बचना ऐ हसीनों- ऋषि कपूर को हमारा सलाम

– राजीव रंजन

मेरे प्यारे मुस्लिम दोस्तों (लिखना तो मुझे चाहिए ‘मेरे प्यारे दोस्तों’ क्योंकि दोस्ती का कोई जाति और मज़हब नहीं होता, लेकिन क्या कीजिएगा जमाना ही जहर से भरा हुआ है तो मैं दोस्त की जगह मुस्लिम दोस्त बड़ी बेशर्मी से लिख रहा हूँ।) कल जिस तरह हमारे प्रिय अभिनेता इरफान खान के जाने से पूरा देश गमज़दा था वह अपने प्रिय कलाकार से देश वासियों के लगाव के साथ हमारी एकता का भी संदेश दे गया। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि इस पूरे परिघटना का ठीक से अध्ययन कर उसपर अमल किया जाए तो इससे अभी के माहौल से उबरने और आपस में शांति और भाईचारा स्थापित करने का एक रास्ता निकलेगा। मैं इस ग़म के माहौल में भी खुश था कि चलो कोई तो ऐसा मौका आया जब लोग हिन्दू-मुसलमान से अलग होकर इंसान बनकर सोच रहे हैं। हम सबको भी अपनी-अपनी बुराईयों का त्यागकर इरफान बनने का प्रयास करना चाहिए। ताकि हम जिस दिन इस दुनिया से फ़ना हो रहे हों तो लोग हमें किसी राजपूत, ब्राह्मण, बनिया, यादव, कोईरी, दुसाध, निषाद, हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, यहूदी के बजाए एक इंसान के रूप में याद करते हुए आह भरे। अभी इरफान के जाने के हम सबके आँसू सूखे भी नहीं हैं कि आज ऋषि कपूर भी गुजर गए। मैं जानता हूँ कि कलाकारों में कोई तुलना करना एक प्रकार से दो कलाकारों में से किसी एक के कला के प्रति उनके योगदानों की तौहीन होगी। लेकिन कलाकारों की लोकप्रियता में समय का बहुत बड़ा योगदान होता है। अब देवानंद साहब की पॉपुलैरिटी का अंदाजा 2020 से देखने पर नहीं न लगेगा? राजेश खन्ना की जो तूती अस्सी के दशक में बोलती थी वही लाइमलाइट 2012 में उनके साथ नहीं न था? यह एक सच्चाई है और इससे हर कलाकार भलीभाँति परिचित रहते हैं। जिस सुनील शेट्टी की फ़िल्म को देखने के लिए अपने बचपन में क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी अपने पड़ोसी के यहाँ टेलीविजन देखने चले जाते होंगे वही सुनील शेट्टी 2011 क्रिकेट विश्वकप के दौरान मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में महेंद्र सिंह धोनी को देखकर धोनी-धोनी करते हुए बातचीत या चीयर-अप करने का प्रयास करते हैं तो धोनी सुनील शेट्टी को कोई भाव नहीं देते हैं। हो सकता है महेंद्र सिंह धोनी की अपनी व्यस्तता हो। उस वक्त वे भारतीय क्रिकेट टीम सबसे महत्वपूर्ण पर्सनैलिटी थे तो उनके पास समय का अभाव होगा ही होगा। लेकिन मेरे कहने का लब्बोलुआब यह है कि समय की अपनी कीमत होती है। नब्बे का दशक सुनील शेट्टी का था तो 2011 महेंद्र सिंह धोनी का। बेशक ऋषि कपूर एक उम्दा कलाकार थे। उनकी चॉकलेट जैसी इमेज की आज भी कई लड़कियाँ दिवानी रहती हैं। अपने स्कूल टाइम में मैं अपने कई फीमेल दोस्तों को किसी गोलमटोल हैंडसम से दिखने वाले लड़के को देखकर ‘ऋषि लग रहा है वह तो’ कहते सुना हूँ। बॉबी, चाँदनी, हिना, दीवाना जैसी फिल्मों में ऋषि कपूर के इंटेंस किरदार पर मैं सम्मोहित हो जाता हूँ। शाहरुख खान यदि किंग ऑफ रोमांस हैं तो ऋषि कपूर को प्रिंस ऑफ रोमांस कहना गलत नहीं होगा। लेकिन इरफान खान और ऋषि कपूर को देखें तो यहाँ दो अलग-अलग तरह के निष्कर्ष निकलते हैं। इरफान खान हमारी आज की पीढ़ी के हीरो हैं तो ऋषि कपूर हमारे बाप की पीढ़ी के। हमारी पिछली पीढ़ी में आर्ट की जगह रोमांस को ज्यादा जगह दिया जाता था। दो लड़के-लड़कियों के प्रेम को ही देखे तो हमसे दस साल पीछे की पीढ़ी के प्रेमी युगलों में जो प्रेम और रिश्ते में गर्माहट, परस्पर विस्वास और एक दूसरे के लिए कुछ भी कर गुजरने का जुनून जो उनमें था वह हममें नहीं है। आज के लड़के(पोस्ट ग्लोबलाइजेशन) मोबाइल, इंटरनेट, रियलिटी शो और यातायात के साधन सुगम होने के कारण कला की बारीकियों से ज्यादा वाकिफ हो रहे हैं।

