तरुण गोगोई की 85 साल की उम्र में “सामयिक” मृत्यु पर दुखी होना चाहिए या खुशी मनानी चाहिए?

15 साल तक मुख्यमंत्री पद भोगने वाले तरुण गोगोई जी

यह जितने कांग्रेसी इस समय फेसबुक पर शोक संदेश डाल रहे हैं दरअसल यह सारे घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। इनमें से ज्यादातर तरुण गोगोई को ना जानते हैं और ना उनको पहचानते हैं।

नगर पालिका से पारी शुरू करने वाले गोगोई 3 बार बने असम के CM, ऐसा रहा राजनीतिक सफर | tarun gogoi died assam former cm congress veteran political carrier

बता दें तरुण गोगोई ने अकेले अपने दम पर कांग्रेस को पूरे नॉर्थ ईस्ट में खत्म कर दिया। जी हाँ आप ठीक पढ़ रहे हैं खत्म कर दिया। ऐसे निकम्मे और पुत्र मोह में धृतराष्ट्र बने मुख्यमंत्री ही कारण हैं कि कांग्रेस आज रसातल में है।

असम कांग्रेस के 2011 के बाद असली नेता थे हिमंता बिस्वा शर्मा। उन्होंने ही कांग्रेस की 2011 की जीत में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। पर हमेशा की तरह कांग्रेस के हाई कमान ने सबसे कर्मठ और पकड़ वाले नेता को छोड़कर गोगोई को तीसरी बार मुख्यमंत्री बना दिया।

गोगोई किडनी की बीमारी से ग्रस्त थे

गोगोई किडनी की बीमारी से ग्रस्त थे और ज़्यादातर समय दिल्ली के अस्पतालों में या अपने किले जैसे घर में बिताते थे। जनता से कोई मतलब ही नहीं था। उनको मुख्यमंत्री बनाने के बाद भी हिमंता बिस्वा शर्मा मान गए और बोले कि एक-दो साल इन्हें रहने दीजिए फिर मुझे मुख्यमंत्री बना देना।

पर तरुण गोगोई ने इसी बीच अपने बेटे गौरव गोगोई को तैयार करना शुरू कर दिया। यह बात हिमंता शर्मा को बर्दाश्त नहीं हुई कि सारी मेहनत तो मैं करूं, पैसा मैं खर्च करूं और मुख्यमंत्री तरुण गोगोई बने और उसके बाद अपने बेटे को तैयार कर दे। तो फाइनली हिमंता कांग्रेस छोड़ गए और कांग्रेस 2016 में बुरी तरह चुनाव हारी।

उसके बाद बीजेपी ने हिमंता को पूरे नॉर्थ ईस्ट का इंचार्ज बना कर कांग्रेस का सफाया कर दिया। मुझे समझ नहीं आता कि इतना क्या कुर्सी का लालच? 10 साल मुख्यमंत्री रह लिए उसके बाद भी मुख्यमंत्री बनना है और अपने बाद अपने बेटे को ही बनाना है।


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यही काम राजस्थान में अशोक गहलोत कर रहे हैं। उन्होंने सचिन पायलट का वैसे ही पत्ता काटा जैसे असम में गोगोई ने हिमंता शर्मा का काटा। 2011 में आसाम में चुनाव होने वाले थे और असम गण परिषद और भाजपा की कड़ी चुनौती थी।

दूसरी तरफ बदरुद्दीन अजमल की पार्टी मुसलमानों के वोट काट रही थी। ऐसे समय में किसी और पार्टी का मुख्यमंत्री होता तो पूरे जोर-शोर से प्रचार में लगा होता। पर तरुण गोगोई तो अपने किले से बाहर निकलने का कष्ट भी नहीं करते थे। जो लोग गुवाहाटी में रहते हैं उन्हें पता होगा कि असम के मुख्यमंत्री एक ऊंची पहाड़ी पर एक किले जैसे घर में रहते थे।

एक किस्सा है- 2011 चुनाव के आखिरी में सोनिया गांधी की गुवाहाटी में रैली थी। रैली के इंतजाम के लिए तत्कालीन कांग्रेश महासचिव और असम के इंचार्ज दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मीटिंग बुलाई। मीटिंग में गुवाहाटी के विधायक और तब के कांग्रेस पीसीसी अध्यक्ष भुवनेश्वर कलिता भी थे।

अब कलिता साहब बीजेपी ज्वाइन कर गए हैं। मीटिंग में गुवाहाटी से सटे हुए जलुकबाड़ी के विधायक हिमंता शर्मा भी थे। मीटिंग में ग्राउंड का निर्णय होना था और कौन-कौन विधायक कितनी भीड़ रैली के लिए ला सकता था इसका फैसला होना था। गोगोई साहब ने मीटिंग में आने से ऐन मौके पर मना कर दिया।

दिग्विजय जी ने एक-एक करके विधायकों से पूछा कि कितनी भीड़ ला सकते हो। सब नेता हांकने लग गए। कोई बोला 50 हज़ार कोई एक लाख। दिग्विजय सिंह ने आखिरी में हिमंता शर्मा से पूछा कि कितने लोग आ सकते हैं।

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शर्मा बोले कुल मिला कर दस हज़ार। दस हजार सुन कर दिग्विजय सिंह चौंक गए और बोले यह तो बहुत कम है आप तो सबसे ज्यादा रसूख वाले हैं और इतना कम। तो शर्मा ने कहा कि अभी गुवाहाटी में 10,000 से ऊपर भीड़ नहीं हो सकती और यह सारे विधायक झूठ बोल रहे हैं।

और इनके आदमियों को लाने के लिए बसें भी मैं ही दे रहा हूँ। यह 5 लोग मिलकर 5000 लाएंगे और मैं अकेला 5000 लाऊंगा। मीटिंग में एक भी विधायक की हिम्मत नहीं पड़ी कि चूं भी कर जाए। ग्राउंड भी शर्मा ने ही बताया और कहा कि वह ग्राउंड 10000 में आधा भर जाएगा और बाकी आधे को मैं मंच और टेंट लगाकर कवर करवा दूंगा।

और बाद में वही हुआ। सारी बसें हिमंता शर्मा लाए और करीब 10000 की भीड़ इकट्ठा हुई। रैली सफल हुई। गोगोई जी रैली शुरू होने से पहले सीधा मंच पर आए और रैली खत्म होने के बाद वापस अपने किले जैसे घर में। ऐसे हिमंता जैसे नेता कांग्रेस से बाहर और कांग्रेस सत्ता से बाहर।

-Chetan Dutta

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