क्या जम्मू-कश्मीर की मीडिया सच में आज़ाद है?

भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) ने जम्मू कश्मीर की नई मीडिया नीति पर मंगलवार को वहां की सरकार से जवाब मांगा और कहा कि इसके प्रावधान प्रेस के स्वतंत्र कार्यों को प्रभावित करने वाले हैं. केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने इस महीने की शुरुआत में ‘मीडिया नीति- 2020’ को मंजूरी दी थी, इस नीति में उल्लेखित ‘‘फर्जी सूचना’’ के प्रावधानों का पीसीआई ने स्वत: अनुभूति लिया है क्योंकि यह मुद्दा प्रेस के स्वतंत्र कार्यों को प्रभावित करता है.

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 खत्म करने के बाद मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के केंद्र और प्रदेश सरकार के फैसले का प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी समर्थन किया है. इसी संदर्भ में पीसीआई (PCI) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है. यह याचिका अनुराधा भसीन, कश्मीर टाइम्स की एक कार्यकारी संपादक द्वारा दायर की गई याचिका के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पत्रकारों को उनका काम नहीं करने दिया जा रहा है, और काम करना उनका अधिकार है.

यह याचिका एडवोकेट अंशुमान अशोक की तरफ से शुक्रवार को दायर की गई जिसमें पीसीआई ने मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों को सही ठहराया और यह कहा कि सुरक्षा चिंताओं को मद्देनज़र रख कर मीडिया पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. पीसीआई ने कहा कि हालांकि अनुराधा भसीन के द्वारा दायर की गई याचिका में एक तरफ स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए पत्रकारों और मीडिया के अधिकारों पर चिंता जताई गई है, तो वहीं दूसरी ओर अखंडता और संप्रभुता का राष्ट्रीय हित है.

ऐसे में काउंसिल का मानना यह है कि उसे शीर्ष अदालत के समक्ष अपना नज़रिया सामने रखना चाहिए. इसपर पीसीआई ने कहा कि अनुराधा भसीन की दायर की गई याचिका में संसद द्वारा संविधान के सबसे विवादास्पद प्रावधान को निरस्त करने का कोई उल्लेख नहीं किया गया है, जिस वजह से इसके चलते मीडिया पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं.

दो जून को जारी इस नई मीडिया पॉलिसी के तहत यह कहा गया था कि प्रशासन फेक न्यूज के लिए ज़िम्मेदार पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई करेगी, जिसमें सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाना और इनसे जुड़ी सूचनाएं सुरक्षा एजेंसियों के साथ साझा करना शामिल है ताकि आगे की कार्रवाई हो सके. इस नई मीडिया नीतियों के तहत सरकारी विज्ञापनों के लिए सूचीबद्ध करने से पहले समाचार पत्रों के प्रकाशकों, संपादकों और प्रमुख कर्मचारियों की पृष्ठभूमि की जांच करना अनिवार्य कर दी गई है.

इतना ही नहीं, इसके अलावा किसी भी पत्रकार को मान्यता दिए जाने से पहले जम्मू कश्मीर पुलिस की सीआईडी द्वारा उसका सिक्योरिटी क्लीयरेंस ज़रूरी होगा. अभी तक राज्य में इस तरह का क्लीयरेंस केवल अख़बारों के आरएनआई (RNI) के रजिस्ट्रेशन से पहले किया जाता था.

इस नई नीति से अंतर्गत ‘सरकार समाचार पत्रों और अन्य मीडिया चैनलों में प्रकाशित होने वाली कोई भी सामग्री उसकी निगरानी करेगी और यह तय करना सरकार का ही काम होगा कि कौन-सी ख़बर फेक, एंटी सोशल है या एंटी-नेशनल रिपोर्टिंग है. ऐसे कामों में शामिल पाए जाने पर समाचार संगठनों को सरकारी विज्ञापन नहीं दिए जाएंगे, साथ ही उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी.

बात दें कि बीते कुछ दिनों में जम्मू कश्मीर के कई पत्रकारों को उनके काम के लिए पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा है, जिन पर उनकी सोशल मीडिया पोस्ट्स के लिए यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया है.

 

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