्कूली शिक्षा के लिए जहां एक तरफ संसाधनों को बढ़ाने की जरूरत है तो वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण प्रणाली के लिए खर्च कम कर रही है। ऐसे हालात में हम सभी यह सोचने पर अवश्य मजबूर होते हैं कि अगर शिक्षा बजट में ही कटौती की जाएगी तो कैसे पढ़ेगा इंडिया और बढ़ेगा इंडिया?

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