क्या आज बादल सरकार होते तो वो भी देशद्रोही करार दिए जाते?

साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र दामोदरदास मोदी सत्ता में आए और उनके सत्ता में आते ही भारत के लोगों ने अपनी एक महत्वपूर्ण कला गंवा दी, वह कला थी तर्क-वितर्क करने की कला. वह कला थी सवाल पूछने की कला और सवाल उठाने की कला जिसको अमृता सेन ने अपनी किताब अरगुमेंटेटिव इंडियन में बताया. मगर यह पहली बार नहीं था जब हिंदुस्तानियों ने अपनी इस महत्वपूर्ण कला का त्याग किया. 70 और 80 का दशक भी ऐसा ही एक दौर था जब इंदिरा गांधी सत्तारूढ़ थी और कलाकारों का, साहित्यकारों का और पत्रकारों का शोषण किया जा रहा था. उनको प्रताड़ित किया जा रहा था. मगर ऐसे समय में लोगों ने हार नहीं मानी थी. कुछ कलाकार-उपन्यासकार जैसे फणीश्वर नाथ रेणु सरकार के काले कारनामों को उजागर करते रहे. उसी श्रृंखला के एक कलाकार थे बादल सरकार जिन्होंने अपनी एक विशिष्ट पहचान बना ली थी. उन्होंने भाषा, राज्य, संस्कृति, जात-धर्म सभी दीवारों को तोड़कर एक पहचान बनाई. दीवारों के टूट जाने से ही भारतीय रंगमंच का विकास संभव हो पाया था. ‘

ऐसे समय में जब आज की तरह ही सरकार आम जनता को टेलीविजन और न्यूज़ पेपर के माध्यम से जनता को भ्रमित करने में लगी थी. उन्होंने रंगमंच और नाटक के माध्यम से ना केवल लोगों का सुख-दुख दर्शाया और मनोरंजन किया परंतु उन्होंने इस को एक साधन की तरह इस्तेमाल करते हुए सरकार की कमियों को विफलताओं को लोगों के सामने रखने का प्रयास किया. उन्होंने सरकार द्वारा लोगों के शोषण किए जाने को अपना एक खास मुद्दा बना लिया और इसीलिए आज से 100 साल बाद भी कोई रंगमंच का नाट्य कथा का इतिहास लिखेगा तो बिना बादल सरकार का जिक्र किए वह इतिहास व लेख पूरा ना हो सकेगा.

अंग्रेज़ो की हुकुम रानी के दौर में कोलकाता शहर में 15 जुलाई 1925 को जन्म लेने वाले बादल सरकार नाटककार निर्देशक और इन सबके अलावा थिएटर सिद्धांतकार थे. प्राथमिक शिक्षा कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेजिएट स्कूल में हुई उसके पश्चात उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद इन्होंने कुछ समय तक इंग्लैंड में नगर नियोजक के रूप में काम किया इंग्लैंड में कार्य करते समय ही इनके अंदर अभिनय और नाटक के लिए रुचि पैदा हुई और वह इस तरफ अग्रसर हो गए. और धीरे धीरे नाटक लेखन के काम में भी शामिल हो गए और 50 से अधिक नाटक लिखें 1970 के दशक में नक्सली आंदोलन से प्रभावित होकर इन्होंने बहुत से स्थापना विरोधी नाट्य रचना की जिसमें से प्रसिद्ध बासी खबर, सारी रात और एवं इंद्रजीत है. उसी दशक में इन्होंने अपनी शताब्दी थिएटर को तीसरी थिएटर समूह के रूप में बदल दिया और इस तरह वह थिएटर को आम लोगों के बीच लेकर आए.

आज, 1960 के दशक में एक प्रमुख नाटककार के रूप में उनका उदय बंगाली में आधुनिक भारतीय नाटक लेखन के युग के रूप में देखा जाता है, जैसा कि विजय तेंदुलकर ने मराठी में, हिंदी में मोहन राकेश और कन्नड़ में गिरीश कर्नाड के रूप में किया था. इनकी रचनाओं के लिए इन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जिनमें 1967 में का संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड 1972 का पद्मश्री 1977 का संगीत नाटक फेलोशिप के अतिरिक्त पद्मभूषण सन 2010 में पेश किया गया जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था.

फिल्म निर्देशक मीरा नायर ने एक साक्षात्कार में कहा, “मेरे लिए, कोलकाता बड़े होने के दौरान एक औपचारिक शहर था. मैंने कोलकाता में क्रिकेट खेलना सीखा, मगर सबसे ज्यादा, मैंने बादल सिरकार को पढ़ना और उनके द्वारा लिखे गए नाटकों को देखना सीखा.”

निर्देशक और नाटककार  सत्यदेव दुबे का यह कथन है कि उन्होंने गिरीश कर्नाड और सरकार के नाटक इंद्रजीत से दृश्यों के बीच तरलता लाना सीखा।

उन्होंने अपनी सरकार विरोधी नाटक जैसे पगला घोड़ा ऐसे समय में लिखें और ऐसी विचारधारा से प्रभावित होकर लिखें जिसे उस दौर में और आने वाले दशकों में घृणा की दृष्टि से देखा गया और उस विचारधारा से सहमत लोगों को प्रताड़ित किया जाता रहा आपको बता दें कि सफदर हाशमी जैसे बड़े नाटककार और रंगमंच अभिनेता की भी उसी दौर में हत्या कर दी गई थी परंतु यह चिराग जलता रहा और 85 वर्ष की आयु में सन 2011 में परमात्मा से जा मिला और अपने पीछे छोड़ गए भारत की जनता को प्रेरित करने वाले लेख नाटक और कहानियां.

Digiqole Ad Digiqole Ad

Sabeeh Akhter

Related post