प्रकाश झा की ‘परीक्षा’ क्या शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देने का एक प्रोपगेंडा है?

“सरकारी स्कूल में कुछ नहीं हो सकता इसका.”

‘प्रकाश झा’ की आई नई फिल्म ‘परीक्षा’ का ये संवाद पूरी फिल्म का सार है। सरकारी स्कूलों की बदहाली, अनियमितता और अव्यवस्था के सामने बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूलों की श्रेष्ठता को दिखाने की कोशिश इस फिल्म में की गई है। सरकारी स्कूलों के प्रति यह धारणा कि वहाँ शिक्षक नहीं आते, पढ़ाई ठीक से नहीं होती और ऐसे स्कूलों से पढ़कर बच्चे ज्यादा कुछ कर नहीं पाते- सरकारी स्कूलों के प्रति इस धारणा को पूरे भारतीय जनमानस में फैला दिया गया है। शहर से लेकर गांव तक। इस धारणा में सच्चाई भी है और झूठ भी और एक बहुत बड़ी साज़िश भी।

सरकारी स्कूलों के प्रति बनाई गई इस धारणा के पीछे की वजहों को हमें अच्छे से समझना होगा। अगर हम इसे समझ लिए तभी प्रकाश झा की फिल्म ‘परीक्षा’ की सटीक और वैज्ञानिक समीक्षा कर पाएंगे। सरकारी स्कूलों के प्रति बनी इस धारणा के पीछे के खेल से बहुत लोग अवगत नहीं हैं। सरकारी स्कूलों के साथ सरकारी कॉलेजों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति मोटा-मोटी यही धारणा बनी हुई है और यह पूंजीपतियों और राजनेताओं के एक बहुत बड़े गठजोड़ का फल है।


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शिक्षा को हमारे देश में एक कॉमोडिटी की तरह बना दिया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में व्यापार इतना फल-फूल गया है कि इसमें बड़े-बड़े रसूखदार लोग पूंजी-निवेश करने लगे हैं। हमारे देश में शिक्षा-माफियाओं और राजनेताओं का एक बड़ा गठजोड़ काम करता है। इस गठजोड़ ने शिक्षा को सुलभ बनाने के बजाय इसे ऐसी संरचना में गूंथ दिया है कि बुनियादी शिक्षा से समाज का एक बड़ा तबका वंचित रह जाये। सरकारी सार्वजनिक संस्थाओं को लेकर जनमानस में आज जो धारणा बनाई गई है, वह इन माफियाओं के द्वारा ही एक ठोस नियत और साज़िश के तहत बनाई गई है। सरकारी स्कूलों का चरित्र-हनन इनका एक बहुत बड़ा एजेंडा रहा है, जिनमें ये लोग एक हद तक सफल भी हुए हैं। इसके पीछे एक बड़ी संरचना काम करती है। इस सन्दर्भ में ‘श्री श्री रविशंकर’ के द्वारा 2012 में दिए गए इस बयान को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा – “सरकार को सरकारी स्कूलों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़े बच्चे नक्सलवाद और हिंसा के रास्ते चले जाते हैं। निजी स्कूलों में पढ़े बच्चे संस्कारवान होते हैं।”

सरकारी स्कूलों की अव्यवस्था और अनियमितता कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसकी यह दशा जानबूझ कर बनाई गई है। आज़ादी के 70 साल बाद भी देश भर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का अभाव, क्लासरूम का अभाव और इसके साथ ही साथ इसके पीछे किसी ठोस और व्यवस्थित संरचना का ना हो पाना इसी का परिणाम है। ‘परीक्षा’ फिल्म सरकारी और प्राइवेट की बहस में प्राइवेट स्कूलों की श्रेष्ठता की वकालत करती है। हालाँकि, फिल्म में एक स्थान पर यह बताने की कोशिश की गई है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी एक बड़े मुक़ाम तक पहुंचते हैं। पर, इतना पर्याप्त नहीं है। अंततः, फिल्म अपनी उसी पूंजीवादी डिसकोर्स को प्रचारित करती है। ‘बुलबुल कुमार’ का अंततः उसी प्राइवेट स्कूल से बोर्ड की परीक्षा देना और फिर टॉप करना इस बात का सबसे बड़ा साक्ष्य है।

फिल्म में सरकारी स्कूलों को लेकर बनी उसी धारणा को आगे बढ़ाया गया है, जबकि अच्छा यह होता कि सरकारी-संस्थानों में व्याप्त दुर्दशाओं और अव्यवस्थाओं के कारणों को भी दिखाया जाता और सरकारी स्कूलों की जन-सुलभ पहलुओं और विशेषताओं को प्रोमोट किया जाता। सरकारी स्कूलों के चरित्र-हनन में मीडिया भी कोई कसर नहीं छोड़ती। इसके विपरीत प्राइवेट स्कूलों के महिमामंडन में ये लोग एक बड़ी
तैयारी और प्रतिबद्धता के साथ खड़े दिखलाई पड़ते हैं।

ये प्राइवेट स्कूलों की कमियों-खामियों पर पर्दा डाल देते हैं। ऐसा नहीं है कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़कर निकलने वाला हर व्यक्ति किसी बड़े कंपनी का सीईओ या मैनेजर ही बनता है। ऐसे कई लोग हैं जिन्हें मैं जानता हूँ, जो अच्छे प्राइवेट स्कूलों में मोटी रकम चुका कर पढ़ने के बावजूद ग्रुप डी की नौकरियां कर रहे हैं या फिर करने की कोशिश में लगे हैं, पर मीडिया यह सब नहीं दिखाएगी। प्रदर्शन और गुणवत्ता की बात करें तो आज भी देश भर के शिक्षण संस्थानों में सरकारी संसथान अव्वल रैंकिंग पर आते हैं। लोग पढ़ेंगे प्राइवेट स्कूलों और कॉलेजों में, पर नौकरी चाहिए सरकारी। यह एक बहुत बड़ा अंतर्विरोध है।

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में शोधार्थी हैं.)

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Suraj Raw

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