सखी सैयां तो बेरोज़गार हैं उसपर से महंगाई डायन खाये जात है

इस लॉकडाउन में कोरोनावायरस से ना सिर्फ़ लोगों के स्वास्थ्य पर हमला किया है बल्कि लोगों की जेबों पर भी अटैक किया है। कोविड-19 के संक्रमण और लॉकडाउन के बीच जहां एक तरफ़ आम आदमी बेरोज़गारी और महंगाई की मार झेल रहा है वहीं दूसरी तरफ सरकार दोहरे संकट से जूझ रही है। एक तरफ ख़ाली होता हुआ खज़ाना है तो दूसरी तरफ़ लॉकडाउन में प्रभावितों तक राहत पहुंचाना।


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विपदा के इस अवसर में लगभग 1 करोड़ 80 लाख लोग बेरोज़गार हो गए हैं, लेकिन लॉकडाउन में महंगाई चरम सीमा पर पहुंच गई है। आदमी कमा तो नहीं रहा है लेकिन खर्च बहुत हो रहा है।
इस महामारी के चलते पिछले 6 महीने से भारत में लाॉकडाउन है। स्कूल कॉलेज बंद चल रहे हैं। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई ना रुके इसलिए ऑनलाइन क्लासेज़ चलाई जा रही हैं, लेकिन इससे मध्यम वर्ग के लोगों को बड़ी परेशानी हुई है। अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए लैपटॉप या महंगे स्मार्टफोन खरीदने पड़े। इसके साथ ही हर महीने डाटा पैक के लिए भी अलग ख़र्च होता है। वहीं कुछ स्कूल तो ऑनलाइन क्लास के नाम पर ट्यूशन फ़ीस के अतिरिक्त भी शुल्क मांगते हैं।

सब्ज़ियों के दामों में बढ़ोतरी

कोरोना महामारी में अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना सबसे महत्वपूर्ण हो गया है। बताया जा रहा है कि अगर इम्यूनिटी सिस्टम सही होगा तो यह वायरस ज़्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा तो इम्यूनिटी बढ़ाने का प्रमुख उत्पाद सब्जी है, लेकिन आम आदमी इसमें भी चूक जा रहा है क्योंकि सब्ज़ियों के दामों में भी लगभग 50% तक बढ़ोतरी हुई है। आलू के दाम ₹20 -₹22 से बढ़कर ₹40 पहुंच गए हैं। टमाटर तीन से चार गुना महंगा हुआ है और यही हाल हरी सब्ज़ियों का भी है।

खाने-पीने की अन्य चीज़ों में भी मंहगाई

लॉकडाउन से अब तक अरहर, मसूर और चना की दाल में ₹5 से ₹10 तक की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि मूंग दाल का दाम ₹10 प्रति किलो कम हुआ है। वहीं, सरसों का तेल 25 से ₹30 किलो लीटर महंगा हुआ है।

स्वास्थ्य खर्चे में बढ़ोतरी

कई सारे डॉक्टरों ने भी ओपीडी की फ़ीस भी बढ़ा दी है। वहीं सभी कंपनियों ने 10% तक दवाओं का रेट भी बढ़ा दिया है। कोरोना के इस युग में प्राइवेट अस्पतालों के इलाज का ख़र्च भी 20% तक बढ़ दिया गया है। गाइडलाइन के अनुसार सभी मरीज़ों को कोरोना जांच और ऑपरेशन से पहले डॉक्टर और स्टाफ़ को पीपीई किट पहनना आवश्यक हो गया है। साथ ही ऑपरेशन थिएटर के सैनिटाइज़ेशन से लेकर आने सुरक्षा उपाय करने होते हैं जिसका बोझ अस्पतालों में मरीजों पर 20% अतिरिक्त खर्च बढ़ा कर डाल दिया है।
जहां नीट और जेईई एग्जाम देना बच्चों की मजबूरी हो गई है वहीं सरकार द्वारा इस मजबूरी का फ़ायदा उठाया जा रहा है। दरअसल, सरकार द्वारा चलाई जा रही स्पेशल ट्रेन पर आम ट्रेन से अतिरिक्त किराया लिया जा रहा है।

जहां महामारी के चलते कई लोग बेरोज़गार हो गए और कारोबार या निजी सेक्टर वालों का धंधा ही चौपट हो गया। वेतन में कटौती की गई। कई लोगों ने तो लोन ले रखा था, जिसकी ई.एम.आई भरना भी अब मुश्किल हो गई है। सरकार ने 3 महीने पूर्ण लॉकडाउन किया, लेकिन उसमें भी आम आदमी की मुसीबत ही बढ़ती रही क्योंकि जिन लोगों ने लोन लिया था उन लोगों के लोन पर ब्याज़ तो पढ़ ही रहा था और उनका कमाने का साधन भी चला गया था। सरकार ने कई लोगों तक राहत पहुंचाने की कोशिश की। कोरोना महामारी में सरकार द्वारा करोड़ों परिवारों को मुफ्त राशन बांटा गया और हर राशन कार्ड धारी परिवारों को सरकार द्वारा ₹1000 दिए जा रहे हैं।

लेकिन आम आदमी और मध्यमवर्ग लोगों का कमाने का साधन भी चला गया और स्कूल की फ़ीस, दवा का खर्च सब बचत के पैसों से आ रहा है। जो लोग अमीर थे, उन लोगों के लिए तो या लॉकडाउन छुट्टी और घर परिवार के साथ वाला समय बन गया, लेकिन जो मध्य वर्ग से थे, उन्होंने इस महामारी के चलते अपना सर्वस्व खो दिया और महंगाई की मार से जमा पैसो से अपना घर चला रहे हैं।

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