राफ़ेल-राम मंदिर तो बहाना है, दरअसल सरकार को कोरोना और बेरोज़गारी छुपाना है

राफ़ेल, राम मंदिर, कोरोना उफ्फ!!

वर्तमान में हमारी सरकार को इतिहास रचने का शौक है। मगर इतिहास के भी यहां दो भाग हैं, एक जो दिन की चकाचौंध में टीवी मीडिया और अखबारों के माध्यम से आपको प्रतिदिन नाश्ते में परोस दिया जा रहा है। और एक वह भी इतिहास है जिसको छुपा दिया जा रहा है जो आप तक नहीं पहुंचने दिया जा रहा है। इतिहास, उन लोगों का जिनको सुबह नाश्ता नहीं मिला।

जब-जब इतिहास के पन्नों को पलटा जाएगा तब-तब हम से यह सवाल पूछा जाएगा कि भारतीय होने के नाते जिस समय सरकार अमीरों की जेब भर रही थी, जिस समय वह प्रोपेगेंडा में व्यस्त थी, जिस समय लोगों का मानसिकता पर अपना प्रभाव डाल रही थी, उस समय वे लोग जो भारत निर्माण कर रहे थे उन की क्या दशा थी?

इसका उत्तर हमें लज्जित कर देगा, क्योंकि जिस समय सरकार अपनी प्रोपेगेंडा मशीनरी चला रही थी उस समय भारत का निर्माण करने वाले श्रमिक प्रवासी मज़दूर आत्महत्या कर रहे थे और भूख से मर रहे थे।

मगर सरकार को इतिहास में अपना चेहरा बिल्कुल साफ रखना है, चमकता हुआ है देखना है। भले समाज का आईना उन्हें किसी और तरह देखें इसी बात को मध्य नजर रखते हुए, 5 अगस्त को सरकार राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन करने जा रही है।अच्छी बात है, भूमि पूजन होनी भी चाहिए। भव्य मंदिर का निर्माण अति आवश्यक है, मगर यह बात सोचने की है कि राम ने जिस साबरी के फल खाए थे, वह अभी भी भारत में असहाय है।

वह अभी भी मैला उठाता है।आज भी वह उच्च जाति के साथ बैठ नहीं सकता खा नहीं सकता और अपने अंतिम समय में उस शमशान पर उसके चिता को आग नहीं दी जा सकती जहां ऊंची जाति के लोगों की चिंताएं चलती हों। अच्छी बात है राम मंदिर बन रहा है मगर रामराज्य का क्या जिसकी परिकल्पना साल 2014 में अच्छे दिन अच्छे दिन के वादे के रूप में आम नागरिक तक पहुंचाया गया था।

यह बात कल्पनीय है, जहां एक तरफ देश की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है, दूसरी और प्रवासी मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं वह भी उसी उत्तर प्रदेश में जहां इस भव्य मंदिर का निर्माण किया जाना है उसी यूपी के बांदा में अब तक 25 से अधिक प्रवासी मजदूर आत्महत्या कर चुके हैं।

मगर हमें इन बातों से क्या फर्क पड़ता है? किसी को दो वक्त की रोटी मिले उससे ज्यादा आवश्यक तो यह है कि राम मंदिर बनाया जाए भूमि पूजन की जाए। आखिर वोट भी तो मंदिर मस्जिद के नाम पर ही दिए गए थे।


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कार्ल मार्क्स ने कहा था,” धर्म अफीम की भांति है मनुष्यों के लिए।” और यह कथन कितना सत्य है वह हाल ही के दिनों में साबित होता भी नजर आ रहा है। इस विपत्ति के समय में जहां प्रधानमंत्री को गृह मंत्री को मुख्यमंत्री को स्वास्थ्य केंद्रों का जायजा लेना चाहिए था। वही वह भूमि पूजन के लिए जा रहे हैं। श्री योगी आदित्यनाथ जी क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं अपने पिता की मृत्यु पर चिता को आग लगाने ना पहुंच सके, मगर बाकी मंदिर पूजन के लिए जा रहे हैं यह सब और कुछ नहीं लोगों के मनोभाव के साथ खेलने का एक तरीका है जिससे कि लोगों को यह लगे कि वह हमारे धर्म के लिए यह सब कुछ कर रहे हैं। इससे हमारे धर्म की रक्षा की जा सकती है और इनकी आस्था हमारे धर्म में है।

