नए कृषि अध्यादेश को लेकर किसानों का विरोध शुरू, सरकार ने लाठीचार्ज किया

गुरुवार को केंद्र सरकार के तीन कृषि अध्यादेश को किसान विरोधी बताते हुए हरियाणा के कुरुक्षेत्र में हज़ारों किसान सड़कों पर उतर आए।किसान संगठनों ने कुरुक्षेत्र के पीपली में राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम कर दिया।


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10 सितंबर को भारतीय किसान यूनियन के साथ कई किसान संगठनों ने केंद्र सरकार के तीन आध्यादेशों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया जो कि मंडियों और किसानों से जुड़े हुए हैं। किसान ने दिल्ली से अंबाला जोड़ने वाले नेशनल हाईवे जाम कर दिए। फिर पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज कर दी। इसकी शुरुआत तब हुई जब किसानों ने मंडी बचाओ किसान बचाओ रैली की।

किसान इन तीन कृषि अध्यादेशों का विरोध कर रहे हैं

  • कानून के मुताबिक, पहले हर व्यापारी केवल मंडी से ही किसान की फ़सल खरीद सकता था। अब व्यापारी को इस कानून के तहत मंडी के बाहर से फसल खरीदने की छूट मिल जाएगी।
  • अनाज, दालों, खाद्य तेल, प्याज, आलू आदि को ज़रूरी वस्तु अधिनियम से बाहर करके इसकी स्टॉक सीमा खत्‍म कर दी है।
  • सरकार कांट्रेक्ट फॉर्मिंग को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है।

पहले कृषि अध्यादेश पर किसान का मत

पहले अध्यादेश को लेकर किसानों का मत है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP लाने की व्यवस्था को खत्म कर रही है जिससे कि किसान अपनी फसल के दाम के लिए भी अब व्यापारियों के भरोसे हो जाएंगे।

दूसरे कृषि अध्यादेश पर मत

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन जून को आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करते हुए अनाज, खाद्य तेल, तेलहन, दलहन, आलू और प्याज़ को नियंत्रण से मुक्त करने की घोषणा की| इन वस्तुओं पर राष्ट्रीय आपदा या अकाल जैसी परिस्थिति के अलावा स्टॉक की सीमा नहीं लगेगी।

इस पर सुधा नारायणनन का कहना है कि इससे निजी व्यापारियों को फ़ायदा पहुंचेगा, ख़ास तौर पर उन व्यापारियों को जिनके पास जमाख़ोरी के लिए बड़ी व्यवस्था है। मसलन निजी कंपनियां किसान से खाद्य तेल ख़रीद कर उसको जमा कर सकती हैं और बिना किसी वजह के मार्किट में उसका दाम बढ़ा सकती हैं जिससे मुनाफ़ा उनको होगा। किसानों को इससे कुछ ख़ास फ़ायदा नहीं होगा।

तीसरे कृषि अध्यादेश को लेकर मत

कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग को लेकर सुधा नारायणनन बताती हैं कि साल 2003 और 2018 में कुछ राज्यों ने कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग पर काम करना शुरू किया था लेकिन कोई ख़ास परिणाम हाथ नहीं लगा था।

इसकी बड़ी वजह यह रही थी कि कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग को लेकर कोई अनिवार्य पंजीकरण की व्यवस्था नहीं थी जिसकी वजह से किसानों को ग़लत तरीक़े से बरग़लाया भी जा सकता था।

तीन जून को कैबिनेट के इन फ़ैसलों की घोषणा के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था, ‘इससे कृषि क्षेत्र की सूरत बदलेगी और इसके साथ ही भारत के किसानों की मदद करने की दिशा में इसका दूरगामी प्रभाव होगा।’

सरकार का मत

सरकार ने किसानों को मंडियों के अलावा भी अपने उत्पादन को कहीं भी बेचने की छूट दी है। ‘एक राष्ट्र, एक बाज़ार’ के तहत किसान अपनी उपज को जहां उसे उचित और लाभकारी मूल्य मिले वहां बेच सकता है। ई-नाम के ज़रिए डिजिटल बिक्री भी कर सकेगा। यही नहीं, किसान और व्यापारी को उपज की ख़रीद-बिक्री के लिए अपने राज्य की मंडी से बाहर किसी तरह का कर भी नहीं देना होगा। यह कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम में सुधार करते हुए किया गया है।

अभी तक मंडी (एपीएमसी) की जो व्यवस्था है उसमें किसान मंडी में अपनी बुवाई को लेकर जाता है जहां मंडी में उसके सामान की बोली लगती है जिससे किसान को अपनी उपज का सही दाम मिल सके। इसके बाद व्यापारी अनाज ख़रीदता है। मंडी इसके लिए किसान और व्यापारी दोनों से कर लेता है। यह कर (1% से लेकर 8% तक) हर राज्य में अलग-अलग है।

नए अधिनियम के तहत यह कर मंडी के बाहर व्यापार और बिक्री करने पर नहीं लगेगा।

कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग की भी बात की जा रही है। कॉन्ट्रैक्ट खेती का मतलब ये है कि किसान अपनी ज़मीन पर किसी और के लिए खेती करेगा।कॉन्ट्रैक्ट खेती में किसान को पैसा ख़र्च नहीं करना पड़ता। इसमें कोई कंपनी या फिर कोई व्यापारी किसान के साथ अनुबंध करता है और किसान जो उगाता है उसपर दाम तय होता है। इसमें खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मज़दूरी सब ख़र्च कॉन्ट्रैक्टर के होते हैं। कॉन्ट्रैक्टर ही किसान को खेती के तरीक़े बताता है। फ़सल की क्वालिटी, मात्रा और उसके डिलीवरी का समय फ़सल उगाने से पहले ही तय हो जाता है। कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के लिए दिशानिर्देश जल्द आएंगे।

महाराष्ट्र में स्वाभिमानी पक्ष के राजू शेट्टी और शतकरी संगठन के अनिल घनवत सहित किसान नेताओं ने वास्तव में अध्यादेशों का स्वागत किया है। दो बार लोकसभा सांसद रह चुके शेट्टी ने उन्हें “किसानों के लिए वित्तीय स्वतंत्रता की ओर पहला कदम” कहा है।

जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है, अध्यादेशों की प्रतिक्रिया एक समान नहीं रही है। शेट्टी और घणावत का मानना ​​है कि अगर प्रोसेसर, विक्रेताओं या निर्यातकों को प्रत्यक्ष खरीद के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश करना था तो किसानों को फायदा होगा।

किसान वर्तमान में अपनी उपज को मंडियों में ले जाने पर पैसा खर्च करते हैं, जिसे वे खरीद सकते हैं अगर खरीद उनके खेतों के करीब की जाए। लेकिन इन नेताओं को भी लगता है कि केंद्र को पंजाब और हरियाणा के किसानों तक पहुंचना चाहिए ताकि कोई गलतफहमी दूर हो सके। महामारी के दौरान जिस तरह से अध्यादेशों को घुसाया गया था, वह जल्दबाजी में ट्रस्ट के घाटे में भी शामिल हो सकता है।

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sneha singh

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