थियेटर को लेकर आज की पीढ़ी में गज़ब का पैशन देखने को मिलता है। और इरफान खान इन सब चीजों के प्रतिनिधि कलाकार हैं। आज की पीढियां शादि-विवाह के मामले में जात-धर्म(मैं खुद अपना विवाह अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक करना पसंद करूँगा।) के पचड़े में कम पड़ते हैं तो सुतपा सिकदर से इरफ़ान खान के प्रेम और अंतर्धार्मिक विवाह भी इरफान को रोल मॉडल मानने की बड़ी वजह है। देखा जाए तो ऋषि कपूर की मृत्यु 68 वर्ष की उम्र में हुई तो इरफान की 53 वर्ष में। ऋषि कपूर की बेटी का विवाह हो गया है और उनके बेटे रणवीर कपूर भी अपने पैर पर खड़े हैं वही इरफान के दोनों बेटे छोटे-छोटे हैं। कपूर खानदान की लिगेसी की वजह से नीतू जी और रणवीर कपूर को सुतपा और इरफान के दोनों बच्चों की तुलना में आज से एक महीने बाद सोशल और इकोनॉमिक सिक्योरिटी भी ज्यादा मिलेगी। 68 वर्ष के जीवन को भरपूर नहीं तो कम भी नहीं कहा जाएगा। मैं खुद इरफान के जाने से जितना बेचैनी, खालीपन दुःखी हुआ उसकी तुलना में ऋषि कपूर के जाने से नहीं। शायद इरफान की भी अकाल मृत्यु की जगह स्वाभाविक मृत्यु हुई होती तो मैं उतना दुःखी नहीं होता। ऊपर मैंने जिस बात के लिए खुशी का जिक्र किया है मेरे लिए वही एक दुःख के आशंका का भी विषय है और मेरे यह सब लिखने की वजह भी। जिस चीज ने मुझे उम्मीद जगाया आज उसी के इर्दगिर्द मेरी उम्मीद डगमगाने भी लगी। वह है धर्म का एंगल और इसी बाबत मैं अपने मुस्लिम दोस्तों से अपील भी कर रहा हूँ। हमारे आपके बीच के ही कुछ ऐसे उपद्रवी तत्व होंगे जो इंची टेप लेकर बैठे होंगे। वे थोड़ी देर में आकर कहने लगेंगे देख लिया हिंदुओं ने इरफान खान के लिए जितना दुख व्यक्त क्या उतने मुसलमान ऋषि कपूर के जाने से दुखी हुए, देख लो इनकी सच्चाई। जबकि इरफान और ऋषि कपूर को चाहने न चाहने में मजहब का दूर-दूर का वास्ता नहीं है। अगर लोगों ने इरफान की तुलना में ऋषि को कम याद भी किया तो उसकी दूसरी वजह हो सकती है धर्म तो बिल्कुल भी नहीं। कुछ तर्क मैंने ऊपर में दिए भी हैं। लेकिन भक्त तो भक्त होते हैं भक्त होने की पहली शर्त ही है कि दक्षिणा में आपका दिमाग लिया जाएगा। वे तर्क वितर्क किए बिना फेसबुक से लेकर ट्विटर तक कुरुक्षेत्र बनाकर हिन्दू-मुसलमान का बैटल करने लगेंगे। आईटी सेल इसकी सामग्री बनाने में जुट भी गया होगा या हो सकता है आईटी सेल का जहर मार्किट में मेरे लिखने तक फैल भी चुका होगा। इसीलिए मेरे प्यारे मुसलमान दोस्तों मैं कहना क्या चाहता हूँ वह आप समझ ही गए होंगे। इसीलिए किसी को उँगली उठाने का मौका नहीं देना है।

ईश्वर सुतपा जी और उनके दोनों बच्चे एवं नीतू जी तथा रणवीर कपूर के सपरिवार को इस दुःख की घड़ी से उबरने की शक्ति दे। दिवंगत आत्माओं के प्रति मेरी श्रद्धांजलि। मुझसे कोई गलती हुई हो तो आपलोग माफ कीजिएगा।

आपका
राजीव प्रताप सिंह जादौन

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