कपड़ा मिल की महिलायें जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, दिन भर के मेहनत के बाद मिलते हैं 10 रूपए

हुक़ूमत है न शौकत है, न इज़्ज़त है न दौलत है

हमारे पास अब ले-दे के बाक़ी बस सक़ाफ़त है

– ख़्वाजा रब्बानी

कपड़ा मिल और महिला, एक ऐसा टॉपिक जिन पर हम बात ही नहीं करते। भारत में 24 मार्च से लगे लॉकडाउन में, सबसे ज़्यादा परेशान प्रवासी मजदूर हुए। मीडिया चैनलों पर भी इसके ऊपर चर्चा कर दें कि किस तरह प्रवासी मजदूर परेशान हो गए, वापस अपने घर लौट रहे हैं। किस तरह आर्थिक मंदी का सामना ना कर पाने की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं। मगर बहुत ही कम मीडिया चैनलों ने प्रवासी मजदूरों के बारे में बात करने की जरूरत महसूस करें जो कि इस लॉकडाउन में अपने शहर नहीं लौटे।

और आज हम बात करेंगे इन्हीं प्रवासी मजदूरों के बारे में जो कि लॉकडाउन लग जाने के बाद भी उन शहरों में जहां वह काम करने के लिए गए थे बने रहे।

इस संदर्भ में हमें अहमदाबाद से अच्छा उदाहरण कोई नजर नहीं आया। भारत का मेनचेस्टर कहे जाने वाले अहमदाबाद में भारत की सबसे बड़ी सूत मिल है। कपड़ों के मिलों में काम करने वाले सबसे अधिक प्रवासी मजदूर इसी शहर में रहते हैं और इसी शहर में घर से काम करने वाले मजदूरों की तादाद भी सबसे अधिक है।कारण हमने अहमदाबाद को अपने इस रिपोर्ट के लिए चुना।

भारत का जो समाज है वह एक पुरुष प्रधान समाज है, यहां आज भी स्त्रियों को समाज के सबसे निचले स्तर पर समझा जाता है भले वह किसी धर्म की किसी जात की हों।

अहमदाबाद शहर में अधिकांश मजदूर जो इस समय ठहर गए वह महिलाएं  हैं। आपको यह बता दें कि इन महिलाओं को 8 से 10 घंटे तक काम करने के बाद मुश्किल से 1 दिन के ₹10 से ₹15 मिलते हैं इस बात की जानकारी हमें मजदूर अधिकार संस्था आजीविका ब्यूरो के माध्यम से मिली है।

मगर दुर्भाग्यवश उन्हें इस लॉकडाउन में जो ₹10 से ₹15 प्रति दिन मिला करते थे वह भी नहीं मिले जिस वजह से उनके ऊपर आर्थिक तंगी साफ जाहिर होती नजर आ रही है और वह ऋण मैं दबते जा रहे हैं।

यह महिलाएं अक्सर सबकॉन्ट्रैक्टर वर्क या उपठेका कार्य करती हैं। जिसके लिए इन्हें हर एक पीस के अनुसार कीमत दी जाती है अब इनके साथ दो परेशानियां

  1. पहली या कि यह प्रवासी
  2. दूसरी कि यह महिलाएं हैं। और यह दो समस्याएं भले आपको छोटी लग रही हो लेकिन अपने आप में एक संसार को बर्बाद कर सकती हैं।

इन्हें ज्यादातर कढ़ाई का सारी पे काम का कार्य इत्यादि दिया जाता है। जिसे पहनकर लोग बहुत खुश हो जाते हैं और अपने आप को सर्वोच्च महसूस करने लगते हैं मगर इनकी पीड़ा को, इनकी विपत्तियों को कोई नहीं देखता कोई नहीं सुनता। वहीं इनमें से कुछ महिलाएं अगरबत्ती की कंपनियों में भी काम करती हैं। जिसके बारे में मुझे ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं,

अरुण कमल की कविता ‘खुशबू रचते हैं हाथ से’ इसका बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है, किन-किन प्रकार की विपत्तियों का सामना करना पड़ता है।

“नई गलियों के बीच
कई नालों के पार
कूड़े करकट
के ढ़ेरों के बाद
बदबू से फटते जाते इस
टोले के अंदर
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ!”

अहमदाबाद शहर में ही काम करने वाली अदिति, जिनकी उम्र महज 18 साल है और वह उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले से ताल्लुक रखती हैं, यह बताती हैं कि 1 दिन में मुश्किल से दो-तीन माला बन सकती है और ₹1 से ₹5 एक माला बनाने के लिए मिलते हैं।

पूरे दिन काम करके भी 10 से ₹15 ही इकट्ठा किया जा सकते हैं और अभी के समय में माला बनाने के अलावा और किसी प्रकार का काम शहर में उपलब्ध नहीं है।

कपड़ों की फैक्ट्रियों में ठेके पर काम करने वाली महिलाओं के मुकाबले वह महिलाएं जो फैक्ट्रियों में काम करती थी ₹40- ₹50 कमा लेती थी लेकिन फैक्ट्रियां अब बंद हो चुकी हैं जिस कारण इनकी यह तनख्वाह बंद हो गई है। जिसके बाद इनके लिए अपने ज़रूरत की चीज़ें खरीदना खाने-पीने का इंतजाम घर का किराया देना सब मुश्किल हो गया है। हालांकि अब लॉकडाउन हट चुका है, और उद्योग शुरू हो गया है परंतु फैक्ट्री के मालिक को को महिलाओं को फैक्ट्री में नौकरी देने में हिचकिचाहट है वे ज्यादातर उन्हीं मर्दों को नौकरी देते हैं जो पहले वहां काम कर चुके हैं ऐसे में महिलाओं के लिए अपनी नौकरी ढूंढ पाना मुश्किल है।

