आखिर किन लोगों के सड़क पर निकलने से सरकार को डर लगता है?

जनतंत्र का मतलब सड़क और संसद के बीच एक जिंदा रिश्ता है ऐसा माना जाता है कि जनतंत्र का वह स्वरूप सबसे अच्छा है जो संसदीय पद्धति से चलता है। उसका कारण जनता अपने बारे में निर्णय करती है लेकिन अपने बारे में यह निर्णय वह एक सुचिंतित प्रक्रिया के माध्यम से करती है। जनता नियमित चुनावों के जरिए अपने प्रतिनिधियों को विधायिका मेंं भेजती है जो हर विषय पर विचार विमर्श करते हैं और वे उन कानूनों का निर्माण करते हैं जिससे सामूहिक राष्ट्रीय जीवन चलता है।

यह आवश्यक है इस कारण से कि इसमें काफी प्रलोभन है कि सारी जनता इकठ्ठा होकर सारे फैसले कर ले मगर सारे मसले इतने सरल नहीं होते हैं और जनता को हर समय हर विषय के हर पक्ष की पूरी जानकारी नहीं होती है। इसलिए फैसले में समय लगता है और इसकी प्रक्रिया होती है।

सड़क संसद

संसद में भी जब किसी प्रस्ताव को लाया जाता है तब सिर्फ पक्ष और विपक्ष में मतदान नहीं होता है क्योंकि अगर वह होता तो सत्ता पक्ष के पास हमेशा बहुमत होगा और वो अपना पक्ष स्वीकार करा लेगा। इसलिए संसदीय समितियां और प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। यानी जो विधेयक होते हैं उनपर सदन में सिर्फ मतदान नहीं होता।

लंबी विचार की प्रक्रिया के दौरान विशेषज्ञों से राय ली जाती है, सलाह-मशवरा होता है समाज से राय ले जाती है और फिर कानून बनते हैं। लेकिन सरकारों में एक प्रवृत्ति होती है कि वह संख्या के बल पर अपनी बात को लाद देती है विशेष कर निरंकुशतावादी सरकार जो संसद की प्रतीक्षा भी नहीं करती है और अध्यादेश ले आती है।

जब संसद का सत्र न चल रहा हो और कोई बहुत ज़रूरी मसला आ खड़ा हुआ हो तो अध्यादेश का रास्ता लिया जा सकता है लेकिन फिर उस अध्यादेश को संसद की स्वीकृति लेनी ही होती है।

जैसे इस सरकार ने भूमि अधिग्रहण के समय किया और यह ऐसा कोई जरूरी कार्य नहीं था कि तुरंत करना पड़े। इसलिए जब एक निरंकुशतावादी प्रवृति वाली सरकार हो तब संख्याबल के डंडे से सारी प्रक्रियाओं को ध्वस्त करते हुए कुछ भी हासिल किया जा सकता है। जैसा हम कृषि कानूनों के समय देख सकते हैं जहां पहले अधिनियम लाए गए और फिर सत्र बुलाया गया।

सड़क संसद

जैसे संसद का सत्र कोरोना वायरस की तीव्रता के बीच हुआ, जहां कहा गया इस सेलेक्ट कमेटी में भेजा जाए। इसके बावजूद ध्वनि मत से इसे पारित कर दिया गया और राष्ट्रपति द्वारा इसे मुहर लगाकर कानून बना दिया गया। तब जनता का विरोध आरंभ हुआ यह विरोध कृषि संबंधी अध्यादेश लागू होने के समय से ही चल रहा था।

इन कानूनों के बनने से पहले ही इनसे प्रभावित होने वाले यानी जो न सिर्फ किसान थे बल्कि मंडी व्यवस्ता से जुड़े लोग, नागरिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए जिन्हें अनाज मिलता है, वे लोग भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि इस तरीके से पूरी कृषि व्यवस्था को ध्वस्त करना उचित नहीं है और सबको बिचैलिया कह कर बदनाम नहीं किया जा सकता है।

पहले बात आवेदन के जरिए थी मगर जब सरकार नहीं सुने तब सड़क ही संसद को जिंदा रखती है और तब छोटे छोटे प्रदर्शन शुरु हुए फिर भी सरकार ने जब कोई जवाब नहीं दिया तब किसानों ने कहा कि वे दिल्ली आएंगे। संख्याबल के जरिए जब मुद्दों को पैरालाइज कर दिया जाता है, तब सड़के विपक्ष का काम करती है यानी मुद्दों को बल देती है।

इस बात को हमनें किसान आन्दोलन के समय देखा और उससे पहले भी जब संसद ने नागरिकता कानून पहले पारित किया, तब लोगों ने विरोध जताया। इसका 2016-17 से विरोध हो रहा था। सड़कों को नहीं सुना गया तब और जब जनता ने विरोध जाहिर किया तब सरकार ने इसका दमन कर दिया।

