दिल्ली हिंसा: पुलिसिया और सरकारी साज़िश की लम्बी दास्तां

नागरिकता कानून को लेकर नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में जमकर हिंसा हुई थी। उत्तर पूर्व और पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में भड़की इस हिंसा के बीच कई वाहनों में आग भी लगा दी गई और पत्थरबाजी भी करी गई। भजनपुर के एक पेट्रोल पंप के नजदीक एक कार में आग लगा दी गई जिससे पेट्रोल पंप भी आग की चपेट में आ गया। मौके पर जब आग बुझाने के लिए दमकल की गाड़ियां पहुंची तो उन्हें भी तोड़फोड़ करी गई।

नए नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शन के समर्थक योगेंद्र यादव का कहना है कि दिल्ली पुलिस दंगों की साजिश किसने की है, इसकी जांच नहीं कर रही है, बल्कि वह जांच के नाम पर साजिश कर रही है।

शायद सरकार को यह लग रहा है कि नागरिकता विरोधी प्रदर्शन रोकना उसके लिए संभव नहीं रह गया था। दिन-ब-दिन यह और अधिक व्यापक होता जा रहा था और समाज के अलग अलग विचारधारा के व्यक्ति आंदोलनकर्ताओं के साथ खड़े हो रहे थे। इसीलिए इस आंदोलन को रोकने के लिए अब एक ही विकल्प नजर आया कि इसे धार्मिक आधार पर बांट दिया जाए। पहले तो यही काम दंगों की साज़िश के रूप में किया गया और अब जांच के नाम पर उसे कानूनी तौर पर सही ठहराने की कोशिश हो रही है।

नागरिकता कानून पर अपने मुखविरोध के लिए प्रसिद्ध प्रोफेसर अपूर्वानंद ने बयान दिया है कि नागरिकता कानून के विरोधी जो प्रमुख प्रदर्शनकारी हैं उनके नाम चार्जशीट में डालकर इस पूरे आंदोलन को बदनाम करने की साजिश की जा रही है।

उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे की साजिश के पहलू से जांच कर रहे दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद से लगातार 5 घंटे पूछताछ करी और जांच के लिए उनका मोबाइल फोन भी ज़ब्त कर लिया।

पूछताछ के बाद प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा “मैं जांच में सहयोग कर रहा हूं। विरोध प्रदर्शन करना सभी का मौलिक अधिकार है। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों का समर्थन करने वालों को दंगे स्रोत बताना चिंताजनक है।”

उन्होंने आगे कहा, “पुलिस अथॉरिटी के अधिकारक्षेत्र और घटना की पूर्ण रूप से निष्पक्ष जांच के विशेषाधिकार का सम्मान करते हुए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इस पूरी तफ्तीश का उद्देश्य शांतिपूर्ण नागरिक प्रतिरोध और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा भड़काने और उसकी साजिश रचने वालों को पकड़ना होगा।”

उन्होंने कहा, “इस जांच का मकसद नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) 2019, राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीकरण (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन (एनआरसी) के खिलाफ संवैधानिक अधिकारों और तरीकों से देश भर में अपना विरोध दर्ज करने वाले प्रदर्शनकारियों व उनके समर्थकों का उत्पीड़न करना नहीं होना चाहिए।”

अपूर्वानंद ने आगे कहा, “यह परेशान करने वाली बात है कि एक ऐसा सिद्धांत रचा जा रहा है जिसमें प्रदर्शनकारियों को ही हिंसा का स्रोत बताया जा रहा है| मैं पुलिस से यह अनुरोध करना चाहता हूं और यह उम्मीद करता हूं कि उनकी जांच पूरी तरह से निष्पक्ष और न्यायसंगत हो ताकि सच सामने आए’।

इसके अलावा, दिल्ली पुलिस की दंगा जांच अब अजीबो-गरीब तरीके से भीमा-कोरेगांव मामले के मॉडल के समान प्रतीत होती है, जहां सुरक्षा एजेंसियों ने कार्यकर्ताओं और केंद्र सरकार के आलोचकों पर संगीन धाराओं में मामला दर्ज किया है लेकिन अभी तक उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं दे पाई है।

शायद यह वही प्रवृत्ति है, जिसे अपूर्वानंद परेशान करने वाला बताते हैं, जिसमें जिंदगी भर सांप्रदायिकता का विरोध करने वाले कार्यकर्ता को दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा की साज़िश रचने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।


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छात्रों को बनाया गया निशाना

जब छात्र जामिया की लाइब्रेरी में पढ़ाई कर रहे थे  तभी कुछ लोग मुंह ढंककर वहां प्रवेश करते हैं। लाइब्रेरी पहुंचे इन लोगों के हाथों में ईंटें और पत्थर थे। ये लोग आकर लाइब्रेरी का दरवाजा बंद कर देते हैं और टेबल खींचकर शांति के साथ बैठ जाते हैं। जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी की तरफ से आए वीडियो में सुरक्षाबल लाइब्रेरी में मौजूद छात्रों पर डंडे बरसाते नजर आ रहे हैं. कमेटी ने दावा किया है कि 15 दिसंबर को जब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ आंदोलन हुआ तो दिल्ली पुलिस ने जामिया के अंदर पढ़ रहे छात्रों पर लाठियां बरसाईं और उन्हें बेरहमी के साथ पीटा।

उमर ख़ालिद, पिंजरा तोड़ की देवांगना या फिर सफ़ूरा ज़रगर, इन सभी में बस एक बात ही कॉमन है, सरकार की गलत नीतियों के ख़िलाफ़ खुले मंच से बोलना। शायद इसीलिए इन सभी लोगों के खिलाफ़ दिल्ली दंगों में शामिल होने का आरोप दिल्ली पुलिस ने लगाया है।

सवाल यह उठता है कि इसी दौरान पुलिस भाजपा नेता कपिल मिश्रा और सांसद अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं पर नरमी क्यों बढ़ती जा रही हैं, जिन्होंने मुस्लिम और सीएए – एनआरसी के खिलाफ 2 महीने से अधिक समय तक शांतिपूर्ण धरना देने वाले लोगों के खिलाफ खुलेआम भड़काऊ भाषण दिए थे?

ऐसे में दूसरा सवाल यह भी उठता है कि क्या पुलिस प्रदर्शनकारियों को ही निशाना बनाकर प्रदर्शन रोकने का जाल बुन रही है?

शरजील इमाम, जो जेएनयू के छात्र हैं, उन्हें आज दिल्ली हिंसा के लिए भी गिरफ़्तार कर लिया गया है। उन्हें पहले से कथित तौर पर देश विरोधी नारों के लिए गिरफ़्तार किया गया था।

सरकार उन लोगों को सीधे तौर पर निशाना बना रही है जो उनके ख़िलाफ़ मुखर तौर पर अपनी बातों को रखते हैं। प्रो. अपूर्वानंद पहले बुद्धिजीवी नहीं है जिन्हें मुखर आवाज़ की वजह से निशाना बनाया जा रहा है। आनंद तेल्तुमबड़े, वरवरा राव, सुधा भारद्वाज सहित कई लोग हैं जिन्हें भीमा-कोरेगांव हिंसा में साज़िशकर्ता कहा गया। मीडिया एंकर ने चिल्ली चिल्ला कर उन्हें अरबन नक्सल बताया। लेकिन उन्हें सिर्फ़ एक बात की ही सज़ा मिल रही है वो है, मुखर आवाज़ होने की।

 

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sneha singh

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