बिहार स्वास्थ्य विभाग की सच्चाई दिखी ठेले पर, एम्बुलेंस के अभाव में हुई महिला की मौत

मृतका सीता देवी मूल रूप से मुंगेर के असरगंज इलाके की रहने वाली थीं. मामले को सिविल सर्जन डा. विजय सिंह ने गंभीरता से लिया है और जांच कराने की बात कही है.

बिहार के स्वास्थ्य विभाग की सच्चाई ठेले पर दिखी. भागलपुर में यह दृश्य उस समय देखने को मिला जब नाथनगर से एक बीमार महिला ठेल से पहले निजी अस्पताल और फिर सदर अस्पताल इलाज कराने के लिए पहुंचीं. महिला मरीज को पेट और शरीर में दर्द को लेकर परेशान थी. सदर अस्पताल में घंटों इंतजार करने के बाद उन्‍हें रेफर कर दिया गया, लेकिन अस्‍पताल परिसर में एंबुलेंस होने के बावजूद भी महिला मरीज़ को इसकी सुविधा नहीं दी गई. उन्हें यह बताया गया कि कोई ड्राइवर ही नहीं है इसलिए सुविधा नही दी जा सकती है. परिजन इंतजार करते रहे, लेकिन मौत के बाद भी महिला को एंबुलेंस नहीं मिली तो परिजन व्यवस्था का दंश झेलते रोते हुए ठेले पर ही शव को गांव ले जाने को मजबूर हुए.

सुभाष यादव जो कि मुंगेर शक्ति स्थल के समीप रहने वाले है, बताते है कि उनकी पत्नी सीता देवी की मौत सदर अस्पताल में हो गयी थी. सीता पिछले सात दिन से नाथनगर भराडिया में अपनी बहन के यहां रह कर इलाज करा रही थी. रविवार को जब उसकी तबीयत बिगड़ी तो परिजन इसे लेकर ठेले से सबसे पहले एक निजी क्लिनिक गये. वहां घंटों इंतज़ार करने के बाद जब सीता की तबियत ज़्यादा बिगड़ने लगी तो इस अस्पताल में फीस वापस कर दिया और फिर वहां से उसे दूसरे अस्पताल, सदर अस्पताल ले जाया गया जहां इमरजेंसी में तैनात डॉ. अभिनंदन ने सीता जिसके बाद उन्होंने अपने सीनियर सर्जन को बुलाया, जिन्होंने जांच करने के बाद ही सीता को मृत घोषित कर दिया.

डॉ. अभिनंदन ने यह बताया है कि सीता को जब अस्पताल लाया गया तो उसकी हालत काफी गंभीर थी, साथ साल पहले इसको पीएमसीएच में दिखाया गया था. सीता को आयरन के साथ साथ एक दर्द की गोली दी गयी थी, जब जांच रिपोर्ट मांगी गई तो वह भी नही मिली, जिस कारण सीता कौन कौन सी बीमारियों से पीड़ित थी यह पता नही चल पाया. सीता के घर वालों ने बताया कि जब वे सदर अस्पताल पहुंचे तो आधे घण्टे तक तो वह डॉक्टरों को ढूंढते रहे. मौत के बाद डॉक्टरों ने कह दिया कि लाश को ले जाने के लिए एम्बुलेंस ले लो, लेकिन फिर सूचना दी कि ड्राइवर उपलब्ध नही है. अंतः स्थिति को देखते हुए उन्होंने शव को ठेले पर ही ले जाने का निर्णय किया, क्योंकि कोई भी ऑटो चालक भी शव ले जाने को तैयार नही था और जो भी मानता वह भारी राशि की मांग करता.

स्वास्थ्य विभाग की यह नज़रन्दाज़गी को क्या कहा जा सकता है, की अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध ही नही है, ड्राइवर तक मौजूद नही है, लोगों की जांच करने के लिए भी डॉक्टर मौजूद नही है. इतनी बड़ी लापरवाही के बाद कोई न कोई कदम तो उठाना चाहिए. डॉक्टर की कमी से अगर किसी मरीज को इमरजेंसी में कुछ हो जाये तो उसकी ज़िमेदारी को लेगा? और इसका जवाब कौन देगा?

-अनुकृति प्रिया

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