सीएए के दौरान नाबालिगों की गिरफ़्तारी पर यूपी सरकार से हाईकोर्ट ने जवाब मांगा

इलाहाबाद HC ने सरकार से जवाब मांगा

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार को राज्य में नागरिकता विरोधी अधिनियम के विरोध के दौरान अवैध रूप से हिरासत में रखने और किशोरियों की यातना से संबंधित एक याचिका पर नोटिस जारी किया। पिछले साल दिसंबर में सीएए और एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान बता दें कि यूपी के कई जिलों में हिंसा हुई थी। इसके बाद कई लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था।

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हम आपको बता देते हैं कि मामले में याचिका एचएक्यू-सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स द्वारा तैयार की गई। जिसमें आरोप लगाया गया था कि यूपी में कई नाबालिगों को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और साथ ही प्रताड़ित भी किया गया जो कि खासकर  मुजफ्फरनगर, बिजनौर, संभल और लखनऊ ज़िले में हुआ।इस याचिकाकर्ता एनजीओ का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, सौतिक बनर्जी और तन्मय साध ने किया।

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साथ ही बता दें  कि मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने राज्य को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 के प्रावधानों के आवेदन के संबंध में राज्य के प्रत्येक जिले से संबंधित सभी विवरणों को दाखिल करने के लिए भी कहा है। खंडपीठ एक गैर सरकारी संगठन यानी एचएक्यू सेंटर फॉर चाइल्ड राइट द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जिस रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया गया था कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की प्रक्रिया में कई नाबालिग थे। उत्तर प्रदेश राज्य में पुलिस द्वारा उन्हें हिरासत में लिया गया और उन्हें प्रताड़ित किया गया।


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उतर प्रदेश सरकार से मांगा गया जवाब

यूपी पुलिस द्वारा एंटी-कैओस प्रोटेस्टेंस, टॉर्चर एंड क्रिमिनलाइजेशन ऑफ माइनर्स को सीएए विरोध प्रदर्शन शीर्षक से रिपोर्ट 31 जनवरी 2020 को पहली बार प्रकाशित किया गया था। बार और बेंच ने आगे बताया कि  रिपोर्टों के ज़रिए  पता चलता है कि नाबालिगों का दुरुपयोग मुख्यत दो प्राथमिक जिलों मुजफ्फरनगर (14 नाबालिगों) और बिजनौर (22 नाबालिगों) में फैला हुआ है। दोनों में मुस्लिम आबादी 40 से अधिक है एवं जहां राष्ट्रीय अल्पसंख्यक संस्थानों  ज्यादा है और देश भर के बच्चे भी पढ़ रहे हैं।

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बता देते हैं कि एनजीओ याचिकाकर्ता द्वारा प्रार्थना भी की गई थी कि प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट और किशोर न्याय बोर्ड के सदस्य को यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई बच्चा वयस्क जेलों में कैद नहीं है इसके लिए साप्ताहिक या नियमित जेल यात्रा करने का निर्देश दिया गया है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से टिप्पणी किया कि शायद जेजे अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए एक समिति गठित करने की आवश्यकता है और इसके साथ हम जानकारी के मुताबिक़ यह मामला 14 दिसंबर 2020 तक उठाया जाना तय है।

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