टेक्सटाइल और गारमेंट इंडस्ट्री में काम करने वाली महिलाएं भारत के जीडीपी में 2.3% का योगदान करती है, 7% का निर्यात और 13% का आयात इसमें शामिल है। अगर आज तक इनके कामों की कभी सराहना नहीं की गई और लोगों के लिए यह दृश्य ही रहा है मानो जैसे कि इनका कोई वजूद ही ना रहा हो कभी। आम आदमी का क्या कहा जाए जब सरकार को भी इनके  अस्तित्व का पता नहीं है, एक रिपोर्ट के अनुसार 95% से अधिक प्रवासी मजदूरों के घरों में किसी प्रकार का कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है जिससे कि सरकार की तरफ से मिलने वाली मदद इन तक पहुंच सके जिस वजह से इनके घरों में भुखमरी की हालत है।

इनका अस्तित्व है और इनका अस्तित्व यदि आपको देखना है तो आप अहमदाबाद के नारोल और वातवा के  गुजरें आपको इस बात का अंदाजा होगा। एक रिपोर्ट के अनुसार हिंदुस्तान में 73,00,000 महिलाएं शहरी इलाकों में अपने घरों में रह करके इन फैक्ट्रियों का काम करती हैं। यह रिपोर्ट विमेन इन फॉर्मल एंप्लॉयमेंट ग्लोबलाइजिंग एंड ऑर्गेनाइजिंग से प्राप्त की गई। इसी रिपोर्ट के अनुसार या पता लगा है कि इन महिलाओं की संख्या 20 प्रतिशत की रफ्तार से लगातार बढ़ रही है।


और पढ़ें- साहेब ताली और थाली पीटने में मस्त और मज़दूर लगातार कर रहे हैं आत्महत्या


इतनी कम तनख्वाह पर यह लोग काम नहीं करना चाहते हैं मगर इनके साथ कई मजबूरियां हैं, और चाह कर भी अपनी तनख्वाह को बढ़ाने के लिए किसी प्रकार का कोई विरोध प्रदर्शन भी नहीं कर सकती हैं क्योंकि इनको जो काम कराया जाता है वह आउटसोर्सिंग के माध्यम से होता है जिसकी वजह से इनके और शास्त्री के मालिकों के बीच कोई एग्रीमेंट या कॉन्ट्रैक्ट नहीं होता। इस कारण यह उन फैक्ट्रियों और ब्रांच के साथ अपने तालुको साबित ही नहीं कर सकती।

अब बात करते हैं कि सरकार ने इनके लिए क्या किया? हम पहले बता चुके हैं किस प्रकार के लिए इन लोगों का कोई अस्तित्व ही नहीं है यदि होता तो 95% की आबादी के पास किसी तरह का कोई पहचान पत्र या राशन कार्ड क्यों नहीं है।

सर्वप्रथम तो इन्हें यह मजबूर कर दिया जाता है कि या उस शहर में प्रवासियों की तरह ही जीवन यापन करें क्योंकि इनको निवास प्रमाण पत्र नहीं दिए जाते और जब निवास प्रमाण पत्र ही नहीं होंगे तो शहर में रह रहे बाकी नागरिकों की तरह इन्हें किसी प्रकार की सरकार से मिलने वाली सुविधा नहीं देनी पड़ेगी। इसके अलावा यह जिन  झुग्गियों इलाकों में रहते हैं उसको किसी प्रकार की कोई मान्यता नहीं है। जिस कारण बैंकों की भी सुविधा, स्कूल की सुविधा पुलिस की सुविधा भी वहां उपलब्ध नहीं हो पाती।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत प्रवासी मजदूरों को घर देने के लिए 600 करोड़ रुपए की एक स्कीम लाई गई थी मगर इस स्कीम में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं थी।

जब इस संदर्भ में अहमदाबाद मुंसिपल कॉर्पोरेशन के पदाधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने कहा कि मजदूर यहां फैक्ट्रियों की वजह से आते हैं इसलिए वह फैक्ट्रियों की जिम्मेदारी हैं हमारी नहीं।

(उपयुक्त जानकारी इंडिया स्पेंड के माध्यम से ली गई है)

यह मानवीय दशा शायद ही हम लोग को समझ में आए क्योंकि हम लोग ऐसी में रहने वाले व्यक्ति हैं और जो लोग कानून बनाते हैं और कानून व्यवस्था चलाते हैं वह भी ऐसी कारों में और ऐसी घरों में ऐसी ऑफिसों में रहते हैं उन्हें जमीन पर सोने वालों का क्या पता।

लोगों को यह तो बहुत अच्छा लगता होगा कि उनके कपड़े बेहतरीन ब्रांड के हो उनके कपड़ों पर बेहतरीन डिजाइन हो मगर उनके बारे में नहीं पता जो यह काम करते हैं जो यह डिजाइन बनाते हैं।

मुझे याद है कि स्कूलों में बच्चों को यह शपथ दिलाई जाती थी कि संपूर्ण भारत भाई और बहन है,इन बहनों के लिए शायद संपूर्ण भारत भाई नहीं है क्योंकि यदि होता तो अब तक इनके लिए कुछ कदम उठाए जाते कम से कम इनको निवास प्रमाण पत्र तो दिलाया जा ही सकता था ताकि सरकार की ओर से आ रही सुख सुविधाएं स्कीम्स इन तक पहुंच सके।

 

Digiqole Ad Digiqole Ad

Sabeeh Akhter

Related post

Leave a Reply