यह तो एक बात, वहीं दूसरी और 29 जुलाई को भारत में राफेल के पांच विमान आए। इस पर पूरी तरह से मीडिया ने प्रपोज किया और लोगों को यह समझाने की कोशिश करी कि आज से पहले हमारा मुल्क बिल्कुल असुरक्षित था। इस तरह से टीवी पर उसको चलाया गया जैसे कि भारत अब सुपर पावर बन चुका है। मगर यथार्थवाद से इनका कोई संबंध नहीं। आपको बता दें कि कतर जो कि पुणे जितना बड़ा देश है उसके पास भी 24 रफाएल है।और क्या राफेल से पहले हमारे पास कोई भी लड़ाकू विमान नहीं था?

यदि नहीं था तो एयर स्ट्राइक करने के लिए जो सुखोई और मिग गए वह क्या हमने श्रीलंका और बांग्लादेश से उधार लिए थे? लेकिन इस तरह का प्रोपेगेंडा करके आपके दिमाग को बिल्कुल तरह से साफ कर देती है मीडिया और फिर आकर दिमाग में बस एक बात रह जाती है राफेल राफेल । भारत ने जो 36 साल खरीदे हैं उनके कुल कीमत 59 हजार करोड़ रुपए बतायी जाती है।

भाई आपको बता दें कि 2020-21 में रेलवे के पास अपने कर्मचारियों को पेंशन व वेतन देने के लिए राशि नहीं है। प्रवासी मजदूरों के घर लौटने के लिए रेलवे ने उनसे अब तक 448 करोड रुपए कमाए। बिहार और असम में हर साल आने वाली बाढ़ से 100 करोड़ रुपए तक का नुकसान तो 1 जिले में हो जाता है लोगों की जान अलग से जाती हैं। क्या इन रुपयों से प्रवासी मजदूर बिना खर्च किए अपने घर नहीं आ सकते थे? क्या रेलवे अपने कर्मचारियों को वेतन व पेंशन ना दे सकती थी? क्या बिहार और असम के बाद का कोई प्रबंध नहीं किया जा सकता था?

शायद आपको तो याद ही ना पता हो कि बिहार और असम में बाढ़ भी कोई समस्या है और आपको पता भी कैसे होगा जब आपको यह बात मीडिया बताएगी ही नहीं। क्योंकि यह मीडिया के प्रोपेगेंडा लिस्ट का हिस्सा नहीं। हां, अगर बिहार और असम में बीजेपी को छोड़ किसी और की सरकार होती तो शायद उस पर दो-तीन डिबेट प्राइम टाइम किए जा सकते थे।

Official peeinghuman के द्वारा एकत्रित जानकारी से यह पता चला है कि ज़ी न्यूज़ जो कि एक बहुत ही वरिष्ठ मीडिया हाउस है उसकी पूर्व 275 डिबेट में से बिहार और असम के बाद पर 5 से भी कम डिबेट की है। वही मजहब पर और राम मंदिर पर 70-70 डिबेट किए गए।

इसका क्या अर्थ बनता है यह हमारी समझ से तो बाहर।

इन चीजों को इतना बढ़ा चढ़ा कर दिखाने का आखिर क्या अर्थ निकलता है,क्या राफेल का आना भारत निर्माताओं के जान से ज्यादा महत्वपूर्ण था क्या राम मंदिर का बनाया जाना स्वास्थ्य शिक्षा जैसे मुद्दों से ज्यादा अहमियत रखता था।

इस तरह से केवल पढ़े-लिखे भारतीयों का उपहास उड़ाया जा रहा है।

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Sabeeh Akhter

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