सड़क संसद

जब जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों के प्रदर्शन पर जब पुलिस की हिंसा हुई तब उसे लेकर लोग सर्वोच्च न्यायालय तक अर्जी ले गए उस वक्त न्यायालय ने कहा सड़क पर रहने वालों को न्याय नहीं मिलेगा। इसका अब आप क्या अर्थ समझेंगे यहीं कि सड़क पर  रहना अपराध है अर्थात् अब क्या जनता अपना असंतोष भी व्यक्त नहीं कर सकती है सर्वोच्च न्यायलय नेे इशारा किया कि सड़क पर रहना अपराध होगा। मतलब अगर आपने चुनाव में अपना मत दे दिया तो जब संसद बैठेगी तब आपका प्रतिनिधि इसे देखेगा आपको चुप रहना होगा।

इसका मतलब फिर यहीं निकलता है कि चूंकि यह संसदीय जनतंत्र है, जनता को सड़क में निकलने की आवश्यकता नहीं है और जनता अपना काम करें इनमें न उलझे। लेकिन जनतंत्र के इतिहास में अगर जनता न निगरानी रखे तो इसका अर्थ निकलता है जनता के मत का अपहरण जनतंत्र का अपहरण इसलिए तो जनतंत्र यानी जनता की स्वंतत्रता हमेशा होनी चाहिए और जनतंत्र की जिम्मेदारी यह है कि निरन्तर सत्ता पर निगाह रखी जाए जनता को हमेशा अपनी आवाज सरकार को सुनाते रहना है।

जो सड़क पर ही हो सकता है। कोई भी आन्दोलन कर सकता है मजदूर हो या बैंककर्मी, कोई भी व्यक्ति अपना मत रख सकता है। आंदोलन बड़े या छोटे दोनों पैमाने पर हो सकता है। पूरी दुनियां में सड़क ही जनतंत्र को जिन्दा रखती है। अब उदाहरण के लिए ही देखें,सूडान में जनता आंदोलन, बेलारूस में जन आन्दोलन,हांगकांग में आन्दोलनए या रूस में सत्ता विरोधी आंदोलन या दुनियां में किसी भी देश में सड़क ही आवाज उठाने का मूल मंच है।

सड़क संसद

जैसे अमेरिका में जब अश्वेत इंसान के गले को जूतों के तले कुचला गया तब अमेरिका में भी लोगों ने सड़कों में प्रदर्शन किया तब अगर सड़क पर निकलने से रोका जाए तो यह समझना आसान है कि यह जनता को पालतू प्रजा बनाने की चेष्टा है। ये सरकार की रजवाड़े वाली सामाजिक दिमाग को वापस लाने की कोशिश है, जहां राजा ही हर निर्णय ले प्रजा के बारे में।

लेकिन जनतंत्र में राजा की मर्जी नहीं चलती अगर राज जनमत का उल्लंघन करे कोई तो जनमत को अधिकार है कि वो इसको पाबंद करे।तानाशाही रवैया देख जनतंत्र में आंदोलन तो होगा ही आंदोलनों को ही अपराध ठहरा देने की कोशिश साफ बताती है कि यह जनता को प्रजा में बदलने की कोशिश है क्योंकि जनतंत्र तो इसी तरह जीवित रहता है। इसलिए यह कहना मुश्किल नहीं कि यह जनता से प्रजा बनाने की चेष्टा है। हमनें प्रजा से जन तक की यात्रा की है हमें वापस प्रजा की ओर वापस ले जाने का अधिकार किसी के पास नहीं है।


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वहीं कुछ लोग तमाशबीन भी होते हैं, जो जनता को विभाजित यानी जो जन को विभाजित करने की कोशिशें करते हैं। जैसे भारतवर्ष में सरकार हिंदू तबके को यह विश्वास दिलाने की कोशिश में कहती है कि यह सरकार हिंदुओं की है और इसका विरोध करने वाला जनतांत्रिक नहीं है,वो विप्लवी हैं,संसदीय सर्वोच्चता में विश्वास नहीं करते हैं,उपद्रवी हैं और उन्हें हटाने का काम सरकार का है और सरकार जनता के उस हिस्से को मदद के लिए कहती है जो सड़क पर नहीं है। इस प्रकार से जनता को विभाजित किया जा सकता है और जो लोग सड़क पर हैं उनका यह सरकार अपनी जनता के सहारे दमन कर सकतीं हैं। इसलिए जनता को इस विभाजन से अवश्य ही सावधान किया जाना चाहिए।

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