WHO से भी ज़्यादा पलटू राम हैं बिहार के नेता

WHO से भी ज़्यादा पलटते हैं बिहार के नेता.

कोरोनावायरस की महामारी के दौर में सभी लोगों को लग रहा होगा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO बार-बार अपने बयान से पलट जा रहा है. कभी उनका कहना है कि N-95 मास्क इस्तेमाल करना चाहिए, फिर वह कहते हैं कि वाल्व वाला मास्क इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. उससे कोरोनावायरस हो सकता है. फिर वह वो कहते हैं कि घर बैठकर हम कोरोनावायरस को रोक सकते हैं. फिर वह कहते हैं कि घर बैठने से इस बात की गारंटी नहीं है कि आपको कोरोनावायरस नहीं होगा.


और पढ़ें- बिहार में भ्रष्टाचार का नया नाम है पुल निर्माण करवाना


लेकिन अब एक बात साफ तौर पर समझ में आ चुकी है कि जो बिहार के नेता है वह डब्ल्यूएचओ के भी बयानों से ज्यादा पलटते हैं. बिहार में कोरोना के दौर में भी चुनाव अपने चरम सीमा की तैयारी पर है और लगातार राजनैतिक उठापटक का दौर चल रहा है. 2 दिन पहले जनता दल यूनाइटेड के दिग्गज नेता श्याम रजक पार्टी छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो चुके हैं. राष्ट्रीय जनता दल ने बयान जारी करते हुए कहा कि श्याम रजक ने 11 साल के बाद घर वापसी की है. इसके पहले भी लगातार दलित कार्ड में सबसे ज्यादा उठापटक चल रहा है जीतनराम मांझी बिहार के नामी दलित नेता माने जाते हैं. वह अभी चुनाव से पहले भी अपना रुख साफ नहीं कर रहे हैं. महागठबंधन में होने के बावजूद वह लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं, जिससे यह कयास लगाया जा रहा है कि वह जल्द ही जनता दल यूनाइटेड और भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हो सकते हैं.

वहीं बिहार के दूसरे सबसे बड़े दलित नेता चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी बीजेपी से अलग हो सकती है. लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान भाजपा शासित केंद्र में मंत्री भी हैं और उनके साथ भी अभी के सरकार में मौजूद हैं. लेकिन विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे से चिराग पासवान काफी नाखुश नज़र आ रहे हैं. वह वक्त-वक्त पर नीतीश सरकार की आलोचना करते हुए नज़र आ रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि वह किसी भी वक्त गठबंधन तोड़ सकते हैं.

इसी बीच कांग्रेस ने भी अभीतक अपना रुख साफ नहीं किया है. कांग्रेस यह बात बार-बार कह रही है कि जब तक सम्मानजनक सीट नहीं मिलेंगे वह किसी भी गठबंधन में चुनाव नहीं लड़ेगी. यहां पर बात किसी भी तरह के पार्टी पॉलिसी या आईडियोलॉजी कि नहीं है. बिहार चुनाव का मतलब सिर्फ और सिर्फ यही होता है कि आप कितने सीटों पर चुनाव लड़ कर अपना वर्चस्व कायम कर सकते हैं.

जो किसी बड़े पार्टी के दिग्गज नेता माने जाते हैं कोई भरोसा नहीं की टिकट मिलने के 1 दिन पहले तक वह अपने प्रतिद्वंदी पार्टी के साथ चले जाएं. बिहार चुनाव का फार्मूला सिर्फ और सिर्फ एक ही है जिधर टिकट उधर ऑडियोलॉजी. अपने आपको ऑडियोलॉजी का पक्का मानने वाले वामपंथी भी आईडियोलॉजी के पक्के नहीं हैं. जिस गठबंधन में उन्हें ज़्यादा सीटें मिलती हैं, वह भी उन्हीं के साथ शामिल हो जाते हैं. एक वक्त में राजद को हत्यारा कहने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां राजद के ज़्यादा सीट देने के बाद राजद के साथ महागठबंधन में शामिल हो जाती हैं. फिर जब राजद उन्हें सम्मानजनक सीट नहीं देती है तो कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए राजद फिर से हत्यारी पार्टी हो जाती है.

बिहार चुनाव में इस बार जो सबसे ज़्यादा खेला जाने वाला कार्ड होगा वह होगा दलित कार्ड, यह अभी से ही समझ में आने लगा है. चिराग पासवान का बयान, जीतन राम मांझी का रुख साफ नहीं करना और श्याम रजक का पार्टी बदलना इस बात की ओर इशारा करता है कि आने वाले वक्त में क्या पार्टी पॉलिसी और गिरेगी. 

Digiqole Ad Digiqole Ad

Amir Abbas

Related post